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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ये किन के अस्तर फटे स्तर के नाम पे?

जस्टिस काटजू की बात से तकलीफ दरअसल सब से ज़्यादा ऐसे ही ब्लैकमेलरों को है

जगमोहन फुटेला / स्ट्रिंगर से संपादक हो जाने के सफ़र में कुछ देखा, सीखा मैंने भी है। लेकिन सब से पहले मैं उन से क्षमा मांग लूं जो समझते हैं कि पत्रकारिता सब से पवित्र पेशा है और इस में कोई बुद्धू या बेइमान नहीं है।

मेरा सवाल उन संपादकों या वरिष्ठ पत्रकारों से है जिन्होंने राजनीति शास्त्र पढ़ा है, विधानसभा या संसद कवर की है, सरकारों के शब्दों की भाषा और मंशाओं के मतलब समझते हैं, कूटनीति जिन्हें आती है उन्हें कैसा लगता है जब उन का वो पत्रकार जो सरकार को विदेश नीति समझाता है जिसे इतना भी नहीं पता कि संसद किसी सरकारी दफ्तर की तरह हफ्ते में पांच दिन सुबह दस से शाम पांच बजे तक नहीं चलती। जिस ने कभी किसी ला कालेज का गेट तक नहीं देखा वो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की व्याख्या करता है और जिस ने खुद कभी कार नहीं चलाई वो ऑटो एक्सपर्ट बना फिरता है। कैसे चैनलों के रनडाउन और अख़बारों की डेस्कों पे बैठे हैं वो महाशय जो आज भी 'तीन लाशें मिलीं' को 'तीन लाश मिला' लिखते चले जा रहे हैं। वो जिन के लिए तीन भी एक वचन है और लाश पुल्लिंग। 

बात सिर्फ इतनी सी भी नहीं है। बात ये है कि जब आप को पता ही नहीं है कि सेना या या युद्ध की रिपोर्टिंग का एक ज़रूरी हिस्सा राष्ट्रहित भी होता है। तो युद्ध या सेना की रिपोर्टिंग हर कोई कैसे करेगा? सेना ऐसी सी बहुत सी बातें पहले बता देती है जिन्हें वैसी परिस्थिति आने पर बताना होता है। उसे किसी को पहले कैसे बताने दिया जा सकता है? ये कैसे संभव है कि उस तरह की ट्रेनिंग के बिना आप किसी को सैन्य छावनी या युद्ध के मैदान में घूमने दो। यही स्थिति अदालतों के बारे में है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी चैनल या अख़बार है जो निचली अदालतों से ले के सुप्रीम कोर्ट तक के फैसलों पर खबर और टीका टिप्पणी नहीं करता और किसी एक ने भी अपनी टीम में कोई एक भी ला ग्रेजुएट भरती किया हुआ हो। 

बात ज्ञान की भी उतनी नहीं है जितनी किसी के भी क्लीनर से ट्रक ड्राईवर हो जाने की है। मैं एक ऐसे पत्रकार को जानता हूँ जो रोज़ डेढ़ सौ रूपये के कागज़ खरीद के अखबार छापता था। दसवीं फेल था। तीन तीन सरकारों से मान्यता प्राप्त था। चार पेज का उस का अख़बार। अकेले अपने ही शहर में चालीस 'संवाददाता'।तीन कारें । बिना रिलीज़ आर्डर के किसी का भी विज्ञापन। जो पैसे न दे उसकी खबर। पुलिस का डर और खुद अपने ही भाई पर ब्लैकमेलिंग की रपट होने के बावजूद बेखौफ और निडर। क्या गलत कहते हैं जस्टिस काटजू कि पत्रकारिता की कोई तो परिभाषा होनी चाहिए। और वो अगर होनी है तो पत्रकार की कोई तो न्यूनतम योग्यता निर्धारित होनी ही चाहिए।

 

मैं एक आपबीती बताता हूँ। मैं पंजाब के एक बड़े अख़बार में था। राजधानी चंडीगढ़ में। दो किसान आए। उनका कोई आंदोलन था चंडीगढ़ में। उसके बारे में कोई बयान देने आए थे। उन दोनों में से एक यूनियन का प्रचार सचिव था। लिखित बयान देने के और मेरे इस आश्वासन के बाद भी कि खबर चली जाएगी, वे दोनों हाथ बांध कर खड़े रहे। मैंने फिर उन्हें आश्वस्त किया कि जो खबर मैं लिख रहा था उस के बाद उन की भी खबर चली जाएगी। वे फिर नहीं हिले। मैंने सोचा, गर्मी है। पूछा, कुछ पानी वानी मंगवाऊं क्या? वे बोले, नहीं। पानी नहीं, सेवा ? मैं हैरान। सेवा कैसी? वे बोले, खबर छापने की। मैंने बिठाया उन को। पानी मंगाया। पिलाया। समझाया कि अख़बार में बयान छपने की कोई कीमत नहीं होती। वे बोले कि पिछले दस वर्षों में उन्हें तो कोई मिला ही नहीं पंजाब में कि जिस ने 'खर्च' न लिया हो। पचास से लेकर पांच सौ तक। ये भी कह कर कि पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं।  

एक बार किसी बहुत करीबी मित्र के कहने से मैं संपादक हो गया पंजाब के किसी चैनल में। पहले ही दिन मालिक ने बुला कर कहा कि हर खबर का 'कंट्रोल' मैं अपने हाथ में ले लूं। दो दिन वो बाहर था। चौथे दिन उस ने शाम को बुला कर बुला कर पूछा मुझ से कि तीन दिन में कुल कितनी खबरें चलीं और कितने पैसे आए। मेरी सिट्टी पिट्टी गुम। अब कहूं नहीं आए तो नौकरी तो गई सो गई। ऊपर से ये बदनामी और कि पैसे संपादक ले गया। लेकिन उस मालिक की सोच जितनी भी घटिया हो। मेरी ज़रूरत उसको बहुत ज़्यादा थी। वो खुल गया मुझ से। बल्कि ये शायद उस की मजबूरी भी थी। बताया उसने कि जीएम सब रिपोर्टरों से पैसे ले के खबर चलवाता है। अब ये करना है कि पैसे जीएम को नहीं, मालिक हो आएं। मैं एक दिन मौका देख के वहां से भाग खड़ा हुआ।  

ऐसा भी हुआ कि दिल्ली के एक चैनल में था मैं। लुधियाना से एक भाईसाहब आए एक प्रस्ताव ले के। वो ये कि वो अख़बार में एड देंगे। हमारे लिए रिपोर्टर, कैमरामैन भरती करेंगे। खबरें भी जो हम कहेंगे वो भिजवाएंगे और हर साल हमें एक करोड़ रूपये भी देंगे। आखिर एक दिन वे भी खुले और बता के गए कि हर रिपोर्टर से पचास हजार और कैमरामैन से तीस हज़ार लेंगे। एक एक कसबे में चार चार टीमें रखेंगे। छ: महीने बाद एड दोबारा देंगे। मैंने टीवी में ऐसे ऐसे लोग देखे जो खुद को पत्तरकार कहते थे फिर भी पत्रकार थे। ऐसे ऐसे संपादक जो जूनियर स्टाफ से ही पूछते थे कि ये 'बाईट' क्या होती है और उन्हीं की मीटिंग क्या, क्लास भी लेते थे। एक आम उसूल है टीवी का कि बहुत ही ख़ास न हो तो कोई खबर दो मिनट से लंबी नहीं चलेगी। लेकिन संपादक जी की खबर कभी सात मिनट से कम की होती नहीं थी। बुलेटिन एड निकाल के 25 ही मिनट का होता है।  

