मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

उर्मिला पँवार के साक्षात्कार पर कैलाश दहिया ने उठाया सवाल

कैलाश दहिया/ युद्धरत आम आदमी’ नामक पत्रिका के जुलाई 2014 अंक में उर्मिला पँवार का साक्षात्कार छपा है। यह साक्षात्कार ‘स्त्री काल’ नामक नेट पत्रिका पर भी देखा जा सकता है। इसमें एक सवाल आजीवक धर्म को लेकर पूछा गया है। जो यहाँ दिया जा रहा है। 

सवाल - दलित दर्शन में आजकल धर्म की भूमिका को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे है। यहां तक कहा जा रहा है कि बाबा साहब ने एक क्षत्रिय का धर्म अपनाकर बहुत बड़ी भूल की। दलित चिंतक दलित धर्म की खोज ‘आजीवक’ धर्म के रूप में कर रहे हैं तथा इस धर्म की खोज को दलित चिंतन की उपलब्धि बता रहे हैं। आपके मत में दलित धर्म की अवधारणा क्या है? तथा एक दलित स्त्री के रूप में जीवन में ‘धर्म’ की भूमिका को किस रूप में देखती है?

जवाब - धर्म की भूमिका किसी भी स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के तौर पर नकारात्मक ही रही है। धर्म घीरे-घीरे सम्प्रदायवाद एवं वंशवाद में परिणित होकर कट्टरता को ही फैलाता है। वैज्ञानिक सोच को खत्म करता है। स्त्री के लिए तो वह ओर भी खतरनाक होता है। राज्य के नियमों के साथ धर्म भी स्त्री के आचरण के लिए भेदभाव पूर्ण एक संहिता तैयार कर देता है। इसलिए धर्म वही अच्छा है जो समता, न्याय और बंधुत्त्व का पक्षधर हो और इस दृष्टि के उपयुक्त बौद्ध धर्म के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बाबा साहब ने बहुत सोच-समझकर धर्मान्तरण किया था और इस विकल्प (बौद्ध धर्म) को अपनाया था। ‘आजीवक’ की बात मुझे समझ नहीं आती; वह दलितों का धर्म नहीं हो सकता।

उर्मिला पँवार के जवाब को ले कर थोड़े में कुछ बताया जा सकता है -

1. पूछना यह है, अगर धर्म की भूमिका नकारात्मक होती है तो बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया ? फिर यह कहने में की ‘बाबा साहब ने .... धर्मातरण किया था ‘ का अर्थ है की बौद्ध धर्म हमारा नहीं। 

2. अगर आजीवक धर्म स्त्री के जारिणी होने पर रोक लगाता है तो इसमें गलत क्या है ? 

3. क्या दलितों की जरूरत ‘समानता- मानवता’ आदि के नारों की है ? जिन्हे पीटा जा रहा है और जिन की बहू –बेटियों से बलात्कार किए जा रहे हैं वे समता- बंधुत्व की बात करते अच्छे नहीं लगते। ऐसी सोच पर माथा ही पीटा जा सकता है। 

4. धर्म अपनी परंपरा से निकलता है। दलितों में यह परंपरा आजीवक की है। आजीवक धर्म में वर्ण –व्यवस्था, पुनर्जन्म और सन्यास का तो विरोध है ही, इस में जारकर्म पर तलाक की व्यवस्था शुरू से ही रही है। 

5. धर्म जन्मजात होता है। डॉ अंबेडकर बौद्ध धर्म में गिरने से पहले आजीवक थे। बौद्ध बनते ही उन्होंने आजीवक (दलित ) विषयों पर बोलना बंद कर दिया था। लगे हाथ यह भी बता दिया जाए बाबा साहब ने आजीवक परंपरा में पुनर्विवाह किया था। बाबा साहब के दादा-नाना कबीर के अनुयाइ थे और खुद वे कबीर के पद गुनगुनाया करते थे। 

6. दलितों को वह धर्म चाहिए जो उन की बहू –बेटियों को बलात्कार से बचाए। उन की बस्तियों को फूकने से से रक्षा करे। बुद्ध के पास ‘बुद्ध्म शरणम गच्छामि’ के सिवाय क्या है ? ये आजीवक जानती नहीं तो आजीवक पर कैसे बोल रही हैं ? अगर ये बौद्ध हो गई है तो उस पर ही बोलें। 

आखिर में, महान आजीवक चिंतक डॉ धर्मवीर ने यूं ही थोड़े गैर-दलितों के दलित विषयों पर लिखने पर रोक लगाई है। इसी का विस्तार है गैर- आजीवकों (ब्राह्मण, बौद्ध , जैन ) के आजीवक पर बोलने पर रोक । तो पहले उर्मिला पँवार आजीवक को जान लें फिर बात करें अन्यथा विद्वानों की श्रेणी में नहीं गिनी जाएगी।

Go Back

dharm dharmantaran se nahi,apni khud ki parampara se aata hai,dr ambedkar ne apni aajeevak parampara chhodkar baudh dharmantaran me kud pade the,dharmantaran ka nirnay dhalit samaj ka nahi,khud dr ambedkar ka nirnay tha.august,1931 aur 14 octuber,1956 ke dr ambedkar ke dharmik vaktabyo ko padh kar ye baat samjhi ja sakti hai.aaj dalit samaj ne apne mahan aajeevak chintak dr dharmveer ke madhyam se apni mool parampara ki eitihasik khoj kar li hai,ab use udhar ke vicharo aur parampara me girne ki zarurat nahi,kisi kaum ki raxa uske apne dharm se hi sambhav hai, bharat ke alpsankhyako ki sthiti se ye baat samjhi ja sakti hai,aur hum dalit aaj apne dharm se vichchhinn hone ke karan brahmin dharm se asuraxit hain,urmila panwar ko padh aur samajh kar hi kisi par tippani karna chahiye,aadarniy dahiya ji ke sawal buniyadi hain,aasha hai urmila ji aajeevak dharm ka ithas padh kar tarkik dhang se samvad karengi,,,

Reply


Comment