विनीत कुमार/ एक यूट्यूबर ने मुझे दूर से देखा, शायद ट्रोल करने के इरादे से... मेरी तरफ बढ़ा. वो अपना काम करता रहा, मैं अपना काम.
शानदार आदमी है, इसको मत रोको यार...
कैसे पेश आते हैं, लोग सब देखते हैं. भरोसा एक दिन में नहीं बनता, हर रोज़ कमाना पड़ता है.
ये पंक्तियों आजतक न्यूज़ चैनल जिसका दावा सबसे तेज़ होने का रहा है, उस वीडियो का है जिसे आजतक ने हैशटैग भरोसा कमाया जाता है के साथ जारी किया है. दर्शकों के बीच चैनल कैसे अलग दिखे, उसकी कैसी विश्वसनीयता रही है, लोग कैसे इसे बाक़ी चैनलों से अलग मानते और देखते हैं, इन सबको लेकर चैनल अपने शुरुआती दौर से ऐसे प्रोमोशनल वीडियो जारी करता रहा है. शोध के लिहाज़ से मीडिया अध्येताओं के लिए ये बहुत ही दिलचस्प और ज़रूरी विषय हो सकता है जिसके तहत वो शुरु से लेकर अब तक के वीडियो को पाठ के रूप में शामिल करते हुए इसके भाषाईअंदाज़ और शामिल विज़ुअल्स का अध्ययन कर सकते हैं. पुरानी ब्लैक एण्ड व्हॉइट क्लिप में तो अनुराग कश्यप भी नज़र आएंगे और आजतक के लिए उनके तैयार किए विज्ञापन भी. ये विज्ञापन इतने दिलचस्प हैं कि आपको बार-बार देखने का मन करेगा और आजतक का दर्शक होने पर अच्छा भी महसूस होगा. एक समय चैनल का मतलब आजतक और सच और ख़बर एक-दूसरे का पर्याय हुआ करते.
एक पेशेवर चैनल के तौर पर आजतक की विश्वसनीयता एक दौर में ऐसी रही है कि देश के दर्शक दूरदर्शन से कहीं ज़्यादा आजतक पर भरोसा करते. उन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी में से एक रॉयटर ने जब सर्वे किया तो लोगों ने आजतक को दूरदर्शन से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद और पसंदीदा चैनल बताया. जिन दिनों आजतक, एक न्यूज़ कैप्सूल के तौर पर दूरदर्शन पर प्रस्तुत किया जाता, उसकी धार और असर से राजनीतिक सत्ता को असहजता महसूस होने लगी. तब एक दिन तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन ने अपनी बैठक में साफ़ शब्दों में पूछा- क्या, ये संभव है कि एक अख़बार के दो-दो संपादकीय हो ? ज़ाहिर है कि इसका जवाब न में है..इस पर उन्होंने आगे कहा कि तो फिर दूरदर्शन पर ऐसा क्यों है ?
सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल या गंठबंधन की रही हो, दूरदर्शन अपने शुरुआती दौर से “सरकारी भोंपू” कहलाए जाने के लिए अभिशप्त रहा है. इस बारे में ज़्यादा जानने-समझने के लिए सैवंती निनन की “Through the Magic Window”, “Politics after Television: Hindu Nationalism and the Reshaping of the Public in India”, भास्कर घोष की “Doordarshan Days” नलिन मेहता की “India on television: How Satellite News Channels Have Changed the Way We Think and Act”, कूमी कपूर की “The Emergency: A Personal History”, गंगाधर शुक्ल की “वक़्त बदलता है” और सुधीश पचौरी की किताब “दूरदर्शनः दशा और दिशा”पढ़ी जा सकती है. ख़ैर,
मीडिया अध्योताओं के लिए शोध का यह बहुत ही दिलचस्प और गंभीर विषय हो सकता है कि जिस आजतक को देश और बाद में देश से बाहर के भी दर्शकों ने राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद और लोकप्रिय माना, उसकी लोकप्रियता कैसी दिनोंदिन ढहती चली जा रही है और उसी अनुपात में भरोसा भी. लम्बे समय तक आप रिपोर्टिंग करने फ़ील्ड में चाहे जिस भी चैनल की माइक के साथ चले जाएं, लोग दूर से ही देखकर कहा करते- आजतकवाले आए हैं. पास आने पर घटना हत्या से जुड़ी हो चाहे होली पर होने जा रहे उत्सव की, अलग से कुर्सी लेकर आते, कोई घर से स्टील की गिलास में चाय लेकर दौड़ मारता. आजतक वाले आए हैं मतलब कुछ न कुछ बदलेगा, सुनवाई होगी, बेहतर होगा, हमारी आवाज़ उन तक पहुंचेगी जिनके खिलाफ़ हम नारे लगा रहे हैं.
