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___________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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कैसे कैसे रिसर्च स्कालर!

अरुण आजीवक/  एक रिसर्च स्कालर हैं प्रदीप कुमार गौतम। ये रिसर्च नहीं बल्कि भाषणबाजी करते हैं। भाषणबाज बनने का दंभ भरते हैं। यू ट्यूब पर अपलोडेड अपने एक भाषण का इन्होंने कैलाश दहिया जी के दिनांक 28 जून, 2020 की एक फेसबुक पोस्ट 'कुसुम वियोगी और कबीर कात्यायन में क्या अन्तर है?' पर टिप्पणी करते हुए लिंक भेजा। अपने भाषण में ये सद्गुरु रैदास के नाम का एक पद पढ़ रहे हैं। दिनांक- 03 जुलाई, 2020 को फोन कर मैंने इन से उस पद का संदर्भ पूछा। इन्होंने बताया वह पद डा. राम भरोसे की किताब 'संत रविदास : एक समाजसुधारक, चिंतक और दार्शनिक' में है। यह किताब तब मेरे पास नहीं थी। इस कारण मैंने इन्हें what's app पर 03 जुलाई, 2020 को ही टेक्स्ट मैसेज किया जो इस प्रकार है -

"आप के पास यदि डा. रामभरोसे सर की किताब हो तो कृपया उस पद वाले पृष्ठ की फोटो भेजें जिसे आपने अपने भाषण में सुनाया है।" 22:45 पर। एक और मैसेज किया -

"यू ट्यूब पर आप का भाषण सुन रहा था लेकिन पद ठीक से समझ में नहीं आ रहा है।" 22:46

लेकिन, आज जुलाई की 16 तारीख हो गई है, इन्होंने मेरे उक्त दोनों मैसेजों का रिप्लाई नहीं दिया है। खैर, किताब के प्रकाशक से मैंने उक्त किताब अभी दो दिन पहले मंगवा ली है।

यह प्रक्षिप्त किताब 'अनीता पब्लिशिंग हाउस 93, आजाद इंक्लेव, पूजा कालोनी, ट्रोनिका सिटी, गाजियाबाद-201103' से छपी है। इस किताब में विभिन्न प्राध्यापकों/शोधार्थियों के कुल 21 लेख संकलित हैं, जिस का सम्पादन किया है - डा. राम भरोसे और डा. ममता खंडाल ने। इस किताब में प्रदीप कुमार गौतम का भी एक लेख 'संत रविदास के लोक प्रचलित क्रांतिकारी विचार' पृष्ठ 108 से 112 पर संकलित है। आश्चर्य की बात यह है कि, रैदास का बता कर जो पद ये अपने यू ट्यूब वाले भाषण में गा रहे हैं, वह पद खुद इन्होंने अपने ही लेख में दिया है। फिर, मेरे द्वारा संदर्भ पूछने पर ये चुप क्यों हो गए? आज तक कोई उत्तर क्यों नहीं दिया? जब इन्होंने खुद अपने लेख में उस पद को लिखा है तो, संदर्भ बताने में क्या दिक्कत आ रही है? क्या यही इन की भाषणबाजी है! ये भाषण दे रहे हैं। एक स्त्रोता के रूप में जब मैंने इन से इन्हीं के भाषण का संदर्भ मांग लिया तो इन्होंने चुप्पी साध ली। इस पर इन को मेरी सलाह है कि आगे से ये गूंगे-बहरों के बीच ही भाषण दिया करें। दलित पत्र-पत्रिकाओं, किताबों में पन्ने काले कर रहे और मंचों पर मुँह फाड़ रहे ऐसे अम्बेडकरवादी और नवबौद्धों को देख लें।

ये उस पद का संदर्भ क्यों नहीं दे पा रहे हैं? क्योंकि इन्हें खुद ही नहीं पता। जिस पद को इन्होंने अपने भाषण में गाया है और जिसे अपने लेख में लिखा है, वह इस प्रकार है -

