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स्वामी अछूतानंद की पुनर्व्याख्या की जरूरत है : महेंद्र प्रताप राना

कैलाश दहिया / 'आजकल व्यक्ति विशेष को दलितों का मुक्तिदाता घोषित किया जा रहा है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि उन से ही दलितों का इतिहास शुरू होता है। यह तथ्यहीन, गलत और खतरनाक बात है। यह दलित इतिहास के साथ धोखा है।' इस उद्बोधन के साथ अपने वक्तव्य की शुरुआत करने वाले डॉ. महेंद्र प्रताप राना जी 'आदिहिंदू आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी अछूतानंद' पर चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु जी की इसी नाम से लिखी पुस्तक के तीसरे संस्करण के लोकार्पण कार्यक्रम में बोल रहे थे। राना जी ने बताया कि दलितों में मुकुंद बिहारी मलिक वर्ष 1871 में जस्टिस बन चुके थे, तब डॉ. अंबेडकर पैदा भी नहीं हुए थे। ऐसे ही, इसी दौरान पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल और  बांग्लादेश में 'नमो शूद्र' आंदोलन की धमक गूंज रही थी। इसी साल 1871 में ही इस देश की पहली जनगणना में यहां के दलितों ने नमो शूद्र के रूप में अपनी अलग धार्मिक पहचान दर्ज करवाई थी। राना जी के इन कथनों से उपस्थित लोगों में बेचैनी देखी गई। 'आदि हिंदू आंदोलन के प्रवर्तक श्री 108 स्वामी अछूतानंद जी हरिहर' पर  पहली बार यह पुस्तक वर्ष 1960 में प्रकाशित हई थी, जबकि दूसरा संस्करण 1968 में आया था। तीसरा संस्करण लंबे अंतराल के बाद अब जनवरी 2021 में आया है। सुधी दलित पाठकों को इस किताब का बेसब्री से इंतजार था। इस का लोकार्पण तो बनता ही है। यह लोकार्पण कार्यक्रम दिल्ली के वाईएमसीए आडिटोरियम, 1, जयसिंह रोड, नई दिल्ली में आयोजित किया गया।

असल में हुआ क्या था, यह कार्यक्रम दिनांक 09 जनवरी 2021 को दोपहर 2:00 बजे प्रारंभ होना था। लेकिन, मुख्य अतिथि का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था। ऐसे में लोकार्पण से पहले वरिष्ठ साहित्यकार सूरजपाल चौहान जी से कविता सुनाने का आग्रह किया गया। चौहान जी के बाद राना जी को आमंत्रित किया गया।

डॉ. महेंद्र प्रताप राना जी ने बताया कि 1871 की पहली जनगणना में पूर्वी भारत में दलितों ने अपनी पहचान के तौर पर खुद को नमो शूद्र लिखवाया था। लिखने वालों ने नमो शूद्र के साथ चांडाल भी लिख दिया। तब एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन राजधानी शिमला में जनसंख्या रजिस्ट्रार से मिला और चांडाल शब्द पर आपत्ति जताई। सरकार ने आपत्ति दर्ज करते हुए अगली जनगणना में इसे सुधारने की बात कही। ऐसे ही साल 1931 तक आते-आते दलित आदि हिंदू, आदि आंध्रा, आदि धर्मी, सतनामी जैसी पहचानों के साथ सामने आ गए थे। राना जी ने कहा कि बौद्ध धर्मांतरण से दलित आंदोलन को अथाह  नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा, 'बुद्ध से पहले मक्खलि गोसाल को ढूंढिए तो सही पूरा इतिहास सामने आ जाएगा।' राना जी स्पष्ट शब्दों में चेताते हुए कहा, 'हमें स्वामी अछूतानंद जी की पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है। हमें स्वामी जी के आंदोलनों की पड़ताल करनी ही पड़ेगी, अन्यथा अंधी खाई में गिरने को तैयार रहिए।'

