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गांधी, मूनिस और पत्रकारिता की बात

April 18, 2016

महात्मा गांधी के चम्पारण आगमन के 100वें वर्ष पर "पीर मुहम्मद  मूनिस स्मृति व्याख्यान सह सम्मान समारोह" का आयोजन 

बेतिया / महात्मा गांधी के चम्पारण आगमन के 100वें वर्ष में 17 अप्रैल को बेतिया (पं. चंपारण) में,  1917 में चम्पारण सत्याग्रह आंदोलन में गांधी के सहयोगी और ‘प्रताप’ के प्रतापी पत्रकार पीर मुहम्मद  मूनिस की याद में आयोजन रखा गया था। इस अवसर पर पत्रकारिता पर भी बात हुई। 

सांसद एवं वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने कहा कि मूनिस जेल गये, उनकी मास्टरी गई, लेकिन पत्रकारीय उसूलों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अखबार के अर्थशास्त्र को रेखांकित करते हुये उन्होंनें कहा कि यह सच्चाई है कि आज पत्रकारिता बड़ा व्यवसाय हो गया है। जब 15-20 रुपये का अखबार हमें 2-3 रुपये में मिल रहा हो और ऊपर से उपहार भी तो हमें समझना चाहिये कि पूंजी कहां से आ रही है। आज विज्ञापन और तकनीक के विकास का प्रभाव पत्रकारिता पर पड़ा है। 

भारतीय इतिहास के इस ‘अनसंग हीरो’ को करीब डेढ़ दशक पहले ढूंढ निकालने वाले खोजी लेखक और वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने कहा कि मूनिस एक अभियानी पत्रकार और कलम के सत्याग्रही थे। दरअसल गांधी और मूनिस दोनों पत्रकार थे और साझी संस्कृति के प्रबल पक्षधर भी। इन्होंने गांधी को उद्धृत करते हुये कहा कि 12 फरवरी, 1947 को गांधी ने कहा था कि कोई कितना भी चिल्लाता रहे अखबार वाले सुधरते नहीं। लोगों को भड़का कर इस प्रकार अखबार की बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीका अखबार वाले का है। ...ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अखबार बंद हो जाये या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई धंधा खोज ले तो अच्छा है।

इस अवसर पर पीर मुहम्मद मूनिस पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजे गये एनडीटीवी से सम्बद्ध पत्रकार रवीश कुमार ने दिल्ली से भेजे अपने ऑडियो संदेश में कहा कि गणेश शंकर विद्यार्थी के सबसे बेहतरीन संवाददाता थे मूनिस। जिन लोगों ने मूनिस की याद को जिंदा किया है वे ही पुरस्कार के असली हकदार है। उन्होंने कहा कि कभी नहीं सोचा था कि ऐसी राजनीतिक संस्कृति आयेगी जो पहले पीठ ठोकेगी और फिर मां-बहन की गालियां देंगी। समर्थक अब नये लठैत है, जो ट्विटर, फेसबुक पर दिन-रात गालियां देते रहते हैं। अगर पाठक-दर्शक पत्रकारिता के हक में आज खड़ा नहीं हुआ, तो ये लोग उन्हें भी एक दिन गालियां देंगे। उन्होंने कहा कि पत्रकारों का संघर्ष दोहरा होता जा रहा है। सरकार और संस्थान दोनों से लड़ना पड़ रहा है। उन्हें खुलकर डराया जा रहा है। खबर लिखने का जुनून कम पड़ता जा रहा है। पत्रकारिता में प्रयोग नहीं हो रहे हैं। पत्रकारिता बचे, यह सिर्फ पत्रकार की लड़ाई नहीं है। उससे ज्यादा बड़ी लड़ाई पाठकों एवं दर्शकों की है।

समारोह का आयोजन हिकमत फाउंडेशन ने किया था। इसके अध्यक्ष और भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी सैय्यद गुलरेज होदा ने आयोजन के औचित्य पर प्रकाश डाला और अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर शहर के कई बुद्धिजीवी एवं पत्रकार मौजूद थे।

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