"ब्रह्मा द्वारा रची सृष्टि वा सरस्वती आई

बाप बेटी की हुई बंदगी, फिर सृष्टि अदम रचाई।

वेद कटेव भागवत गीता यह भी फूंके नाहीं

कह रविदास सुन रे बाभन तेरे वेद ने नारि लुटाई।।"

इस पद का सन्दर्भ इन्होंने इस प्रकार दिया है -

"1. 30 जनवरी 2018 BHU वाराणसी में हुए सेमिनार में पढ़े गए शोध आलेखों की रिकार्डिंग से।"

किस के शोध आलेख की रिकार्डिंग से? भला यह भी कोई संदर्भ हुआ! इन्होंने अपने लेख में लिखा है -

"उनकी (रैदास) की यह क्रांतिकारी वाणी वाराणसी के एक सेमिनार में विद्वान वक्ताओं द्वारा सुनने को प्राप्त हुई। जब मैंने इसके संदर्भ पूछा तो उन्होंने बताया कि हरियाणा और पंजाब में आज भी रविदास की यह वाणी लोक गायन में प्रचलित है, जिसे मैंने टेब कर लिया.. "

कौन विद्वान वक्ता? कोई नाम नहीं। मतलब इन के विद्वान वक्ताओं के पास भी कोई संदर्भ नहीं। यह कैसा संदर्भ हुआ कि कबीर-रैदास के पद फलां प्रदेश के फलां लोगों द्वारा गाये जाते हैं। शोध का अर्थ क्या है? रिसर्च स्कालर का काम क्या है? इन लोक प्रचलित पदों की प्रामाणिकता की जाँच करना। इन्होंने लोगों द्वारा गाये जा रहे सद्गुरुओं के पदों की प्रामाणिकता को बगैर जाँचे-परखे उन के प्रमाणिक पद कैसे मान लिया! इस का मतलब ये और इन के विद्वान वक्तागण उन सारे किंवदन्तियों को भी सच मान रहे हैं जिन्हें ब्राह्मण ने हमारे सद्गुरुओं के सम्बन्ध में लोक में फैला रखा है। फिर, इन जैसों के लिए रिसर्च, अन्वेषण, इतिहास के मायने क्या रह जाते हैं। ये तो ठहरे रट्टू तोता। जैसे वक्ता वैसे ही स्त्रोता। जैसे गाईड वैसे ही रिसर्च स्कोलर। ऐसे भाषणबाज वक्ताओं और रिसर्च स्कोलरों से दलितों को भगवान ही बचाए।

बताया जाए, उक्त पद सद्गुरु रैदास का नहीं है। एक प्रक्षिप्त पद है। प्रक्षिप्त ही नहीं बल्कि पूरी तरह से फर्जी पद है। इस पद में सद्गुरु रैदास साहेब का नाम तक गलत दिया गया है। इस पद के अलावा और तीन पद इन्होंने अपने लेख में दिये हैं। एक पद है -

"माला फेरुं न हरि भजूं मुख से कहूं न राम।

मेरा हरि मुझको भजे और मैं करूँ विश्राम।।"

सन्दर्भ वही है -'30 जनवरी 2018 BHU वाराणसी में हुए सेमिनार में पढ़े गए शोध आलेखों की रिकार्डिंग से।'

इस पद के बारे में ये महोदय लिख रहे हैं -

"सन्त रविदास के गूढ़ ज्ञान से पूरा बहुजन समाज जागृत हो रहा था, जिससे वे गुलामी की जंजीरों को तोड़कर श्रमण परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे, वे माला, हरि, राम जैसे शब्दों से परहेज करने की बात करते हैं।"

वाह! ये अभी रिसर्च कर रहे हैं लेकिन लगता है पीएच.डी. की डिग्री इन्हें पहले ही मिल गई है। तभी इन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध रखी है और अंट-संट लिखे जा रहे हैं। श्रमण परंपरा! इस के बारे में इन से पूछना ही बेकार है। इन्हें कोई बताए कि सद्गुरुओं कबीर और रैदास की ताकत उन के अपने 'राम', 'हरि' ही थे। तभी उन के अधिकांश पद हरि और राम को ले कर लिखे गए हैं। प्रदीप कुमार के ज्ञानवर्धन के लिए कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं, उम्मीद है ये पद इन की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने में कुछ लाभकारी सिद्ध होंगे-