डॉ. राना जी से पहले वरिष्ठ साहित्यकार सूरजपाल चौहान जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता 'यह दलितों की बस्ती है' की कुछ पंक्तियां सुनाई। अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, 'हमें अपने पुरखों-महापुरुषों को याद रखना चाहिए। बाबासाहेब ही नहीं हमारे ऐसे और भी महापुरुष हैं। हम अपने बाप को बाप ने कहकर दूसरे के बाप को बाप कहते हैं।' चौहान जी ने कहा कि 'स्वामी अछूतानंद जी के समय दलित जातियों में आपस में रोटी बेटी के रिश्ते थे, जो अब नहीं हो रहे। आज पढ़े लिखे दलित अपने बेटों के लिए बामणी- बनैनी ला रहे हैं। यह बहुत गलत हो रहा है।' उन्होंने बताया कि 'उनके बेटे और बेटी के लिए कोई नवबौद्ध रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुआ। वहां मेरी भंगी जाति सामने आ जाती, जबकि स्वामी अछूतानंद जी ने अपने आंदोलन में दलितों में इस जातिभेद को तोड़ा था। एक तरह से धर्मांतरण का चिंतन स्वामी जी के आदि हिंदू आंदोलन के सामने कहीं नहीं ठहरता।' चौहान जी ने समझाते हुए बताया कि 'यह कहा जाता है कि चमार नौकरियों में भंगियों का हिस्सा खा गए। यह बेहद आपत्तिजनक और षड्यंत्रकारी बात है। मुझे, ओमप्रकाश वाल्मीकि, डॉ. महेंद्र बेनीवाल और जैदिया जी को नौकरी लेने से किसी चमार ने नहीं रोका। नौकरी के लिए पढ़ना पड़ता है, अगर भंगी पढ़ेंगे ही नहीं तो नौकरी कैसे मिल सकती है? भंगियों को गैर दलितों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों से बचना चाहिए।'

कार्यक्रम और पुस्तक के  पुनर्मुद्रण में मुख्य भूमिका निभाने वाले रमेश चन्दर जी ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा, 'मैं स्वामी जी का परिचय कैसे दूं, जबकि बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने लिखा है 'स्वामी जी को अनेकों प्रणाम', 'आपका कृपाभिलाषी।' ऐसी महान विभूति की पकड़ अखिल भारतीय स्तर पर थी।' उन्होंने बताया कि 'स्वामी जी ने 15 सालों में 208 सभाएं की थीं। इसलिए दलितों को साधनों का रोना नहीं रोना चाहिए। स्वामी जी ने 'एक मुट्ठी आटा' से अपना आंदोलन चलाया था।' उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, कि 'दलितों को स्वामी जी को जानना-समझना और पढ़ना ही होगा इसी से दलितों की मुक्ति की राह निकलनी है।'

मुख्य अतिथि उर्मिलेश महोदय घंटे भर से अधिक  देरी से आए। पुस्तक लोकार्पण की औपचारिकता के बाद उन से बोलने का आग्रह किया गया। एक मीडियाकर की तरह उन्होंने दलितों को लेक्चर देना शुरू कर दिया। कार्यक्रम था स्वामी अछूतानंद पर, ये बोल रहे थे किसानों पर! फिर जनपक्षधर, सबाल्टर्न जैसे भारी-भरकम शब्दों के बीच बहुजन की बात, और तो और ये राहुल सांकृत्यायन के हिन्दुत्व और ब्राह्मणवाद विरोध की शिक्षा देने बैठ गए। इस के बाद ये डॉ. अम्बेडकर और उन की पुस्तकों पर चर्चा करने लगे। एक तरह से ये डॉ. अंबेडकर पर प्रवचन की मुद्रा में आ गए। बताइए, अब गैर दलित हमें बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बारे में पाठ पढ़ाएंगे! जब इन से स्वामी जी पर बोलने का आग्रह किया गया, तो श्रोताओं ने ही शोर मचा दिया। ये वो श्रोता हैं जो डॉ. महेंद्र प्रताप राना जी के स्वामी अछूतानंद और उनके आंदोलन की जानकारी देने पर खुसर-पुसर कर रहे थे। यानी इन्हें डॉ. अंबेडकर की प्रशंसा सुननी है केवल। ऐसे ही लोगों की वजह से दलित आंदोलन पिटा है। दरअसल, दलितों में इधर कुछ 'जय भीम- नमो बुद्धाय' बोलने वाले पैदा हो गए हैं, जो द्विजों-सवर्णों की चाकरी करते देखे जा सकते हैं।

एक अन्य बात, जिसे लेकर कुछ दलित बुद्धिजीवी बेवजह कयास लगाते देखे जा सकते हैं। डॉ. राजपाल सिंह 'राज' ने अपनी पुस्तक 'आदि हिंदू आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी अछूतानंद हरिहर व्यक्तित्व और कृतित्व' के लेखकीय  उद्गार में लिखा है, 'यदि स्वामी जी 14 अक्टूबर, 1956 तक जीवित रहते तो निश्चय ही बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर जी के साथ नागपुर में वह बौद्ध धर्म में दीक्षित हो जाते।' उन के इस कथन पर महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने लिखा है, 'वह (स्वामी अछूतानंद) कुछ साल और जीवित रह जाते तो डॉ. अंबेडकर को धर्म के मामले में यूं अकेले बुद्ध के दर पर भटकना नहीं पड़ता। (देखें, प्रेमचंद की नीली आंखें, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण : 2010, पृष्ठ-200)  कोई भी डॉ. साहब के कथन से आदि  हिंदू आंदोलन के बारे में अंदाजा लगा सकता है।

