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समाज से सवाल करता ‘बीमार मानस का गेह’

 संजय कुमार/ अपने तेवर को लेकर चर्चित कवि-आलोचक मुसाफिर बैठा अपनी सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह ‘बीमार मानस का गेह’ से चर्चे में है। रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित ‘बीमार मानस का गेह’ में 38 बेहतरीन कविताओं को चार खंडों में बांटा गया है। प्रसिद्ध हिंदी आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने भूमिका में मुसाफिर बैठा की कविताओं को जीवन के अनुभवों से अनुप्रेरित और मुसाफिर बैठा को संभावनाओं से भरे पूरे ताजा कवि बताया है। प्रसिद्ध कथाकार प्रेमकुमार मणि ने भी दलित कवि-आलोचक मुसाफिर बैठा की कविताओं पर लिखा है। संगृहीत रचनाओं पर बात करते मणि बताते हैं कि ‘संग्रह की तमाम कविताएं पाठकों को नये विमर्श के लिए विवश करती हैं। आम अथवा गैर दलित कविताओं का पाठक थोड़ा निराश हो सकता है कि स्वेटर बुनती महिलाएं या बम फोड़ते युवाओं के मिलने की संभावना यहां कम है’।

चलिये अब बात ‘बीमार मानस का गेह’ कविता संग्रह पर की जाये। 'भ्रम की टाटी सबै उड़ांणी' खण्ड में दस कविताएं हैं। सभी पठनीय तो हैं ही साथ ही विमर्श देती हैं। मेरी देह बीमार मानस का गेह है/बुद्ध फिर मुस्कुराए/सुनो द्रोणाचार्य/ सुनो सरस्वती/चमत्कार/ भक्त अनुकूलन/ ईश्वर बनाम मनुष्यता/ ईश्वर के रहते भी/ फिर भी आधुनिक/ खल साहित्यिकारों का छल वृत्तांत जैसी कविताओं में कवि के दलित होने का दंश और जातीय भेदभाव के प्रति चिंता और उसका अंकन साफ दिखता है। कविता के जरिये कवि ने समाज के अंदर फैली अस्पृश्यता यानी द्विजों और दलितों के साथ भेदभाव की अमानुषिकता पर जहां चोट किया है वहीं ईश्वर को भी घेरे में लिया है। कविता ‘मेरी देह बीमार मानस का गेह है’ में एक दलित की पीड़ा साफ दिखती है और वह शब्दों से अपनी स्थिति का चित्रण करता है। बुद्ध की मुस्कुराहट को भी मुसाफिर जी ने ‘बुद्ध फिर मुस्कुराए’ कविता में घेरा है। सवाल भी उठाया है, समाज के अंदर भेदभाव व हिंसक होते देश-समाज के बीच उनके नाम पर पलने वाले विकृत चलनों एवं विकारों को भी देख बुद्ध मुस्कुरा रहे होते।

कवि ने ‘सुनो द्रोणाचार्य’ कविता में द्रोणाचार्य के छल कपट को नंगा किया है और ललकारा भी है। अब लदने को हैं/ दिन तुम्हारे/छल के/बल के/ छल-बल के/ लंगड़ा ही सही/ लोकतंत्र आ गया है अब/ जिसमें एकलव्यों के लिए भी पर्याप्त स्पेस होगा। द्रोणाचार्य के साथ ही सरस्वती को भी कवि ने ललकार लगाई है। कविता ‘सुना सरस्वती’ में शिक्षा में जातीय भेदभाव को सामने लाते हुए सवाल दागा है -'हे बुद्धि वारिधि वीणापाणि कही जानेवाली देवी/ खल ब्रह्मणों के छल-बल के आगे/ क्यों तुम्हारी विवके-बुद्धि भी जाती है मारी/ तुम्हारी वीणा क्यों नहीं झंकृत कर पाती/ उन छलबुद्धि दिलों को/ क्यों चूक जाती है तुम्हारी मनीषा/छलियों की भेदबुद्धि-वेदबुद्धि के आगे।'

दूसरे खण्ड यानी ‘ऊँचे कुल क्या जनमियां’ में कवि मुसाफिर बैठा ने दलित पीड़ा को समाज के सामने ला खड़ा किया है। आरक्षण बनाम आरक्षण/ ईश मोर्चे पर औकात/ संस्कार महिमा/ संस्कारी वामपंथी/नाम सुख/ दादा का लगाया नींबू पेड़/ अछूत का इनार । कविता समाज का आइना है जिसे कवि ने अपने नजरिये से देखा है। इस खण्ड में भी सभी रचनाएं सामाजिक मुद्दे पर केन्द्रित हैं। कवि और सभी कविता में समाज के प्रति आक्रोश है। एक महत्वपूर्ण कविता है ‘अछूत का इनार’। इस पर प्रेमकुमार मणि ने सही लिखा है, ‘अछूत का इनार’ प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुआं’ की याद दिलाती है, लेकिन है एक भिन्न अर्थ में। दलित अस्मिता के प्रतीक के तौर पर मिहनत मशक्कत से गढ़ा गया यह कुंआ, जिसकी जगत पर नागा बैठा (काव्य नायक के दादा) नाम खुदा है, आज चापाकाल के जमाने में अप्रासंगिक हो गया है। गहरे उतरने पर यह कविता कई अर्थ संप्रेषित करती है। यही बोध इस खण्ड की तमाम कविताओं में साफ दिखता है। बिलकुल सही आंकलन किया गया है ।

तीसरे  खण्ड ‘हिरदा भीतरि आरसि’ में कवि ने दस कविता में जीवन के विभिन्न रंगों को रेखांकित किया है। एंग्री यंग मैन हंग्री ओल्डमैन/राम और सलमान खान/कुत्तजिन्दगी/मति का फेर/गिरवी दर गिरवी/गाली/स्त्री देह का उत्सव/प्रियजन/सामान्य जन/ कोशी अंचल में बाढ़ : वर्ष 2008 इसके साक्षी हैं तो वहीं, चौथे और अंतिम खण्ड, ‘मन के भींगल कोर’ में ग्यारह कविताएं हैं जो परिवार के पात्रों के इर्द-गिर्द हैं- पिता की निर्ब्याज याद/ मां की आंखों में पिता/ मां का अछोर आंचल/बिटिया की जन्मकथा/ प्रेम की पेंगे बढ़ाती लड़की/ पचीस साल पुराने स्वेटर के बारे में/बुढ़ाते बालों के पक्ष में/ बड़े भाई साहब की लिखने की पाटी/मौतों से उपजी मौत/ अरर-मरर के झोपरा/ अपना शहर एक सुबह असहज। इन कविताओं में व्यक्तिगत व्यथा तो है ही साथ ही सामाजिक, मानवीय और पारिवारिक व्यथा भी है जो लगती तो कवि की व्यथा है लेकिन यह हर उस वंचित व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है जो समाज और अमानवीय सोच से पीड़ित है। मुसाफिर बैठा की कविताओं में आवेग है। भाषा में सादगी और ताजापन है। कविता के शब्द समाज से सवाल पूछते मिलते हैं। कुल मिला कर यह एक पठनीय काव्य संग्रह है।

* काव्य संग्रह -  ‘बीमार मानस का गेह’

* कवि-  मुसाफिर बैठा

* संस्करण-2018

* मूल्य-100 रुपये

* प्रकाशक- रश्मि प्रकाशन, 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, कृष्णा नगर, लखनऊ- 226023

 

 

 

 

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