बल्कि मैं तो कहता हूँ कि तय पत्रकार की योग्यता नहीं, मालिक की मंशा भी होनी चाहिए। तय हो जाना चाहिए कि अगर वो कोई बिल्डर है तो हज़ार पांच सौ अखबारें सीएलयू हो जाने तक छपवा, बंटवा के भाग खड़ा नहीं होगा। उस पे ये लाजिम होना चाहिए कि अपने कर्मचारियों को कम से कम तीन साल का वेतन तो वो देगा ही। उसका चैनल या अख़बार चले या न चले।  

मुझे लगता है कि योग्यताएं निर्धारित होने से ऐंडे भैंडे पत्रकारिता संस्थानों की दुकानों पे ताले पड़ेंगे। जिन्हें सच में पत्रकारिता में करियर बनाना है वे कायदे के संस्थानों से सीखने लगेंगे। वे सही मायने में प्रशिक्षित होंगे तो उनकी पत्रकारिता तो जिम्मेवारी भरी होगी ही, उन के वेतनमान भी बेहतर होंगे। और सब से बड़ी बात कि ब्लैकमेलिंग का धंधा करने वालों को उनकी औकात दिख जाएगी, समाज सुखी हो जाएगा। जस्टिस काटजू की बात से तकलीफ भी दरअसल सब से ज़्यादा ऐसे ही ब्लैकमेलरों को है। रही जस्टिस काटजू को मौजूदा संस्थानों का स्तर सुधारने की सीख की बात तो वो संस्थान चलाने वालों की समस्या है। उन्हें संस्थान चलाने हैं तो स्तर सुधारना ही पड़ेगा। आप तय तो करो कि आप का भी कोई स्तर है!

 

 

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कभी कहा गया था--जब तोप मुकाबिल हो..अखबार निकालो.वह जमाना था जब पत्रकारिता कोई धंधा नहीं था.समाज और राष्ट्र के प्रति एक जिम्मेवारी थी.सभी घाटे में चलते थे और लोग अपनी जमा-पूंजी को होम कर देते थे.अब तो यह केवल मुनाफा कमाने का एक धंधा बन कर रह गया है.मैं एक लड़के को जानता हूँ.पटना के एक संस्थान से पत्रकारिता की डिग्री लेकर एक अखबार में गया.उसके लिये विज्ञापन का कोटा निर्धारित कर दिया गया.अब लिखने-पढ़ने वाला किस-किस के दर पर माथा पटके.एक चैनल वाले के पास गया...वहाँ के अनुभव से उसने तौबा कर ली.एक लड़खड़ाते अखबार में गया.तीन महीने के बाद उसे जो राशि मिली उससे ज्यादा तो वह आवागमन में ही खर्च कर चुका था.मैं विगत तीस् वर्षों से अध्यापन और सार्वजनिक जीवन में हूँ.किसी जमाने में कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन भी किया है.किन्तु आज जो स्तर बन गया है उससे बहुत पीड़ा होती है.अब तो बिना पैसे दिये किसी खबर का छपना नामुमकिन हो गया है.किसी कार्यक्रम में जाते ही प्रेस विज्ञप्ति और लिफाफे की माँग पत्रकार करते हैं.कार्यक्रम में थोड़ी देर भी उनका टिकना संभव नहीं है.विशेष अवसरों पर शुभकामना संदेश के लिये तो ब्लेकमेल करने की स्थिति बन जाती है.ऐसे में अगर कोई कुछ सुझाव देता है तो उसे सकारात्मक रूप में लेना चाहिये.

आप ने सही कहा है. आज पत्रकारिता वह नहीँ है जो स्वाधीनता संग्राम के दैर में थी. आज के अनेक पत्रकार बिकाऊ माल हैं. दूसरों को उच्चातरण की नसीहत देने वालोँ की चादर कितनी मैली है, इस का वर्णन स्वयं पत्रकार दयानंद पांडेय ने अपने एक उपन्यास में किया है.

nischit hi yeh lekh patrkarita ko aur bhi behtar karne me madad karaga, ho sakta hai isse kuch ko parasani bhi ho, lekin behtri ke liyea yeh aawasyk hai.



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