मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

सोशल मीडिया के नियमन में समाज की अहम भूमिका

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में 'कानून एवं व्यवस्था के लिए सोशल मीडिया'विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

भोपाल। समाज में सबके अपने-अपने सत्य हैं। लोग एक आंशिक सत्य को ही पूर्ण सत्य बनाकर सोशल मीडिया पर आगे बढ़ाते हैं। अपने आंशिक सत्य के सामने वह दूसरे के आंशिक सत्य को भी देखना नहीं चाहते। सोशल मीडिया ऐसा माध्यम है, जिस पर एक बार संदेश प्रसारित हो गया, तब उसका नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं रहता। वह समाज के सामने किस प्रकार प्रस्तुत होगा, समाज पर किस प्रकार का प्रभाव डालेगा, यह तय नहीं। विचार किए बिना प्रसारित यह आंशिक सत्य समाज में कई बार तनाव का कारण बनता है। इसलिए आज आवश्यकता है कि सोशल मीडिया का स्व नियमन करने के लिए सामाजिक सहमति बनाई जाए, ताकि सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग बढ़े और नकारात्मक उपयोग कम से कम हो।

यह विचार पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने व्यक्त किए। श्री शुक्ला माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से 'कानून एवं व्यवस्था के लिए सोशल मीडिया'विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि थे। कार्यशाला में प्रदेशभर से पुलिस अधिकारी एवं विषय विशेषज्ञ शामिल हुए हैं।

पुलिस महानिदेशक श्री शुक्ला ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिए प्रसारित होने वाले समाचारों एवं विचारों के चयन से लेकर संपादन की एक व्यवस्था है, लेकिन समाज पर व्यापक प्रभाव छोडऩे वाले सोशल मीडिया में संदेश के संपादन की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए यह आवश्यक है कि सोशल मीडिया से प्रसारित विचारों और सूचनाओं को संतुलित करने के लिए कोई व्यवस्था बनाई जाए। लेकिन, कोई भी व्यवस्था या कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक उसे समाज से सहयोग न मिले। इसलिए सोशल मीडिया का नियमन करने की व्यवस्था बनाने में सामाजिक सहमति आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संवाद का नया माध्यम अप्रत्याशित संभावनाओं से भरा है। अप्रत्याशित स्थितियां अधिक चुनौतीपूर्ण होती हैं। तनावपूर्ण स्थितियां एक सीमा के पार चली जाती हैं, तब उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है, जैसे कि अभी कश्मीर घाटी की स्थितियां हैं। इसलिए हमें स्वयं के लिए एक सीमा रेखा खींचनी चाहिए। श्री शुक्ला ने कहा कि अब तक तकनीक धीरे-धीरे प्रभाव डालती थीं, इसलिए बदलाव को समाज समुचित ढंग से ग्राह कर लेता था। लेकिन, अब तकनीक इतनी तेजी से प्रभाव डाल रही हैं, जिससे सामाजिक असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।

उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि एवं प्रदेश के विशेष पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण) स्वर्णजीत सिंह ने कहा कि हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन प्रश्न है कि हमें इस आजादी का उपयोग कहाँ तक करना चाहिए? क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारे विचार अन्य लोगों को आहत तो नहीं कर रहे? हमारे शब्दों और विचारों का समाज एवं देशहित में क्या योगदान हो सकता है? जब हम इन प्रश्नों पर विचार करेंगे तब हमारे ध्यान में आएगा कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के लिए कानून बनाने का यह अर्थ नहीं है कि उससे अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होगी, बल्कि यह इसलिए है ताकि एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहे। श्री सिंह ने उदाहरण देकर यह भी बताया कि दुनिया के तमाम देशों में किस प्रकार अपराध पर नियंत्रण रखने में सोशल मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहा है।