मुझे यह बात लिखते हुए प्रतीक त्रिवेदी की पीटीसी जो कि अब न्यूज़ 18 में “भैयाजी कहिन” नाम से शो लेकर आते हैं, याद आती है. उस वक़्त टीवी टुडे नेटवर्क का दिल्ली केंद्रित चैनल हुआ करता- दिल्ली आजतक. न्यूज़रूम में इनके लिए काम करनेवाले को आजतकवाले नहीं, डैटवाला कहा जाता. मैं त्रिवेदीजी के साथ इन्टर्न की हैसियत से साथ जाया करता. उनकी यूनिट, चाय-पानी, पेन-नोटबुक जैसी छोटी-मोटी ज़रूरतों का ध्यान रखता. जंतर-मंतर पर पहुंचते ही जब उन्होंने पीटीसी शुरु की तो मैंने दूर कोने में खड़े होकर सुनने लगा-
“आज मैं दिल्ली के जिस इलाक़े में खड़ा हूं, वहां से कुछ भी कहा जाय तो आवाज़ सीधे सरकार के कानों तक जाती है. जी हां- ये जंतर-मंतर का इलाक़ा है.”
ख़बर चली, धुआंधार चली और दिल्ली आजतक के साथ-साथ आजतक की टीम ने भी रनडाउन पर लगाया और जिन मांगों के लिए लोग वहां धरने पर बैठे थे, शाम होते-होते उनकी मांगे मान ली गयीं. तब त्रिवेदीजी ने तो मांग कर रहे लोगों पर किसी तरह का शक़ किया, न उन्हें किसी ने हूट किया, न चैनल के लिए अलग से कोई मेटाफर का इस्तेमाल किया और न ही हाथ में माइक आ जाने पर उनके भीतर तारनहार होने का अतिरिक्त भाव पैदा हुआ. वो जिस काम से वहां गए, पेशे की जो मांग होती है, वो किया और वापस वीडियोकॉन टावर, अपने दफ़्तर आ गए. लेकिन
जो सबसे ज़रूरी बात है वो ये कि त्रिवेदीजी या फिर दूसरे कोई भी रिपोर्टर-एंकर कितनी भी मंहगी गाड़ी और सुसज्जित क्रू के साथ जाते, लोगों के बीच पहुंचते ही उनके हो जाते, उनके बीच से निकले हुए लोग लगने लग जाते. कोई लाट साब या मेम साब नहीं और इसलिए इनके पहुंचते ही लोगों में उत्साह, भरोसा और आत्मीयता बढ़ जाती. उसी में यूनिट समेटते हुए कोई बिटुआ-बिन्नी मुंह में उंगली डालकर, नज़दीक आकर विस्मय से उनके काम को देखता तो उसकी माँ कहती- तुम भी पढ़ेगा, लिखेगा...तब न ऐसे ही सबका दुख-सुख दुनिया को बतावेगा.
त्रिवेदीजी जैसे बाक़ी एंकर-रिपोर्टर इन बच्चों से थोड़ी-बहुत बात भी कर लिया करते और वो और उनकी माँ गाड़ी में बैठते वक़्त तब तक हाथ हिलाते रहते, जब तक आंखों से ओझल न हो जाय.
