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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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क्या सवर्णवादी-जातिवादी मीडिया से भी कैफ़ियत तलब की जा सकती है?

हेमन्त कुमार। संतोष झा और मुकेश पाठक! नाम के साथ चस्पा सरनेम से किसी को जानने में परेशानी नहीं होगी कि दोनों की जाति ब्राह्मण है! दोनों के नाम दरभंगा में सड़क निर्माण कार्य में लगी कंपनी चड्ढा एंड चड्ढा के दो इंजीनियरों की हत्या करने के कारण सुर्खियों में है. 

सवर्णवादी - जातिवादी मीडिया का बड़ा हिस्सा और सांप्रदायिक - जातिवादी पालिटिकल - सोशल गिरोह दरभंगा की घटना के बाद ज़ोर-जोर से चिल्ला रहा कि बिहार में कथित 'जंगलराज' की वापसी हो गयी है. कुछ परोक्ष रूप से तो कुछ सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव को इन घटनाओं के लिए दोषी बता रहे हैं.

यह बताते हुए कि मैं लालू प्रसाद का घोर आलोचक और थोड़ा-सा प्रशंसक हूं. क्या कोई मुझे यह समझायेगा कि ब्राह्मण कुल में पैदा हुए दो गुंडे संतोष झा और मुकेश पाठक किस लिहाज से 'जंगलराज ' के कथित नायक लालू प्रसाद के सिपाही हैं. या यह कि ये दोनों लालू प्रसाद के 'सपनों के जंगलराज के फ़रिश्ते ' हैं. जिनके हर कुकर्म के लिए लालू प्रसाद ही जवाबदेह होंगे

क्या इन गुंडों की हरकतों के लिए ब्राह्मण - भूमिहार नेताओं, सवर्णवादी-जातिवादी मीडिया से भी कैफ़ियत तलब की जा सकती है. अगर नहीं तो लालू प्रसाद से ही से जवाब तलब करने या उन्हें ही दोषी या खलनायक बता देने का औचित्य क्या रह जाता है!

दरभंगा या बिहार में होनेवाली अपराध की तमाम बड़ी घटनाओं के लिए सरकार से ही जवाब तलब किया जाना चाहिए. लेकिन इन घटनाओं का सामाजिक- राजनीतिक कोण तो देखना ही होगा. 

कुछ लोग ठसक के साथ कहते-सुनते मिल जायेंगे कि अपराधियों की कोई जाति नहीं होती! अगर ऐसा ही है तो जाति के आधार पर कोई कुख्यात अपराधी कैसे पूजनीय हो जाता है! 
दरअसल ये वही लोग है जो अपनी-अपनी जाति के गुंडों को मसीहा साबित करने में जुटे रहते हैं!

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना