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मीडिया नवचिंतन का : मीडिया स्वामित्व फोकस

March 27, 2016

भोपाल : माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की इन हाउस पत्रिका "मीडिया नवचिंतन" संचार माध्यमों पर लंबे समय के बाद विमर्श लेकर आया है।

इस अंक में विभिन्न मुद्दों पर मीडिया विशेषज्ञों ने अपनी कलम चलायी है। खास कर मीडिया स्वामित्व यह अंक फोकस।

संपादकीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बृजकिशोर कुठियाल ने लिखा है। अपने संपादकीय में वे लिखते हैं कि मीडिया  लाभ से लोभ की यात्रा कर रहा है। हालांकि वे इस बात से इंकार नहीं करते कि मीडिया लघु स्तर का हो या विशाल, इसे स्थापित करने में पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। फिर भी वे सवाल उठाते हैं कि समाज के लिये मीडिया कैसा होना चाहिए?

चर्चित लेखक मनोज श्रीवास्तव ने "सोशल मीडिया कितनी एंटी- सोशल "आलेख में मीडिया और उसके मूल्य के बीच सोशल मीडिया के चरित्र को सामने लाया है। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार गोविंद सिंह "एकाधिकार और केन्द्रीकरण की ओर बढ़ता भारतीय मीडिया" आलेख में बताते हैं कि पूंजी के अभाव से ही केन्द्रीकरण और एकाधिकारवाद होता है। भारतीय मीडिया में मुनाफे की घुसपैठ हुई है और पूंजीगत मीडिया में पैर पसारते हुए अपना पैमाना बड़ा कर लिया है। वहीं, लालबहादुर ओझा ने मीडिया की आपाधापी के बीच सामुदायिक मीडिया को एक विकल्प बताया है। "सामुदायिक मीडिया एक विकल्प है" आलेख में वे वैश्विक परिदृश्य को रेखाकिंत करते हैं। अजीत द्विवेद्वी ने "छोटी मीडिया संस्थानों का भविष्य " आलेख में छोटे मीडिया के दास्तान को विस्तार से रखा है।

जबकि वरिष्ठ लेखक रामबहादुर राय ने "मीडिया स्वामित्व: आज का परिदृश्य" आलेख में मीडिया स्वामित्व को बारिकी से पेश किया है। वे लिखते हैं कि मीडिया के स्वामित्व की सही तस्वीर स्पष्ट नहीं है। मीडिया स्वामित्व पर वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार का आलेख "मीडिया स्वामी मीडिया मुगल में तब्दील" में उन्होंने लिखा है कि किस तरह से मिशन मीडिया को मीडिया स्वामियों ने अपने हितों की रक्षा के लिये प्रयोग करना शुरू कर दिया। आज मीडिया स्वामित्व अपने कई चरित्रों से मीडिया मुगल से जाना जाने लगा है।

इस अंक में सुभ्रांशु चौधरी का आलेख,"सबके बोलने का समय समतामूलक मीडिया", डाक्टर सुशील त्रिवेदी का आलेख, "मीडिया का नव उपनिवेशवाद", डाक्टर सी.जयशंकर बाबू का आलेख, "मीडिया की नयी चाल किनके हितार्थ", डाक्टर अनीता का आलेख, "जनांदोलनों का समन्वय", दर्शन सिंह रावत का आलेख, "हिंदी समाचार पत्रों का अंग्रेजीकरण", संजय द्विवेदी का आलेख, "मीडिया में दिखता चेहरा: किस औरत का" सहित अन्य आलेख अंक को पठनीय और संग्रहनीय बनाते हैं।

पत्रिका : मीडिया नवचिंतन

अंक : अक्टूबर-दिसम्बर से 2012-जनवरी माह-2014

प्रकाशक: माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल

 

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