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दलितों के खाद्य जीवन को रेखांकित करता:‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’

April 5, 2015

एक ऐसा दस्तावेज जो वर्ण,जाति व धार्मिक व्यवस्था की पोल खोलता दिखता है और उनके खान-पान को रेखांकित करता है

पुस्तक समीक्षा / संजय कुमार। महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक शाहू पाटोले अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’ से चर्चे में हैं। मराठी में लिखी गयी यह पुस्तक वर्ण व सामाजिक व्यवस्था पर चोट करती है। लेखक श्री पाटोले ने पुस्तक में वर्ण व्यवस्था पर सवाल उठाया है। लेखक लिखते हें कि उच्चवर्गियों की ऐसी धारणा है कि अन्न पूर्णब्रह्म होता है, लेकिन मैं जिस वर्ण में जन्म ओर मेरी जाति जिन वर्ण में है वह शुद्र भी नहीं। हम तो अतिशुद्र हैं और मेरे पूर्वसूरियों ने भूख मिटाने के लिए जो-जो खाया वह तो अब निषिद्ध माना हुआ था। तो वह अपूर्णब्रह्म ही हुआ न ?

 ‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’ पुस्तक एक जीवंत दस्तावेज है। एक ऐसा दस्तावेज जो वर्ण,जाति व धार्मिक व्यवस्था की पोल खोलता दिखता है और उनके खान-पान को रेखांकित करता है। लेखक ने पुस्तक को लिखते समय एक दायरा को तय किया और उसी में बातों को रखा है। पुस्तक में महाराष्ट्र की मूल दो जातियांे को केन्द्र में रखा गया है। ये जातियां है महार और मांग (मालंग)। जो आज भी गो मांस खाती है। इन दो जातियों की जनसंख्या यहां के मुस्लिमों से ज्यादा है। मुस्लिम 11प्रतिशत है और ये दो जातियां करीब 12 से 14 प्रतिशत हैं।

इसमें से महार जाति के लोग डॉक्टर बाबा साहेब के साथ बौद्ध धर्म में गये, लेकिन  समाज हिन्दू ही रहा। इन दो जातियों की खाद्य संस्कृति एक ही है। दलित साहित्य में इन जातियों के खाद्य जीवन के उल्लेख आते हैं, लेकिन उनका सविस्तार लेखन किसी ने नहीं किया था। श्री पाटोले ने  प्रथम बार इसे पुस्तक के माध्यम से मुद्दे को उठाया है।

‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’ में लेखक कहते हैं कि इन दो हिन्दू जातियों का संस्कार को आभार मानना चाहिए कि, इन दो जातियों ने वैदिक धर्म यज्ञकाल के अवशेष आज भी जतन किये हैं, जो खाद्य के रूप में आज भी प्रचलित है।

ये चातुर्मास जो पालन करते हैं। साथ ही सभी वर्णिक या जातियां शारीरिक कष्ट लिये बिना अपना जीवन यापन करती है जो खेती या और श्रम के काम करते हैं, उन्हें चातुर्मास में बांधा नहीं है। अनाज सेवन करना या अन्न की संस्कृति वर्णों के अनुसार उपर से नीचे आती है। कभी भी अपवाद से भी अन्न पदार्थ नीचे से उपर नहीं गया, जिस तरह चार वर्णों में जातियां बद्ध की गयी थी वैसे ही खाद्य संस्कृति वर्णों में बद्ध किया गया है। उपर का वर्ण क्या खाता है वह निचले वर्ग को कुछ पता होता है, लेकिन निचला क्या खाता है, यह उपर वाले को भी पता नहीं होता।

ब्राह्मण-क्षत्रीय-वैश्य-शूद्र-अतिशूद्र दक्षिण भारत की या विन्धय पर्वत के नीचे का जो प्रदेश है वहां की संस्कृति उत्तर भारत से अलग है तथा खाद्य संस्कृति में भेद है। वहीं  शैव, वैष्णव, लिंगायत, भूल निवासी ऐसे कई सामाजिक घटक है, जो कुछ सीमाआंे तक भिन्न हैं। इसके लिए लेखक ने मराठा में जितना वैष्णवों का साहित्य है उसे खंगाला और दस्तावेज बनाने की पहल पुस्तक में की है। साथ ही पुस्तक को दस्तावेज बनाने के लिए मराठी के तिरेपन संतों की कथा साहित्य लोक चरित्र, भागवत और अन्य साहित्य का भी अध्ययन कर लेखक ने बात को रखी। ‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’  पुस्तक को चार भाग में बांटा हैं। जैसे, खाद्य जीवन की शुरूआत, दलितों का खाद्य जीवन/उनका सामाजिक स्थान, खाद्य जीवन में प्रयोग में आने वाली वस्तुएं, और बनाने की विधि। संत साहित्य की चर्चा करते हुए लेखक बताते हैं कि खाद्य जीवन मध्ययुग से इस प्रकार रहा था, उदा॰-सात्विक (जो बा्रह्मण खाते थे), राजस-(क्षत्रियों के लिए) और तामस-(अन्य वर्णों के लिए)। जो भागवत साम्प्रदाय से खाद्य संस्कृति का विभाजन हुआ है। कुल मिला कर पुस्तक ‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’ दलितों के खाद्य जीवन को समाने लाता है और वर्ण व जाति व्यवस्था की भी पोल खोल जाता है।     

पुस्तक: ‘अन्न हे अपूर्णब्रह्म’

लेखक: शाहू पाटोले

प्रकाशक: जनशक्ती वाचक चळवळ, औरंगाबाद।

संस्करण: प्रथम

मूल्य: 200 रूपये

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