मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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देश के बेहतरीन पत्रकारों की जननी है बिहार: के. जी. सुरेश

केविवि में मीडिया कार्यशाला में जुटे पत्रकारिता के दिग्गज, आईआईएमसी के सहयोग से खुलेगा जनसंचार विभाग

मोतिहारी / महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय मीडिया कार्यशाला के पहले दिन देश के जाने-माने मीडिया संस्थानों के प्रमुख हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ‘21वीं सदी में मीडिया: उभरते परिदृश्य’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक के.जी.सुरेश ने बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में सबसे पहले मोतिहारी जैसे छोटे शहर में सीमित संसाधनों के बावजूद इस महत्वपूर्ण मीडिया कार्यशाला के आयोजन के लिए विवि के कुलपति सहित पूरे विश्वविद्यालय परिवार को बधाई दी। उन्होंने आगे कहा कि 21 सदी में मीडिया के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं, वहीं अवसर भी हैं। आज पश्चिम के देशों में जहां प्रिंट मीडिया बड़े पैमाने पर बंद हो रहे हैं वहीं भारत में इसका विस्तार हो रहा है। भारत में स्थानीय स्तर पर अख़बार निकल रहे हैं, क्षेत्रीय भाषाओं में भी पत्रकारिता फल-फूल रही है। आज वायुयान के बिजनेस क्लास में भी लोग अपनी मातृभाषा में अख़बार पढ़ने में शर्म महसूस नहीं करते जबकि पहले लोग अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा का अख़बार खुलेआम पढ़ने में हिचकिचाते थे। आज मीडिया का परिदृश्य बदल रहा है। तकनीकि विकास के कारण मीडिया आज सबके लिए सुलभ हो गया है। सोशल मीडिया के आ जाने से मीडिया आज ज्यादा लोकतांत्रिक हो गया है। सोशल मीडिया न सिर्फ आज बे-आवाजों की आवाज बन गया है बल्कि यह एजेंडा सेटिंग करने लगा है। कल के अख़बार का शीर्षक क्या होगा यह सोशल मीडिया तय करने लगा है। आज प्रिंट मीडिया के सामने चुनौती है कि जो ख़बर फेसबुक, ट्वीटर और न्यूज पोर्टल आदि माध्यमों से लोगों के सामने घटना घटने के साथ ही लाइव या उसके तुरंत बाद न्यूज चैनलों द्वारा न्यूज पैकेज के रूप में लोगों के सामने  आ चुकी है उसी ख़बर को पाठकों तक कैसे प्रस्तुत किया जाए कि लोग उसे पढ़ें? इसके आगे उन्होंने स्वयं इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि हमें उसी ख़बर को एक नए नज़रिये से प्रस्तुत करना होगा, ख़बर के पीछे की ख़बर को समझना होगा, तब जाकर हम पाठकों को अपनी लेखनी से बांध सकेंगे। पत्रकारिता के क्षेत्र में रोजगार के विषय में उन्होंने कहा कि मीडिया में रोजगार की कमी नहीं है बल्कि खुद पर विश्वास और प्रयास करने की जरूरत है। आईआईएमसी के अपने छात्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उनके छात्र रोजगार ढूंढने की बजाय यू-ट्यूब पर अपना चैनल खोल रहे हैं। इन छात्रों के द्वारा अपलोड किए गए विडियो को खूब हिट मिल रहे हैं और रेवेन्यू जनरेट हो रही है। पहले इस क्षेत्र में रोजगार पाना एक चुनौती थी, तकनीक के विकास और नज़रिये के बदलाव ने इस क्षेत्र में अवसर उत्पन्न कर दिया है। बिहार की धरती को बेहतरीन पत्रकारों की जननी बताते हुए उन्होंने देश के कई बड़े पत्रकारों के नाम गिनाएं जिनकी जन्मभूमि बिहार है। इस अवसर पर श्री सुरेश ने आईआईएमसी की तरफ से केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग की स्थापना में सहयोग की घोषणा की, साथ ही इस दिशा में केविवि के कुलपति प्रो. अरविन्द अग्रवाल के प्रयासों की सराहना भी की।