संवाद के स्वराज को समझना होगा : कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि प्रकृति हमसे अपेक्षा करती है कि हम तकनीक को समझकर उसे प्रकृति के अनुरूप ढालकर आगे बढ़ाएं। सोशल मीडिया ने 'संवाद के स्वराज' की अवधारणा को प्रस्तुत किया है। इसके लिए हमें'स्वराज' शब्द के मायने समझने होंगे। सन् 1909 के आसपास 'स्वराज' शब्द का उपयोग महात्मा गांधी ने किया था। वहाँ से हमें इसका अर्थ समझना होगा। प्रो. कुठियाला ने कहा कि आज 'ही' वाद हावी हो गया है। इस 'ही' वाद को कैसे 'भी' वाद में बदल सकते हैं, इसकी चिंता हमें करनी चाहिए। अर्थात् मैं ही नहीं, बल्कि मैं भी की भावना को आगे बढ़ाना होगा। इसमें राजनीतिक या अन्य संस्थाओं के सोशल मीडिया संवाद प्रमुख, पुलिस प्रशासन और सोशल मीडिया के आयामों का अध्ययन करने वाले लोग अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने एक शोध का हवाला देते हुए कहा कि लभगभ 10 लाख वर्ष के मानव जाति के इतिहास में सर्वाधिक बदलाव का समय 2010 से 2016 का रहा है। सबसे अधिक सोचने की बात यह है कि यह परिवर्तन योजनाबद्ध नहीं है। इसलिए इस परिवर्तन को हमें समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि नागार्जुन ने कहा था कि प्रत्येक चैतन्य और अचैतन्य में एक ही ब्रह्म है। सब न केवल एक-दूसरे से जुड़े हैं, बल्कि एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यह अवधारणा सोशल मीडिया पर लागू होती है। उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व भारत से अपेक्षा कर रहा है कि वह एक आदर्श समाज की व्यवस्था प्रस्तुत करे। ऐसे में हमें इंटरनेट और उस पर आधारित नये मीडया को समझकर उसके सकारात्मक पक्ष को आगे बढ़ाने और नकारात्मक पक्ष को कम करने पर विचार करना ही चाहिए। कार्यक्रम का संचालन कुलाधिपति लाजपत आहूजा ने किया। इस कार्यशाला की समन्वयक नवीन मीडिया तकनीकी विभाग की अध्यक्ष डॉ. शशिकला ने आयोजन की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डाला।

कार्यशाला में पहले दिन 'समाज और पुलिस के बीच जुड़ाव की आवश्यकता' पर चर्चा करते हुए नेशनलिस्ट ऑनलाइन के संपादक शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि अब बहुसंख्यक आबादी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है और यह ही कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है। उन्होंने सोशल मीडिया के नियमन के लिए स्वतंत्र शोध की जरूरत बताई। प्रदेश भाजपा आईटी सेल के प्रमुख विकास बोंद्रिया ने कहा कि आने वाले समय में प्रत्येक संगठन का स्वतंत्र संदेश चैनल होगा। जैसा कि अभी भाजपा और कैफे कॉफी डे ने बनाया है। उन्होंने कहा कि कोई संदेश दूर तक तभी जाता है, जब उसमें विश्वसनीयता होती है। बस्तर इंपैक्ट के समाचार संपादक हेमंत पाणिग्रही ने सोशल मीडिया की क्रांति को डिजिटल डेमोक्रेसी बताया। उन्होंने कहा कि हम साइबर सोसायटी की ओर जा रहे हैं। वहीं, जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि पुलिस को सोशल मीडिया के माध्यम से अपराध नियंत्रण के साथ-साथ अपनी छवि सुधारने का कार्य भी करना चाहिए। सत्र की अध्यक्षता कर रहे एडीजी (पुलिस सुधार) मैथिली शरण गुप्त ने कहा कि सोशल मीडिया विज्ञान की तरह है, जिसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। अपराध पर नियंत्रण करने में पुलिसकर्मियों को सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए।

वहीं, 'कानून व्यवस्था के लिए सोशल मीडिया की प्रयुक्त एवं अप्रयुक्त संभावित शक्ति' विषय पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने उदाहरण देकर बताया कि सोशल मीडिया के नियमन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि फर्जी फेसबुक आईडी बने हुए हैं। हमारे यहाँ प्रत्येक कर्म को लोक मंगल से जोड़ा गया है। सोशल मीडिया के संचार में भी यह होना चाहिए। जबकि एबीपी न्यूज की सोशल मीडिया विंग की सुश्री रेखा त्रिपाठी ने कहा कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं। आज भी बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो अभी इस मीडिया से नहीं जुड़े हैं। कानून होना चाहिए लेकिन इसके साथ ही हमें लोगों को आजादी देनी चाहिए। मीडिया अध्यापक आदित्य कुमार शुक्ला ने पुलिस की आईटी सेल को सक्रिय करके सोशल मीडिया के जरिए जनता से जुड़ा जा सकता है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार विवेक अग्रवाल ने कहा कि सोशल मीडिया के मंचों के सर्वर भारत में स्थापित होने चाहिए। सोशल मीडिया से जुड़े अपराध नए होने के कारण वर्तमान में हमें इनमें बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया के लिए निगरानी तंत्र होना चाहिए, लेकिन बोलने की आजादी भी होनी चाहिए। 

आज इन विषयों पर चर्चा : कार्यशाला में मंगलवार को सोशल मीडिया के कारण कानून व्यवस्था की समस्याएं, केस अध्ययन एवं चर्चा पर व्याख्यान होंगें। इसके साथ ही सुझावों एवं अनुशंसाओं के लिए समूह चर्चा की जाएगी। शाम चार बजे कार्यशाला का समापन होगा।

Go Back

Comment