1. "राम नाम बिन जो कछु करिए, सो सब भरम कहाई।"*

2. "कहै रैदास छूटि सब आस, तब हरि ताही के पास।"*

3. "भौ सागर रा तरन कूं, एको नाम अधार।

       रैदास कभी न छाड़िए, राम नाम पतवार।।"*

रैदास और कबीर ने अपने समय में दलित कौम के धार्मिक आन्दोलन को चलाया था। वे दलितों के धर्म-दर्शन और ईश्वर की बात करते हैं। उन का ईश्वर ब्राह्मण के ईश्वर, मुसलमान के ईश्वर, ईसाइयों के ईश्वर से अलग अपना राम, हरि है।

इसी तरह सद्गुरु रैदास का बता कर इन्होंने एक और पद लिखा है -

"मैं हूँ अमर कबहुँ न मरता खड़ग विज्ञान चलाऊँ रे

सामर्थ साधु कहलाऊँ।

ब्रह्मा विष्णु का शीश काटकर शिव को मार भगाऊँ

आदिशक्ति को पैरों से दाबू काल को पकड़ नचाऊँ।

दस अवतार डरे डर मेरे सूर्य चंद्र राहू

इंदरपुरी के देव सब डरते धरमराज मैं बुलवाऊँ।

चौदह लोक का करूँ निबेड़ा फिर एक ठिकाने लाऊँ

जाति वर्ण की मेट कल्पना सतोसत नाम कहाऊँ।

सुत्ता म्हारे चरणों की दासी मुख की ठौर न ठाऊँ

कह रविदास सरन जो आए मैं उसको भी मुक्त कराऊँ।।"

 

संदर्भ वही है -'30 जनवरी 2018 BHU वाराणसी में हुए सेमिनार में पढ़े गए शोध आलेखों की रिकार्डिंग से।'

अब, क्या कहा जाए! ऐसे रिसर्च स्कोलर्स को सद्गुरु रैदास अपनी रांपी ले कर दौड़ा लेंगे। अब समझ में आया, प्रदीप कुमार जैसे छात्रों के लिए ही प्राथमिक विद्यालय के मास्टर छड़ी ले कर बैठते हैं।

इन्हें बताया जाए, सद्गुरु रैदास खुद को अमर कैसे बता सकते हैं जबकि वे खुद ही कह रहे हैं -

"जन्मे को है हरस का, मरने को का सोक?

बाजीगर के खेल कूँ, समझत नाहीं लोक।।"*

महान आजीवक चिंतक रैदास किसी अवतारवाद को नहीं मानते -'कहै रैदास भ्रम का भाण्डा, फूटेगा सब के द्वार।।'* तो वे दस अवतार की बात कैसे कह देंगे। सद्गुरु रैदास गृहस्थ महापुरुष थे, नियतिवादी थे, ऐसे में, उन के मुँह से 'इंदरपुरी के देव', 'चौदह लोक' जैसे पारलौकिक शब्द कैसे निकल सकते थे। यह पद भी पूरी तरह से फर्जी है।

बताया जाए, अपने लेख में सद्गुरु रैदास का बता कर जितने पद इन्होंने लिखा है वे सब के सब फर्जी हैं। वे सारे पद सद्गुरु रैदास की विचारधारा के नहीं हैं। प्रदीप कुमार जान लें कि सद्गुरुओं कबीर और रैदास के प्रामाणिक पद महान आजीवक चिंतक डा. धर्मवीर की पुस्तक "महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल" में संकलित हैं। उस के बाहर के किसी भी पद को स्वीकार नहीं किया जाना। सद्गुरुओं के जो पद महान 'आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' में नहीं हैं वे सब प्रक्षिप्त और फर्जी पद हैं।