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अरविन्द अग्रवाल ने विवि. में मीडिया कार्यशाला के आयोजन पर प्रसन्नता एवं संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि आज का दिन मेरे लिए बहुप्रतीक्षित दिन है। लगभग 2 वर्ष पहले इस विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग स्थापित करने की योजना थी। इसके लिए आईआईएमसी के के.जी. सुरेश जी से मुलाकात की थी। यह प्रयास आज रंग लायी है और श्री सुरेश सीमित संसाधनों वाले हमारे विवि. में हमारे साथ मिलकर न सिर्फ इस महत्वपूर्ण मीडिया कार्यशाला का आयोजन कर रहे हैं बल्कि वह स्वयं यहां उपस्थित होकर जनसंचार विभाग स्थापित करने में मदद की घोषणा कर रहे हैं। यह हम सभी के लिए गौरव की बात है। उन्होंने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए कहा कि इतने कम समय के कार्यकाल में ही हमारे 3 विद्यार्थी नेट उत्तीर्ण कर चुके हैं। 4 विद्यार्थी भारत सरकार के उच्च अध्ययन छात्रवृत्ति के लिए चयनित हुए हैं। 4 विदेशी छात्र यहां अध्ययन करने के लिए इच्छुक हैं और उन्होंने आवेदन किया है। यहां के बच्चों में क्रिकेट के प्रति रुझान विकसित करने और प्रशिक्षण के संबंध में जानकारी देने के लिए आने-वाले दिनों में बिहार क्रिकेट बोर्ड के सचिव रविशंकर प्रसाद सिंह आने वाले हैं। उन्होंने आगे कहा कि बापू के स्वच्छता कार्यक्रम को हमारे विश्वविद्यालय ने मिशन की तरह लिया है और साफ-सफाई को लेकर हम शत-प्रतिशत प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने अपने विद्यार्थियों, अध्यापकों, अधिकारियों और कर्मचारियों की तारीफ करते हुए कहा कि इन सभी के सामूहिक प्रयास से विश्वविद्यालय कैम्पस हरा-भरा, साफ-सुन्दर और स्वच्छ है। जनसंचार के अलावा छात्र-छात्राओं के लिए फ़िल्म-टेलीविजन के क्षेत्र में कैरियर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने आने वाले दिनों में एफटीआईआई, पुणे द्वारा विश्वविद्यालय में 5 दिवसीय फ़िल्म एप्रिसिएशन कोर्स आयोजित करने की योजना पर चर्चा की। इसके अलावा उन्होंने डिजिटल मार्केटिंग पर भी विवि कैम्पस में कार्यक्रम आयोजित करने की जानकारी दी।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, नोएडा कैम्पस के निदेशक प्रो. अरूण कुमार भगत ने कार्यशाला में बतौर वक्ता अपने संबोधन में कहा कि आज का पत्रकार पक्षकार के रूप में नज़र आने लगा है। पत्रकारिता के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि समाचार और विचार में अंतर होता है समाचार के लिए अलग पृष्ठ होते हैं और विचार के लिए एक संपादकीय पेज होता है लेकिन आज समाचार में विचार देखने को मिल जाते हैं। पत्रकारों को तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने चाहिए और पक्षकार या निर्णायक की भूमिका से बचना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि पत्रकारिता मानवीय रुचियों का परिष्कार करती है। पत्रकारिता के बिना सामाजिक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने पत्रकारों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराते हुए वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग न होने पाए इस बात पर जोर दिया।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संजय कौसिक ने बतौर वक्ता अपने संबोधन में पूर्व वक्ता की बातों से अलग राय रखते हुए कहा कि विचारों के समावेश के बिना समाचारों का संप्रेषण संभव नहीं है। अपनी बात को स्थापित करते हुए उन्होंने कहा कि संवेदना ज्यों समावेशित होगी, ‘विचार’ समाचार में आ ही जाएगा। उन्होंने पत्रकारों से सूचना परक ख़बरों के अलावा खोजपरक ख़बरों को लिखने पर जोर दिया। ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों की दशा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ये पत्रकार अपने संस्थान के रीढ़ होते हैं लेकिन संस्थान इन्हें व्यक्तिगततौर पर रीढ़विहिन करती जा रही हैं। उस पर कभी अपने संस्थान की मांग पर विज्ञापन लाने का दबाव होता है तो कभी बच्चों की फीस भरने का दबाव होता है। मोतिहारी में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना में मोतिहारी-वासियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय के लिए यहां के लोगों ने जी-जान लगाकर संघर्ष किया है। यहां के लोगों ने जरूरत पड़ने पर विशाल मानव श्रृंखला बनाकर जिम्मेदार लोगों को यह संदेश दिया कि यहां केन्द्रीय विश्वविद्यालय के स्थापना की आवश्यकता है। पूर्व में के.जी.सुरेश के वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आगे कहा कि इस चंपारण की इस मिट्टी में वो तासीर है कि हम मानक गढ़ते हैं।

इससे पूर्व कार्यशाला में आए अतिथियों, सहभागिता कर रहे पत्रकारों और विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए विवि. के मानविकी एवं भाषा संकाय के अधिष्ठाता डॉ अमरेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि यह हम सभी के लिए गौरव की विषय है कि सीमित संसाधन वाले विश्वविद्यालय में देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान के सहयोग से यह महत्वपूर्ण मीडिया कार्यशाला आयोजित हो रहा है। आगे चंपारण में पत्रकारिता के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चंपारण में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह के समय पत्रकार दो गुटों में बंट गए थे। एक गुट में सरकार की तरफदारी करने वाले लोग थे जबकि दूसरे गुट में तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ पत्रकारिता करने वाले लोग थे। आज जब 21वीं सदी में समय बदल रहा है, देश-दुनिया में इस बदलते परिदृश्य में पत्रकारिता में बदलाव पर चर्चा हो रही है तो पत्रकारों की भी भूमिका बढ़ गई है। आज भी तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ पत्रकारिता की ही मांग है।

कार्यशाला का संचालन कम्प्यूटर विज्ञान एवं सूचना तकनीकि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. विकास पारिक ने की। डॉ. पारीक ने वक्ताओं के संबोधन के बीच तथ्यों के साथ मीडिया संबंधी अपनी राय भी जाहिर की, साथ ही आगामी 1 जून को विवि में आयोजित डिजिटल मीडिया पर कार्यक्रम की जानकारी दी। कार्यशाला के प्रथम दिन के अंतिम सत्र का संचालन विश्वविद्यालय के डॉ भानु प्रताप ने किया। कार्यशाला में आज महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा-महाराष्ट्र के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय, ‘जनसत्ता’, नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार आदर्श कुमार सिंह, शगुन टीवी, नई दिल्ली के एमडी अनुरंजन झा, ज़ी-टीवी बिहार के हेड स्वंय प्रकाश जैसे मीडिया विशेषज्ञ और बिहार के तमाम वरिष्ठ पत्रकार अपना संबोधन देंगे साथ ही कार्यशाला में सहभागिता कर रहे पत्रकार अपना अनुभव साझा करेंगे।

महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय मीडिया कार्यशाला बुधवार को सम्पन्न हो गया। इस कार्यशाला में बिहार के पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और देश के जाने-माने मीडिया संस्थानों से आए विशेषज्ञों की बात सुनी और अपना अनुभव साझा किया। ‘21वीं सदी में मीडिया: उभरते परिदृश्य’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला  के अंतिम दिन महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा-महाराष्ट्र के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने अपने संबोधन में उपस्थित पत्रकारों, विद्यार्थियों और अध्यापकों को पत्रकारिता दिवस की बधाई देते हुए पत्रकारिता को सामाजिक विसंगतियों को दूर करने वाला हथियार बताया। उन्होंने कहा कि समय के साथ ही पत्रकारिता में भी परिवर्तन हो रहे हैं। भारत में जब पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी तब देश गुलाम था। पत्रकारों के सामने देश को आजाद कराना लक्ष्य था जिसके लिए उन्होंने जी-जान से कोशिश की। तब के पत्रकार अपनी पत्रकारिता के लिए अपने घर का बर्तन और पत्नी के गहने बेचने के लिए तैयार थे। आज स्थिति बदल गई है। आज मीडिया मिशन से प्रोफेशन और प्रोफेशन से संशेसन के दौर से भी आगे गुजर गया है। हम पत्रकारों को अपने अंदर झांकने की जरूरत है ताकि पत्रकारिता से जीवन यापन भी हो और सामाजिक विसंगतियां भी दूर हों। निश्चिततौर पर पत्रकारिता एक सम्मानजनक और जिम्मेदारी भरा पेशा है लेकिन कोई पत्रकार किसी व्यक्तिविशेष या समाज को भय दिखाकर सम्मान नहीं हासिल कर सकता। सम्मान अपने काम की बदौलत ही मिल सकता है। हर ख़बर जो समाज की बेहतरी के उद्देश्य से लिखी गयी है सम्मान के काबिल है। सनसनीखेज ख़बरों से एकबार पाठकों या दर्शकों की नज़र में तो आया जा सकता है लेकिन सदैव नज़र में बने रहने के लिए तथ्यपूर्ण ख़बर ही एकमात्र सहारा है। सनसनीखेज ख़बरों से हमेशा पाठक या दर्शक आपसे जुड़े नहीं रहेंगे। इस बात को आज की मीडिया समझ चुकी है उसीका नतीजा है कि कुछ मीडिया संस्थान ‘नो निगेटिव न्यूज़’ कैप्शन के साथ ख़बरों को प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि आज हर तरह से अन्य पेशों में गिरावट आई है, पत्रकारिता भी उससे अछूता नहीं है। इसके बावजूद पत्रकारिता की तरफ नज़र रखने वाले लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है। मीडिया के विरूद्ध उत्पन्न हुए अविश्वास के बाद भी संभावना है। भले ही बड़े शहरों में मीडिया का कारपोरेटाइजेशन हो गया है लेकिन अंचल के पत्रकार आज भी कम वेतन और सीमित सुविधाओं में मेहनत और ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं। हमें उनकी तरफ भी देखने की जरूरत है। उन्होंने मीडिया के दूसरे पहलू की तरफ इशारा करते हुए कहा कि संपादकों की भी अपनी मजबूरी है। किस ख़बर को छापना है और किस ख़बर को हटा लेना है यह तय करने में उसे भी माथापच्ची करनी पड़ती है। आज का संपादक दबाव में रहने लगा है। शायद इसीलिए ब्रांड मैनेजर का चलन आ गया है। आज जिस पत्रकार की पहुंच उद्यागपति, नेता और मंत्री से जितनी ज्यादा है उसके ब्रांड मैनेजर बनने की संभावना उतनी अधिक है। सबकुछ के बावजूद पत्रकारिता में संभावना बाकी है। सूचना एवं तकनीकि क्रांति के दौर में आज हर नागरिक विशेषकर युवा आज पहल कर सकता है। एक चैनल को चलाने के लिए कम से कम 100 करोड़ रुपये की लागत है, रेडियो चैनल या अख़बार शुरू करने के लिए भी पूंजी की जरूरत है लेकिन इसी दौर में इंटरनेट नाम का एक ऐसा सस्ता और सर्वसुलभ साधन है जिसकी सहायता से नगण्य खर्च में हम अपना संदेश बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा सकते हैं। संदेश में दम होना चाहिए, संदेश तथ्यपूर्ण, खोजपूर्ण और सत्य होनी चाहिए। उन्होंने हवाई जहाज में यात्री के साथ अभद्रता जैसी घटनाओं का उदाहरण देते हुए बताया कि आज तमाम न्यूज चैनलों के ब्रेकिंग न्यूज चैनल के कैमरे से नहीं बल्कि मोबाइल से रिकॉर्ड हो रहे हैं। उन्होंने अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि पत्रकारिता से निराश होने की जरूरत नहीं है। सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध काम करने का जज्बा बनाए रखने की जरूरत है। तकनीकि के दौर में पैसा और यश दोनों की पत्रकारिता के क्षेत्र में मुश्किल नहीं है। कार्यशाला में बतौर वक्ता अपने संबोधन में हिन्दुस्तान टाइम्स के असिस्टेंट एडिटर अरूण कुमार ने सीधे पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा कि अगर आपको अपनी शाख बचानी है तो आपको वास्तविकता का सहारा लेना पड़ेगा। ब्रेकिंग न्यूज और फेक न्यूज से ज्यादा दिन तक मीडिया में टिका नहीं जा सकता है। बनावटीपन से हटकर वास्तविकता की ओर आना पत्रकारिता में आक्सीजन का काम करता है। बिना आक्सीजन के ज्यादा देर तक कोई टिक नहीं सकता। आज के पत्रकार टेक्नॉलाजी का सहारा कॉपी-पेस्ट करने के लिए न करें, इससे उनकी विश्वसनीयता पर संकट आता है। उन्होंने ‘कहा जाता है- सुना जाता है’ नाम के एक पुराने अख़बार का उदाहरण देते हुए कहा कि आजकल इस तरह की ख़बरे भी खुलेआम आ रही हैं। जो ख़बर नहीं हैं फिर भी गॉसिप के तौर पर प्रस्तुत की जाती हैं। आज गंभीर ख़बरों को पेज में उतनी प्रमुखता से भले ही स्थान न मिले लेकिन किसी चर्चित अदाकारा के आगमन या कार्यक्रम की ख़बर मीडिया में जरूर स्थान पा जाती है। उन्होंने पत्रकारों को सचेत करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति विशेष अचानक से आपको जरूरत से ज्यादा तरजीह देने लगे तो उससे सचेत हो जाने की आवश्यकता है। उन्होंने अंग्रेजी के कुछ शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि ख़बरों में फैक्ट, चेक- क्रॉसचेक और वैरिफिकेशन जरूर करें। ये मीडिया के लिए जरूरी है। इसीसे मीडिया की विश्वसनीयता बची रह सकती है। शगुन टीवी के प्रबंध निदेशक अनुरंजन झा ने अपने संबोधन में कहा कि सामाजिक बदलाव के लिए पत्रकारिता से बढ़ियां और शार्टकट हथियार कोई दूसरा नहीं है। इतना जरूर है कि अगर आपको पाठक, दर्शक या श्रोता तक अपनी बात पहुंचानी है तो आपको तकनीकि से अपडेट रहना होगा और अपने कंटेट पर काम करना होगा। उन्होंने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें अपनी कीमत मालूम होनी चाहिए। हम किस उद्देश्य से काम कर रहे हैं यह हमें मालूम होना चाहिए तभी हम अपने काम से संतुष्ट रह सकते हैं और समाज में कुछ बदलाव लाने में भी सफल हो सकते हैं। जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार आदर्श झा ने बताया कि फेसबुक आज दुनिया मे सबसे ज्यादा कंटेट जनरेटर है। आज की ख़बरों में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का योगदान है। यह सबके लिए सुलभ है। जरूरत सिर्फ जज्बे के साथ काम करने की है सुविधा और साधन सबके लिए एक समान उपलब्ध है। ज़ी-टीवी बिहार के पॉलिटिकल एडिटर शैलेन्द्र कुमार ने कार्यशाला में उपस्थित विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता में आने का इरादा रखने वाले विद्यार्थियों को महात्मा गाँधी के विषय में जरूर अध्ययन करना चाहिए। पत्रकारिता में कैसी भाषा का प्रयोग होना चाहिए यह सीखना हो तो गाँधी जी की पत्रकारिता देखनी चाहिए। केविवि के वाणिज्य एवं प्रबंध विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता डॉ पवनेश कुमार ने उपस्थित मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, विद्यार्थियों समेत केविवि के कुलपति प्रो. अरविन्द अग्रवाल, कार्यशाला के संयोजक डॉ अमरेन्द्र त्रिपाठी, सह आयोजन सचिव डॉ भानु प्रताप, कोषाध्यक्ष डॉ शिवेन्द्र सिंह, विशेष सहयोग के लिए केविवि के डॉ विकास पारीक और विश्वविद्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और गांधीवादी चिंतकर ब्रजकिशोर सिंह ने अपने आशीर्वचन के साथ संबोधित किया।

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