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विलक्षण था बा और बापू का साथ

समागम पत्रिका का अक्टूबर 2019 अंक महात्मा गांधी को समर्पित

संजय कुमार / महात्मा गांधी के 150वीं जयंती वर्ष समारोह की धूम हर और सुनाई पड़ रही है. सरकारी और गैरसरकारी संगठनें बापू की 150वीं जयंती को समारोह पूर्वक मनाने में लगी हुई है. आयोजनों का दौर हर ओर गूंजमान है तो वही मीडिया भी महात्मा गांधी पर सामग्री प्रकाशित कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है. पिछले 19 वर्षों से भोपाल से प्रकाशित होने वाली शोध पत्रिका ‘समागम’, लगातार गांधी पर विशेष तौर से विशेषांक लाकर गांधी जी के सपनों को जमीन पर उतारने की पहल में सक्रिय है. समागम ने अक्टूबर 2019 के अंक को महात्मा गांधी को समर्पित किया है. सिनेमा और मीडिया की मासिक शोध पत्रिका को वरिष्ठ पत्रकार और इसके संपादक मनोज कुमार बड़े जतन से इसे प्रकाशित करने में लगे हुए हैं . इस बार के ‘समागम’ को महात्मा गांधी के साथ-साथ बा को भी समर्पित किया है. कवर पेज पर महात्मा गांधी के साथ-साथ बा की तस्वीर छपी है. और विशेषांक को नाम दिया है ‘विलक्षण था बा और बापू का साथ’.

कवर स्टोरी ‘विलक्षण था बा और बापू का साथ’ को भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने लिखा है. उन्होंने आलेख में महात्मा गांधी और और उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी यानी बा पर फोकस किया है. गांधी के दांपत्य जीवन पर बादल ने कलम चलाई है. वे लिखते हैं गांधी के दांपत्य जीवन का गहराई से विश्लेषण करें तो आज के भारत में मौजूद अनेक यक्ष प्रश्नों के जवाब सहज ही मिल जाते हैं. मगर उन उत्तरों को हासिल करने से पहले हमें यह मानना होगा कि गांधी और कस्तूरबा कोई अवतार नहीं थे. वह हमारे जैसे ही हाड मांस के इंसान थे. जो बात बात में लड़ते भी थे. और रूठते भी थे. उनके बीच में अहम आता था.  उनके बीच अद्भुत टेलीपैथी थी. आश्रम के लोग अक्सर देखते थे कि बापू कभी पहले बोलते थे कि देखना बा ऐसा कहेगी, ऐसा करेगी, आश्रम के लोग दंग रह जाते हैं कि वास्तव में ऐसा ही हुआ. यह हुनर पैदा करना कोई आसान नहीं था. रिश्तों के  रसायन का ही चमत्कार था कि बापू ने कस्तूरबा को अपना अहिंसा-गुरु मान लिया था. अगर गांधीजी के अनेक सिद्धांतों को कस्तूरबा ने अपनी जिंदगी में शामिल किया. तो गांधी ने भी बा को संसार की सबसे अच्छी पत्ती माना था. ऐसे कई प्रसंगों का जिक्र किया है.

‘बापू और बा क्या थे, इसे कुछ यूं जानिए’ आलेख में जाने-माने पत्रकार गिरिराज किशोर ने रिश्तों की तस्वीर पेश की है. लिखते हैं कि नीलिमा डालमिया ने बा की डायरी पढ़कर शायद यह निष्कर्ष निकाला कि बापू पुरुष वर्चस्व के समर्थक और तानाशाह थे. वह कस्तूरबा के शरीर, मन और विचारों पर नियंत्रण रखने पर तुले थे. ‘बापू और बा क्या थे विस्तार से आलेख में बताया गया है.

डॉ. सरोज चक्रधर ने ‘गांधी जी ने बा को अपना गुरु माना था’, आलेख में लिखा हैं कि बापू सिद्धांत बनाते और बा उस पर अमल करती. वैष्णव संस्कारों में पली-बढ़ी कस्तूरबा दृढ़ निश्चयी थी. उन्होंने कभी दबकर जीना नहीं सीखा. वह निर्भयता से अपना मत प्रकट करती थी. बा और बापू की उम्र में कोई 6 माह का अंतर था.

 ‘कटनी स्टेशन पर जब कस्तूरबा जय का नारा गूंजा’ आलेख में अव्यक्त ने बताया है कि बा के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में खुद गांधी जी प्रभावित रहते थे. और इस आलेख में उन्होंने जिक्र किया है कि कस्तूरबा को श्रद्धांजलि में एक बार गांधी जी ने कहा था, अगर बा का साथ नहीं होता तो मैं इतना ऊंचा उठ नहीं सकता था यह बा ही थी जिसने मेरा पूरा साथ दिया नहीं तो भगवान जाने क्या होता है. मेरी पत्नी मेरे अंदर को जिस प्रकार हिलाती थी उस प्रकार दुनिया की कोई स्त्री नहीं हिला सकती. वह मेरा अनमोल रत्न थी. गांधी ने कस्तूरबा को एक आदर्श के रूप में देखा और इस आलेख में लेखक ने भी अपने शब्दों से स्थापित करने  की भरपूर कोशिश की है.