ये एक रिसर्च स्कोलर हैं। जरा इन की लिखावट भी देखी जाए। इन के लेख का पहला वाक्य ही इस तरह है -

"भारत देश में प्रारंभ से ही ब्राह्मण एवं श्रमण संस्कृति के मध्य निरंतर संघर्ष चलता रहा है।"

वाह क्या रिसर्च है! पूरे इतिहास का बंटाधार। इतिहास में चमार बनाम ब्राह्मण, नियतिवाद बनाम पुनर्जन्मवाद, मोरल बनाम जारकर्म, गृहस्थ बनाम संन्यास का युद्ध मचा हुआ है और इधर एक दलित रिसर्च स्कोलर इस ऐतिहासिक युद्ध को ब्राह्मण बनाम ब्राह्मण बता रहा है! मतलब युद्ध के मैदान में खड़े पहले पक्ष को ही गायब कर दिया। जी हां, श्रमण परंपरा   मतलब संन्यासी परंपरा। श्रमण ब्राह्मण, जैन और बौद्ध ही हैं। प्राचीन काल में नंद वंश अर्थात आजीवक साम्राज्य में इन श्रमणों की क्या स्थिति है, एक उद्धरण से समझा जा सकता है -

'"१७३. राजा विमलवाहन किसी दिन श्रमण निर्ग्रन्थों के प्रति मिथ्यात्व से विप्रतिपन्न होगा -वह अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों के प्रति आक्रोश करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों का उपहास करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों की निर्भत्सना करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को बांधेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को कारागार में डाल देगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों का छविच्छेद करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को पीटेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को मारेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों के वस्त्र, पात्र, कंबल, पादप्रौञ्छन का आच्छेदन, विच्छेदन, भेदन और अपहरण करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों के भक्तपान का विच्छेद करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को नगर रहित करेगा, अनेक श्रमण निर्ग्रन्थों को निर्वासित करेगा।'

इस का मतलब है, विमल वाहन द्वारा जैन धर्म के लोग मारे जा रहे हैं। इस से पता चलता है कि नंद वंश का धर्मयुद्ध केवल ब्राह्मण धर्म से नहीं चल रहा है बल्कि जैन धर्म से भी चल रहा है। पता यह भी चलता है कि आजीवक धर्म बौद्ध धर्म का भी विरोध कर रहा है।"*

अपने लेख में इन रिसर्च स्कोलर ने आगे लिखा है -

"ब्राह्मण हवन पूजा कर्मकांड पर आधारित पोंगापंथी समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिनमें वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करवाते हैं और सामान्य जनता को ठगकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करते हैं।"

तो, ब्राह्मण कर्मकांड करे, पोंगापंथी समाज बनाये उस से दलितों का क्या लेना देना। ब्राह्मण अपने समाज में खुद को श्रेष्ठ घोषित करे या क्षत्रिय को श्रेष्ठ घोषित करे या वैश्य को या चाहे शूद्र को, दलित समाज से क्या मतलब। ब्राह्मण अपने समाज में जैसे चाहे वैसे रहे प्रदीप कुमार कौन होते हैं, उसे टोकने वाले। ये क्यों ब्राह्मण के समाज में जबरन घुसना चाह रहे हैं और खुद को श्रेष्ठ कहलवाना चाह रहे हैं? दलित अपने कौम में क्यों नहीं रहता। वह अपने धर्म - दर्शन, विचार, परम्परा की बात क्यों नहीं करता। वह परायों - ब्राह्मण, ईसाई, मुसलमान के कर्मकांड, अंधविश्वास, पाखंड का ठेकेदार क्यों बना फिरता है! अगर ब्राह्मण समाज में लोगों को ठगने निकला है तो, ये उस की ठगी का शिकार क्यों बन रहे हैं? खुद ब्राह्मण का रट्टू तोता बने हैं और उस की ठगी का रोना भी रो रहे हैं। वाह! ये कैसा तिकड़म है? अब कौन दलितों को ठग रहा है, ब्राह्मण या प्रदीप कुमार जैसे दलित? इन जैसे दलित दलितों को ही ठग कर अपनी दुकानदारी चमका रहे हैं और दोष मढ़ रहे हैं ब्राह्मण पर!

