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छोटे-मझोले अखबारी समूहों पर मंडराया संकट

नई दिल्ली /अखबारों की छपाई के लिए आयात किया जाने वाला कागज अब महंगा हो गया है। इसकी कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है और यह 52 हजार रुपए प्रति टन तक पहुंच गई है, जबकि 6 महीने पहले तक इसकी कीमत करीब 37 हजार रुपए प्रति टन थी। इसके दाम आसमान पर पहुंच जाने के कारण छोटे-मझोले अखबारों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

पिछले साल की शुरुआत में अखबारी कागज 33,500 रुपए प्रति टन की दर से आयात हो रहा था। इसमें डिलीवरी की लागत जोड़ देने पर भीं दाम 36,000 से 37,000 रुपये प्रति टन तक होता था।

जानकारों के अनुसार, अखबारी कागजों के दाम बढ़ने की मुख्य वजह अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों का चीन के अखबारी कागज की आपूर्ति से बढ़ा देना है, क्योंकि चीन इसके लिए उन्हें अधिक कीमत दे रहा है। इसके अलावा यूरो भी लगातार महंगा हो रहा है, जिससे यूरोपीय कंपनियों का मार्जिन घट गया है, इसलिए वे ज्यादा दाम मांग रही हैं। चीन के लिए आपूर्ति बढ़ने से भी भारत को होने वाले अखबारी कागज के निर्यात में कमी आई है।

वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में अखबारी कागज के उत्पादन और मांग में गिरावट भी देखने को मिल रही है और इस वजह से अमेरिका में अखबारी कागज बनाने वाली कुछ कंपनियां भी बंद हो गईं हैं, जिसके चलते यहां उत्पादन पहले के मुकाबले कम हो गया है। लेकिन वहीं भारत की बात करें तो यहां पिछले पांच साल में अखबारी कागज का आयात बढ़ा है। 2012 में यह 12.39 लाख टन था जबकि 2016 में 14.33 लाख टन पर पहुंच गया है।

भारत में हर साल करीब 28 लाख टन अखबारी कागज की जरूरत पड़ती है, लेकिन इसका घरेलू उत्पादन महज 13 से 14 लाख टन है और यही वजह है कि इसकी आधी जरूरत आयात से पूरी होती है।

वहीं संयुक्त राष्ट्र के फूड एवं एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) के आंकड़ों पर नजर तो पता चलता है कि साल 2013 में 289.6 लाख टन उत्पादन के मुकाबले अखबारी कागज की मांग 287.4 लाख टन रही। 2014 में उत्पादन गिरकर 269.6 लाख टन पर आ गया। खास बात यह है कि मांग भी उत्पादन के सापेक्ष कम होती जा रही है। 2014 में अखबारी कागज की मांग महज 268.6 लाख टन ही रही। 2015 में यह आंकड़ा और गिरकर 248.6 लाख टन पर आ गया। हालांकि उस वर्ष मांग उत्पादन के लगभग बराबर रही। 2016 में मांग के मुकाबले उत्पादन कम रहा। यहां 239.6 लाख टन की मांग के मुकाबले उत्पादन 239.4 लाख टन ही हुआ।

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