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आहटों को सुनने वाले कवि थे पंकज सिंह

December 30, 2015

लखनऊ। कवि -पत्रकार पंकज सिंह से हमारा वैचारिक रिश्ता रहा है जो अटूट है। वे नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रेरित कवि है। यह उनकी कविता में प्राणवायु की तरह है। भारतीय सामाजिक संरचना में जो तानाशाही है उसे पंकज सुनते हैं, नागार्जुन की तरह। वे आहटों के कवि हैं, उन आहटों के जो भविष्य की हैं। उनकी कविता ‘सम्राज्ञी आ रही हैं’ को देखें। यह 1974 में लिखी थीं। इसमें आने वाली तानाशाही की आहटें हैं। यह आज भी उतनी ही प्रांसगिक है क्योंकि आज सम्राट अवतरित हो रहे हैं। पंकज नहीं हैं लेकिन साहित्य समाज, सचेत नागरिक उन आहटों को हमेशा महसूस करता रहेगा। 
यह बात पंकज सिंह स्मृति सभा को संबोधित करते हुए ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक  रामजी राय ने कही। आज लेनिन पुस्तक केन्द्र, लालकुंआ में जन संस्कृति मंच की ओर से स्मृति सभा का अयोजन किया गया था। लेखकों, कलाकारों व बुद्धिजीवियों ने उन्हें याद किया और अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। 
इस मौके पर अपनी यादों को साझा करते हुए सामजिक चिन्तक प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि 1972 से हमारा उनका साथ था। वियतनाम की जनता का संघर्ष हो या इमरजेन्सी का दौर हम संघर्ष के साथी रहे। इसकी वजह से हमारा अध्ययन भी बाधित हुआ। समाजवादी, वामपंथी व क्रान्तिकारी विचारधारा के हम बहुत से साथी थे। मतभेदों के बावजूद हमारे बीच एकता थी। पंकज सिंह जुझारू व लड़ाकू व्यक्तित्व के साथी थे, बहुत कुछ दबंगों सा लेकिन यह बड़ों के पाखण्ड को बेनकाब करने के लिए होता था। पंकज के अन्तर में कोमल हृदय था, कविता में अत्यन्त संवेदनशील। प्रो रमेश दीक्षित ने पंकज सिंह की दो छोटी कविताएं भी सुनाईं।
कवि व पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि नक्सलबाड़ी आंदोलन से जो पीढ़ी कविता में आई उनमें पंकज सिंह अगली पांत के कवि हैं। उनकी कविताएं राजनीतिक है, वहीं उनमें कलात्मक सौंदर्य भी है। कविता को अकविता से बाहर निकाल कर उसे जनोन्मुख बनाने में पंकज सिंह, गोरख पाण्डेय, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा की बड़ी भूमिका रही है। पंकज सिंह की कविता के क्षेत्र में ‘साम्राज्ञी आ रही हैं’ से पहचान बनी। पंकज सिंह का जीवन आजाद पंक्षी की तरह रहा है लेकिन उसकी खूबी है हर कठिन समय में सही पक्ष में खड़ा होना।
पंकज सिंह की कविताओं और रचना कर्म पर बोलते हुए जसम के प्रदेश अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर ने कहा कि पंकज सिंह भारतीय जन के मुक्ति स्वप्न के रचनाकार हैं। इनकी कविताएं अन्याय की सत्ताओं के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध का माध्यम है। चाहे इंदिरा तानाशाही का काल हो या सांप्रदायिक फासीवाद का मौजूदा दौर पंकज सिंह इनका क्रिटिक रचते हैं , इनसे मुठभेड़ करते हैं। 1974 में ‘सम्राज्ञी आ रही हैं’ कविता लिखी तो इस दौर में ‘एक निर्मम फासीवादी चरित्र पर/देखो, लोकतंत्र का अलौकिक लेप’।’कविता से फासीवाद के खिलाफ सृजन किया। जीवन के अंतिम सांस तक वे तानाशाही व फासीवाद के खिलाफ सक्रिय रहे। उनका जाना जन संस्कृति आंदोलन की बड़ी क्षति है। 
इस अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ के शकील सिद्दीकी, व कवि भगवान स्वरूप् कटियार ने भी अपने विचार प्रकट किये और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक सुभाष राय, बी एन गौड़, के के शुक्ल,कल्पना पाण्डेय, विमल किशोर,, कामरेड रमेश सिंह सेंगर आदि प्रमुख थे। स्मृति सभा का संचालन जसम लखनऊ के संयोजक कवि श्याम अंकुरम ने किया। 

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रिपोर्ट- श्याम अंकुरम , संयोजक, जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मो - 8400208031

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