उर्मिलेश महोदय ने कहा कि मैं 'आलोचना से घबराता नहीं हूं।' लेकिन, इन की आलोचना तो किसी ने की नहीं थी। हां, इन्हें इतना जरूर बताया जा सकता है, स्वामी अछूतानंद का अर्थ होता है 'पूर्णिमा का चांद' और इस के विपरीत हजारी प्रसाद द्विवेदी का मतलब है 'सूर्य पर पूरा ग्रहण।' तो उर्मिलेश जी को दलित साहित्य में चल रही आलोचना का अध्ययन कर लेना चाहिए, तभी मैदान में उतरना चाहिए, अन्यथा इस में खतरे ही खतरे हैं। दलित साहित्य आंदोलन कोई लफ्फाजी की चीज नहीं है। अगर स्वामी अछूतानंद पर कुछ पढ़ा-लिखा नहीं है तो किस ने कहा था मंच पर चढ़ने के लिए? दलितों के मंचों पर अब वामपंथियों और गैर-पढ़े लिखों की जुगाली नहीं चलने वाली। एक बात और, जब राजा ही पिट गया हो तब प्यादों की क्या बिसात है? जहां तक तो आलोचना की बात है तो सूरजपाल चौहान जी ने कार्यक्रम समाप्ति के बाद बताया कि 'इन महोदय ने बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर पर एक स्पीच तैयार कर रखी है, जिसे ये विभिन्न मंचों पर दोहराते रहते हैं। यह भाषण मैं इन के मुंह से पहले भी सुन चुका हूं।' एक अन्य बात जो बताने लायक है, अगर उर्मिलेश जी को स्वामी अछूतानंद और उन के आंदोलनों के बारे में जानकारी नहीं थी, तब किताब लोकार्पण के बाद, जब इन के पास पुस्तक आ ही गई थी, तो कम से कम अपनी फेसबुक पर ही इस बारे में दो लाइनें लिख देते। लेकिन नहीं, इन्हें तो अंबेडकर पर ही लिखना है। यहां तक कि इन्होंने आज दिनांक 12 जनवरी, 2021 को स्वामी विवेकानंद पर अपनी पोस्ट डाली है। स्वामी अछूतानंद पर इन की कलम की स्याही सूख गई लगती है। इस से इन की मानसिक बुनावट का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

दलितों की मानसिक स्थिति कैसी है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब डॉ. महेंद्र प्रताप राना 'स्वामी अछूतानंद और उन के आंदोलन' के बारे में जानकारी दे रहे थे तब दलित इसे सुनने को तैयार नहीं थे। क्योंकि, उन के कथनों से डा. अंबेडकर संदेह के घेरे में आ रहे थे। उधर, उर्मिलेश महोदय डॉ. अम्बेडकर पर बोले जा रहे थे, स्वामी अछूतानंद के आंदोलन पर उन के पास बताने को कुछ था ही नहीं। जब उन्हें इस बात के लिए टोका गया तो दलितों में से कुछ ऐसे उछले जैसे बिच्छू ने काट लिया हो। पता नहीं ये दलित थे या दलितों में घुसपैठिए थे। दलितों को पता होना चाहिए कि गैर दलितों की ऐसी ही घुसपैठ से दलित आंदोलन तो खराब हुआ ही है, दलित राजनीति भी पिटी है। फिर, उर्मिलेश हमें बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बारे में बताएंगे! यह तो हद दर्जे की जिद है। ऐसे ही आजकल एक भूतपूर्व दलित लेखक संघ का पदाधिकारी ब.ब.ति. का पैरोकार बना घूमता है। दलित जान लें, यह दलितों की गुलामी का एक बड़ा कारण है।

प्रकाशक के रूप में रमेश चन्दर जी ने इस किताब को बेहद मनोयोग से छपवाया है, जिस के लिए दलित समाज इन का ॠणी रहेगा। लेकिन कार्यक्रम में किसे बुलाना है किसे नहीं इस बात की जानकारी होनी ही चाहिए। लोकार्पण के लिए किसी गैर दलित को मुख्य अतिथि बनाने से पूर्व पता नहीं इसी किताब में आए इस प्रसंग को ये कैसे भूल गए, जिस में लिखा मिलता है :

