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अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल पर दलित दस्तक मनाएगा जश्न

पटना/ सुशील कुमार।  मूकनायक के 100 साल यानी अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल के आयोजन के मद्देनजर दिल्ली से प्रकाशित ‘दलित दस्तक’ की ओर से 24 नवंबर को अंबेडकर भवन, पटना में “एक संवाद...आप पाठकों के साथ” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम शुरू होने के पहले सभी ने बाबा साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया।  

दलित दस्तक, बाबा साहब डॉक्टर भीम राव अंबेडकर द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र “मूकनायक” का 31 जनवरी 2020 को 100 साल पूरा होने के अवसर पर जश्न के रूप में मनाने जा रहा है। दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने यह जानकारी ‘एक संवाद...आप पाठकों के साथ’ कार्यक्रम में दी। उन्होने कहा कि वैचारिक आंदोलन आज की जरूरत है और इसके लिए दलितों का अपना मीडिया होना जरूरी है। श्री दास ने बताया कि बाबा साहब, पेरियर, अछूतानन्द, मान्यवर कांशी राम सहित कई महापुरुषों ने समाचर पत्र निकाल कर हिंदुवादी मीडिया के समानांतर बहुजन मीडिया को स्थापित करने की पहल की थी।  मान्यवर कांशीराम ने सबसे ज्यादा पत्र निकाले जो लंबे समय तक छपे भी। लेकिन आर्थिक अभाव के कारण पत्रों ने दम तोड़ दिया। उन्होने कहा कि दलित दस्तक जनता के सहयोग से लगातार लोगों के बीच बिना रुकावट प्रकाशित हो रहा है। उन्होने कहा कि बाबा साहब मूकनायक सहित जो भी पत्र निकाले उसका मकसद समाज से संवाद करना था और दलित दस्तक का भी मकसद अपने समाज से संवाद करना है । दलित दस्तक इसलिए जरूरी है कि मेनस्ट्रीम की मीडिया बहुजनों से मुंह फेरे हुये है ऐसे में हमारी पहल है कि बहुजनों की आवाज दलित दस्तक बने और यह सब समाज के सहयोग के बिना संभव नहीं है। दलित दस्तक के संपादक ने कहा कि मुख्य धारा की मीडिया, बहुजनों की बात नहीं करती है।  उनके नायकों को वह जगह नहीं देती है। दलितों के साथ भेदभाव करती है।  जब  कोई दलित बड़ा काम करता है तो उसकी जाति नहीं बताती लेकिन जब दुष्कर्म होता है तो जाति बताती है।

लेखक – पत्रकार संजय कुमार ने कहा कि बाबा साहब ने वंचित समाज की आवाज को उठाने के लिए खुद का मीडिया का सहारा इसलिए लिया कि उस दौर की हिंदुवादी मीडिया बाबा साहब के विचारों को जगह नहीं देती थी। हालात आज भी वैसा ही है, ज्यादा का अंतर नहीं है । बहुजनों की खबरों से आज की मुख्यधारा की मीडिया मुंह फेरे हुये है । उन्होने कहा कि मीडिया में दलितों के प्रवेश पर अघोषित रोक है। आइरन गेट बना हुआ है । लेकिन जब कोई बहुजन आइरन गेट तोड़ कर मीडिया में आता है और उसकी जाति का पता चलता है तो उसके साथ भेदभाव शुरू हो जाता है। उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह मीडिया हाउस छोड़ देता  हैं । श्री कुमार ने कहा कि बहजनों का अपना मीडिया हो इसके लिए पहल की जरूरत है। हालांकि दलित दस्तक जैसी  कई पत्र पत्रिकाएँ छप रही है लेकिन मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाती है। ऐसे में बहुजन को आगे आना होगा और दलित दस्तक और इस जैसे बहुजन मीडिया को ज्यादा से ज्यादा अपनाना और सहयोग करना होगा।

इस अवसर पर राम सुरेश राम ने कहा कि दलित दस्तक कठिनाई के साथ चल रहा और यह समाज में सोए हुए लोगों को जगाने क काम कर रहा है। उन्होने कहा कि यह अपने समाज के महापुरुषों को लगातार छाप कर समाज को बताने का काम कर रहा है। श्री राम ने कहा कि हमें अपने मीडिया को और मजबूत न्बनने किबनाने की जरूरत है और इसके लिए सबको गोलबंद होकर आगे आना होगा। वहीं अमरजीत ने कहा कि बाबा साहेब के सपने को पूरा करना होगा । इसके लिए हमें साहित्य को अपनाना होगा। उन्होने कहा कि अगर हम साहित्य में नहीं है तो पीछे है।  साहित्य से हम अपने पूर्वजों को जानते है।  बाबा साहब सहित बहुजन महापुरुषों के संघर्ष से जुड़े साहित्य आए तभी आने वाली पीढ़ी अपने नायकों को जान पाएगी और हमारी जड़ें मजबूत होगी। सरयू चौधरी ने कहा कि जानकारी के अभाव में घोर मनुवादी के चक्कर में था लेकिन दलित दस्तक सहित अन्य साहित्य को पढ़ कर मनुवाद के चंगुल से बाहर निकला हूँ । उन्होने कहा कि दलित दस्तक बहुजन का दर्पण है।

मौके पर ओमप्रकाश माँझी ने कहा वैचारिकी क्रांति के लिये सांस्कृतिक क्रांति की ज़रूरत है। उन्होने कहा कि इसके लिए हमें वैचारिकी रूप से मजबूत बनना होगा, तभी हम उनको जवाब दे सकेंगे । मौके पर सुशील कुमार, डॉ मनोज विभाकर, जितेंद्र कुमार विमल, गगन भारती, डॉ मुकेश चौधरी, योगेन्द्र राम, उमेश कुमार दास, रूपेश कुमार, आलोक कुमार, मनीष कुमार सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन युगेश्वर नंदन ने किया।

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