 ‘गांधी के विचार आर्थिक मूल्यों की कसौटी पर’ आलेख में आर जगन्नाथन ने गांधी के आर्थिक विचारों और मूल्यों पर कलम चलाई है. उनकी सोच को सामने रखने की कोशिश की है. वे लिखते हैं कि गांधी  हमेशा स्वदेशी आर्थिक मूल्यों की बात करते थे कुटीर उद्योग की वकालत करते थे. गांधी के विचार आधुनिकता पर निर्णायक विचार भी हो सकते हैं और नहीं, लेकिन उनकी नैतिक ताकत का प्रभाव अमीर लोगों पर भी पड़ रहा है. गाँधी के मूल विचार-स्वदेशी, ग्राम गणतंत्र, कुटीर उद्योग. स्वरोजगार, श्रम की गरिमा और धन की ट्रस्टीशिप- आज की डिजिटल दुनिया के काल के नहीं है, लेकिन कहीं ना कहीं उनके नैतिक सिद्धांत वैसे ही बदलाव लाए हैं, जैसे कि उन्होंने इच्छा की थी.

समाजवादी नेता रघु ठाकुर ने ‘सिविल नाफरमानी एक वक्ती प्रतिरोध और सत्याग्रह जीवनशैली’ आलेख में गांधीजी के मानवीय पक्ष और सत्याग्रह को केंद्र में रखा है. वे लिखते हैं कि गांधी का मानवता में विश्वास इतना गहरा था कि वे क्षण के लिए भी किसी दूसरे पर प्रभाव डालने या हावी होने के खिलाफ थे. अपने  निष्कर्ष सामने रखते थे और उन्हें स्वीकार करना या न करना समाज के लोगों पर छोड़ देते थे. यह बात अलग है कि लोग उनकी कही बातों को अक्षरस स्वीकार करते थे. क्योंकि उनके प्रति यह विश्वास गहरा था. लेखक लिखते हैं कि डॉ लोहिया कहते थे कि सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी गांधी के विचारों के सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र है.

अन्य विविध आलेखों में ‘21वीं सदी में गांधी की प्रासंगिकता’ देशबंधु समाचार पत्र समूह के प्रधान संपादक ललित सुरजन ने लिखा है. हिंदी के प्राध्यापक डॉक्टर चंद्र कुमार जैन ने ‘चरखी के संगीत से जन-मन जीतने वाले महात्मा’ पर कलम चलाई है. डॉ. मनोरमा शर्मा ने ‘गांधीजी का जीवन-दर्शन और संगीत चेतना’ को विषय बनाया है. रामचंद्र राही ने ‘गांधी की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी, पर कलम चलायी है. जबकि, डॉ सोनाली नरगुंदे ने ‘खादी को भारतीयता का विकल्प मानते थे गांधी’, डॉ उर्मिला पोरवाल ने ‘दक्षिण अफ्रीका के आलोक में महात्मा गांधी’, श्यामलाल चतुर्वेदी ने ‘जीवन की सीख देते गांधी के तीन बंदर’, अभिमनोज ने ‘महात्मा के सिद्धांत को जीवन में उतारने की चुनौती’, राजनाथ सिंह सूर्य ने ‘भारतीयता के पुरोधा थे महात्मा गांधी’, संजय कुमार ने ‘गांधी विचार को आत्मसात करना आज की जरूरत’, अजय बोकिल ने ‘बापू राष्ट्रभाषा हिंदी चाहते थे या राजभाषा हिंदी?’, संगीता पांडे ने ‘महात्मा गांधी, हिंदी और हिंदुस्तान’, रामपाल त्रिपाठी ने ‘समूचा विश्व ही महात्मा का परिवार था’, अवनीन्द्र ने ‘हिन्दी पत्रकारिता का गाँधी युग’, मनोज कुमार ने ‘ग्राम स्वराज का अर्थ आत्मबल का होना’, विवेक मणि त्रिपाठी ने ‘गांधी के अहिंसा एवं सत्याग्रह दर्शन का चीन पर प्रभाव’, डॉ कन्हैया त्रिपाठी ने ‘हिंद स्वराज और गांधी जी’, ओमप्रकाश कश्यप ने ‘अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार गांधी और आइंस्टाइन’, धर्मेंद्र कुमार सिंह ने ‘गांधी को पुनर्जीवित करने वाला नहीं रहा’ और डॉ वंदना कुमार ने‘ भाषायी अस्मिता और महात्मा गांधी’ आलेख में गाँधी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोधपरक प्रकाश डाला है. कुल मिला कर समागम का यह अंक पठनीय तो है ही साथ ही संग्रहनीय भी है. 

 

पत्रिका- ‘समागम”

संपादक- मनोज कुमार

अंक- 9, अक्टूबर 2019, वर्ष-19

कुल पृष्ठ-100

मूल्य-50 रूपये

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