इन का लिखना है -

"सन्त रविदास की बहुत-सी वाणियाँ लोक पद्धति में आज भी विद्यमान है, लेकिन लेखन परम्परा में उनका जिक्र नहीं मिलता है।"

जब आँखों पर पट्टी बांध रखी है तो, भला कैसे दिखेगा। डा. धर्मवीर ने "महान आजीवक  : कबीर, रैदास और गोसाल" में  कबीर और रैदास की वाणियों की हीरों की पूरी खान खोज रखी है। उन हीरों की चमक से अपनी अज्ञानता के अंधकार को क्यों नहीं मिटा रहे हो? खैर, जब आँखों पर पट्टी बांध खुद ही अंधा बना जा रहा हो फिर कहना ही क्या है!

क्या एक रिसर्च स्कोलर से ऐसी लेखनी की अपेक्षा की जा सकती है? ऐसा लिखते समय क्या इन्होंने डा. धर्मवीर की किताब 'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' नहीं पढ़ी? अगर नहीं पढ़ी तो, फिर ये कैसे रिसर्च स्कोलर हुए? और अगर पढी़ है तो ऐसे भाषणबाजी से समाज को ठग क्यों रह रहे हैं?

इन्हें हमारे फेसबुक पर लिखने से चिढ़ है। इन्हें कहा जा रहा है, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आजीवक आन्दोलन पर छप रहे कैलाश दहिया जी के लेखों पर अपनी टिप्पणी करें। ये भाषणबाज बनने चले हैं तो, इन्हें कहा जा रहा है कि इसी साल 27 फरवरी को बांदा में संत रैदास जयंती के अवसर पर डा. भूरेलाल जी द्वारा दिये गए एक लम्बे वक्तव्य पर अपनी टिप्पणी करें।

 तो, ये एक रिसर्च स्कोलर की बात हुयी। अब, एक प्राध्यापक की बुद्धि कैसी है, यह भी जान लिया जाए, जिन्होंने किताब 'संत रविदास : एक समाजसुधारक, चिंतक और दार्शनिक' का संपादन किया है। डा. राम भरोसे इस किताब का संपादन करते हुए 'दो शब्द' के रूप में लिख रहे हैं -

"जिसे भक्ति आन्दोलन कहा जाता है, वह एक तरह से समय के साथ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध विद्रोह था, जिसको संत कबीर दास, संत गुरु रविदास, दादू, पल्टू, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी  संतों और गुरुओं ने अपने-अपने तरीके से चलाया था। असल में वह महात्मा बुद्ध के ही आन्दोलन का प्रतिरूप थ।"

क्या कहें! आजीवक सद्गुरुओं कबीर और रैदास दोनों कह रह हैं -"घर तज बन नहिं जाए"। लेकिन जब इन जैसे दलित आँख के अंधे और कान के बहरे बने हैं तो कहा ही क्या जा सकता है। ध्यान रहे, हमारे सद्गुरु ब्राह्मण, जैन और बुद्ध को समझाने नहीं निकले हैं। इन की तो परम्परा ही संन्यास की है। तभी बुद्ध रात को चोरी से घर से भाग जाते हैं। हमारे सद्गुरु तो अपने लोगों को सचेत कर रहे हैं कि इन संन्यासियों की बातें न सुनो, ये संन्यासी हैं, घर बिगाड़ने की ही सलाह देंगे। इन संन्यासियों को कबीर कह रहे हैं -"काम जराय जोगी होइ गईलै हिजरा।" इधर डा. राम भरोसे कबीर, रैदास के आन्दोलन को एक संन्यासी के आन्दोलन का प्रतिरूप बता रहे हैं। हद है! ये इस के आगे भी लिख रहे हैं और जो लिख रहे हैं, वह घोर आपत्तिजनक है -