   "आदिहिंदू-सिद्धांत का प्रचार करते हुए जिस समय वह ( स्वामी अछूतानंद ) भारत की प्राचीन राजधानी कन्नौज में आये, तो यह ठहरी कि यहां अछूतों की एक विराट सभा की जाय। इस सभा का शामियाना और प्लेटफार्म आदि के बनाने में तिरवा-नरेश ने बड़ी सहायता की। सभास्थल को खूब सजाया गया, तो कुछ अछूत भाइयों के मन में यह बात आई कि इस सभा का सभापति तिरवा  के राजासाहब को बनाया जाये। यहां तक कि कई मनचले, डरपोक और खुशामदी अछूत भाई तिरवा महाराज को सभापति का आसन ग्रहण करने का निमंत्रण भी दे आये। किंतु यह बात जब स्वामी जी को मालूम हुई, तो उन्होंने निर्भीक भाव से इसका विरोध किया। उन्होंने साफ कह दिया कि अछूतों की सभा का सभापति कोई राजा- महाराजा नहीं हो सकता। उस सभा का सभापति कोई सुयोग्य अछूत ही होना चाहिए। फलत: राजा साहब सभापति नहीं बनाए गये और सभापति पद के लिए एक अछूत- नेता महात्मा रामचरण कुरील को चुना गया। यह स्वामी जी के वंश गौरव और निर्भीकता का एक उज्ज्वल उदाहरण है।"   

उम्मीद है, इस बारे में ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। हां, प्रसंगवश यह भी बताया जा सकता है कि नेतृत्व तो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी किसी को नहीं दिया। किसी को अपने मंच का मुख्य अतिथि बनाने का अर्थ है उसे अपना नेतृत्व सौंप देना। लेकिन स्वामी अछूतानंद के बालक ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं? दलितों को इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि अपने कार्यक्रमों में किस को बुलाना-बुलवाना है। किसी गैर दलित को मंच देने का अर्थ है अपनी गर्दन कटवाना।

उधर, स्वामी अछूतानंद के साथ आदि हिंदू आंदोलन में काम करने वाले बद्री प्रसाद जी के पुत्र एम.पी. सिंह जी को मंच पर मूर्ति बना कर बिठाए रखा। यूं नहीं कि उन से दो शब्द ही बुलवा लिए जाते। इस से स्वामी जी के आदि हिंदू आंदोलन पर प्रकाश ही पड़ता। पता नहीं यह कैसी जिद रही  कि हम तो मुख्य अतिथि से ही बुलाएंगे, चाहे उन्हें स्वामी अछूतानंद और उन के आंदोलन के बारे में 'अ' भी ना पता हो। अगर एम पी.सिंह जी से बुलवाया जाता तो निश्चित ही श्रोताओं को लाभ होता। उन्हें दलित आंदोलन को समझने में मदद मिलती। वैसे डॉ. महेंद्र प्रताप राना जी ने बता ही दिया था कि दलित आंदोलन किसी एक अकेले व्यक्ति के कंधों पर नहीं चला, जैसा कि आज के दिन ढिंढोरा पीटा जा रहा है।

असल में, दलित आंदोलन तो स्वामी अछूतानंद के देहांत के साथ पीछे छुप गया था। उन के बाद तो दलित आंदोलन के नाम पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का दौर शुरू हो गया था। जिस पुस्तक के तीसरे संस्करण के लोकार्पण पर दलित समाज के जागरूक लोग एकत्र हुए थे, उस के प्रकाशकीय में ही लिखा है, 'दलित संघर्ष के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होगा कि अंबेडकर काल खंड से एक-दो दशक पूर्व पूरे भारत के दलितों ने वर्ष 1910 के आस-पास एक महान आदि हिंदू आंदोलन चलाया हुआ था जिसने दलित संघर्ष को पैनापन दिया था और यह आंदोलन बाद में युगांतरकारी परिवर्तन का गवाह भी बना। आज दलित समाज इस तथ्य को विस्मृत कर चुका है कि वह आरक्षण जिसे हम 1932 के गांधी-अंबेडकर समझौते की उपज मानते हैं के मूल में आदि हिंदू आंदोलन की एक महान संघर्ष गाथा रही है।' (पुस्तक के प्रकाशकीय से, पृष्ठ- 1)

इस कार्यक्रम का संचालन विनोद जी ने किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंबेडकर काल से पहले स्वामी जी का काल आता है। इन की बात सही होते हुए जानना है कि अंबेडकरवादी स्वामी जी के काल पर लिखते-बोलते क्यों नहीं? वैसे इसे डॉ. महेंद्र प्रताप राना जी के भाषण के बीच हुई खुसर-पुसर से समझा जा सकता है। दलितों को स्वामी अछूतानंद पर एक कार्यक्रम महारों के बीच करना चाहिए, तभी दलित आंदोलन की सही दिशा-दशा का पता चलेगा। हां, इस कार्यक्रम के दौरान दो-चार लोग ही 'नमो बुद्धाय' करते दिखाई दिए। जो दलित आंदोलन के लिए शुभ संकेत है।                                               

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