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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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क्यों सनक को ही पत्रकारिता का पर्याय बना दिया?

एंकर विकास शर्मा की मौत, एंकर और मीडियाकर्मियों को एक सबक!

विनीत कुमार। रिपब्लिक भारत के स्टार एंकर विकास शर्मा की मौत उन सभी एंकर और मीडियाकर्मियों को एक बार फिर से सोचने की सलाह देती है कि क्या बिना चीखे-चिल्लाए ख़बरें नहीं बतायी जा सकती ? क्या सहज ढंग से बात करने और पेश आने से दर्शक टीवी देखना बंद कर देंगे ?

आज मैंने अर्णब गोस्वामी को सुना. आज वो अपने सहकर्मी की मौत की ख़बर ऐसे बता रहे थे जैसे कि अब रो देंगे. आवाज़ में विकास शर्मा के अचानक इस तरह चले जाने की तक़लीफ साफ झलक रही थी. क्या ये अंदाज़, ये लहजा बाकी लोगों की मौत और उनके साथ हुए हादसे से जुड़ी ख़बर के साथ भी बना रहता है तो व्यूअरशिप घट जाएगी ? आख़िर क्यों इन्होंने सनक को ही पत्रकारिता का पर्याय बना दिया ?

अर्णव ने विकास शर्मा की मौत की वज़ह बताते हुए कहा कि उन्हें कोरोना हुआ था, उन्होंने इसका डटकर मुकाबल किया लेकिन पोस्ट कोविड में जो पेंचीदगी आयी कि वो संभल नहीं पाए.

दिल्ली सहित भारत के दूसरे हिस्से के साथ स्थिति अच्छी है कि कोरोना के नए मामले न के बराबर आ रहे हैं. इस संबंध में हाल में जारी रिपोर्ट बताते हैं कि यहां लोगों के बीच इस बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता काफी हद विकसित हो गयी है. इसका एक मतलब यह भी है कि बड़ी संख्या में लोगों को यह बीमारी हुई और उबर गए, कईयों को पता तक नहीं चला और वो काम करते रहे. लेकिन मानसिक स्तर का तनाव, डिप्रेशन, हायपर टेंशन और रोज़गार ख़त्म हो जाने, कमाई कम हो जाने या फिर नौकरी चले जाने से देश का बड़ा हिस्सा अवसादग्रस्त है. सबकुछ सामान्य दिखते हुए भी इन सबका असर हमारी ज़िंदगी पर है.

वैसे तो न्यूज चैनलों से मुझे कोई उम्मीद रही नहीं लेकिन जो हालात पैदा हो रहे हैं और जिस ज़द में एक बड़ी आबादी आ जा रही है, कुछ और नहीं तो कम से कम एंकर-मीडिया और पैनलिस्ट अपनी वॉल्यूम तो कम रख ही सकते हैं जिससे कि दर्शक मनोरोगी होने से बच सके, उसे इस माध्यम से कम से कम रोग न मिले. 

हमलोग एक बात शायद नज़रअंदाज़ कर रहे हैं लेकिन सच है कि इस देश के लोगों के बीच मानसिक स्तर की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. कल को बाक़ी कारणों के साथ-साथ न्यूज चैनल भी एक वज़ह बनते हैं तो शर्मनाक स्थिति होगी

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