हम संभवतः आख़िरी पीढ़ी के लोग हैं जिन्होंने अपनी आंखों से एक निजी चैनल के प्रति लोगों के भरोसे, बेपनाह प्यार और उम्मीदों को देखा और पहली पीढ़ी के लोग हैं जो साथ में उन आंखों में नाउम्मीदी, हताशा, उदासीनता और धीरे-धीरे गुस्सा, असंतोष और नाउम्मीदी देख रहे हैं. अब तो ये इतना गहराता जा रहा है कि यकीं करना तक मुश्किल हो जाता है किये देश के नागरिकों के लिए काम करते हैं, लोकतंत्र को बेहतर, सुंदर और संभावनाओं से भरा हुआ देखना चाहते हैं. इस बीच एक पूरी पीढ़ी तैयार हो गयी है जिसने जब से न्यूज़ चैनल देखना शुरु किया, एक बेहतर नागरिक गढ़े जाने के माध्यम के तौर पर इसे कभी नहीं देखा. ये पीढ़ी जब देखती है कि
चैनल कुछ विज़ुअल्स जुटाता है जिसमें रिपोर्टर उस समधीश भाटिया को एक यूट्यूबर को हैसियत बताने के अंदाज़ में बताता है जैसे सड़क पर चलता यूं ही कोई कनठेंपी लगाकर घूमनेवाला शख़्स है जिसे कि हमारी पीढ़ी के लाखों लोग देखते, फॉलो करते हैं और जिसके क्यूट अंदाज़ में रीढ़ बचाए रखने के कायल होते हैं तो इस पीढ़ी को बुरा लगता है. ये रिपोर्टर जब विज़ुअल्स पुलिस के सामने उदारता बरतते हुए कहता है कि ये शानदार आदमी है, इसे मत रोको यार तो इस तारीफ़ में भी रहम-ओ-करम का भाव पैदा होता है. ऐसा लगता है कि तुम कुछ भी कर लो, पुलिस हमें जानती-पहचानती है और हमारी इस सत्ता के आगे तुम कुछ नहीं हो..भले ही तुम्हें लाखों लोग देखते और दिग्गज इंटरव्यू के लिए हाज़िर रहते हों.
जंतर-मंतर के आसपास के इन विज़ुअल्स को काटकर चैनल ने #BharosaKamayaJataHai कैम्पैन के साथ जिस तरह इस्तेमाल किया है, चैनल का ख़ुद से यह सवाल करने का साहस बहुत पीछे छूट गया है कि जिन लाखों लोगों का भरोसा टूटा है या फिर मौज़ूदा पीढ़ी का कभी भरोसा बन ही नहीं पाया, उनके सिरे से क्या किया जाय ? ज़ाहिर है, ये काम समधीश भाटिया को एक ट्यूबर, जातिवाचक संज्ञा में बदलकर तो नहीं ही. पुलिस आपके रिपोर्टर को पहचानती है, अच्छी बात है लेकिन यही आपके लिए भरोसा का मतलब है तो सोचकर देखिए कि आपने अपनी कितनी तंग दुनिया बना ली है. आपके दिमाग़ में थोड़ी देर के लिए भी ऐसे ऑडिटोरियम का दृश्य ध्यान नहीं आया जो खचाखच भरा है और समधीश जैसे देश के दर्जनों यूट्यूबर के जाने पर सारे लोग उठकर उनका स्वागत करते हैं और चीयर अप करते हैं और वहीं आपके चैनल से कोई चला जाय तो आजतक गो बैक के नारे लगने लग जाएं. ऐसा भी हो कि आपके रिपोर्टर माइक और चैनल का पट्टा लगाकर न जाएं तो कोई पहचान तक न पाएं.
मैंने बाक़ी लोगों की तरह कभी भी किसी भी न्यूज़ चैनल के लिए “गोदी मीडिया”शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, आगे करूंगा भी नहीं लेकिन आप ख़ुद से पूछकर देखिए- आप अपनी इन हरकतों के बूते भरोसा पैदा करेंगे. शायद लगाकर अपने दर्शकों के भीतर यूट्यूबर्स के प्रति शंका, डर और हिक़ारत पैदा करके आप नंबर बने रह सकेंगे ? के अलग-अलग कारणों से आपका जो इक़बाल जर्जर हुआ है, उसे दोबारा ऐसे अभियान से हासिल कर सकेंगे !