"संत रविदास इसलिए भी स्मरणीय हैं कि उन्होंने वही कहा जो महात्मा बुद्ध ने कहा। अन्तर केवल इतना है कि बुद्ध की भाषा एक ज्ञानी की भाषा है, रविदास की भाषा भक्त की भाषा।"

दलित देख लें, अपने सद्गुरुओं के बारे में इन दलितों की मानसिकता कैसी है। संन्यासी बुद्ध की भाषा ज्ञान की भाषा है और सद्गुरु रैदास की अज्ञानी की! ये बुद्ध को ज्ञानी बता रहे हैं और रैदास को उन का भक्त। प्रक्षिप्तीकरण और झूठ बोलने में इन जैसे दलितों के आगे ब्राह्मण क्या ठहरता है। ये अपनी बताएँ, ये जो लिख-बोल रहे हैं वह किस की भाषा है? इन्होंने आगे भी ऐसी ही बकवासें लिख रखी हैं जिन्हें यहाँ उद्धृत नहीं किया जा रहा। ये जनाब अपनी यह बकवास 11 नवम्बर, 2018 को लिख रहे हैं। अर्थात 'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' पुस्तक आने के लगभग 23 महीने बाद। अब बताइए, दोषी कौन है, राम भरोसे या ब्राह्मण?

एक दलित रिसर्च स्कोलर, दलित प्राध्यापक का दिमाग जान लिया गया अब, दलित लेखक के रूप में जाने जा रहे जयप्रकाश कर्दम का भी दिमाग पढ़ लिया जाए। डा. जयप्रकाश कर्दम ने इस प्रक्षिप्त किताब की भूमिका लिखी है। लिखा क्या है -

"वस्तुतः रविदास उस बौद्ध चेतना के संवाहक हैं जिसके अनुसार मानव जीवन दुःखों का समुच्चय है, अर्थात जीवन में सर्वत्र दुःख है, कोई भी दुःख अकारण नहीं है, दुःख का कोई न कोई कारण है, प्रत्येक दुःख का निदान या निवारण सम्भव है, और सम्यकता के रूप में दुःख निदान का मार्ग बतलाती है। दुःख निरोध के मार्ग पर चलते हुए रविदास 'बेगमपुरा' (बे-ग़म-पुरा या दुःख से रहित) नाम का गाँव बसाते हैं। बे-ग़म या दुःख से मुक्त होना ही बुद्ध का निर्वाण-मार्ग है।"

बताइए, बुद्ध... बुद्ध.. बुद्ध... बुद्ध...। कर्दम साहब का यदि ऐसा ही मानना है तो, इन्हें अपना घर, परिवार, पत्नी, बाल-बच्चे सब को छोड़ कर फौरन जंगल में चले जाना चाहिए। इन्हें क्या कहें! बेचारे बुद्ध के पास खुद अपनी समस्या का समाधान नहीं था, जिस के चलते उसे रात में चोरी से घर से भागना पड़ा। और इधर ये बुद्ध के निर्वाण मार्ग को समस्त दुखों का निदान बता रहे हैं! बताया जाए, बुद्ध की समस्या का समाधान आजीवक कौम के पास था लेकिन, वे आजीवकों की बात क्यों सुनते? वे ठहरे पराये कौम के। और उन की कौम में इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं है। समाधान तो तब होता जब उसे समस्या माना जाता। उन की कौम में जारकर्म समस्या ही नहीं है बल्कि एक परम्परा है। जिसे यह परम्परा रास नहीं आती या जान पर बन आती है वह घर से निर्वाण, कैवल्य या मोक्ष का बहाना बना कर ऐसे ही भाग खड़ा होता है।

 

बेगमपुरा सद्गुरु रैदास के अपने विचारों का एक यूटोपिया है। उन के समाज में भला बुद्ध का क्या काम? बुद्ध तो समाज से भागे हैं, ऐसे में उन का किसी भी समाज से क्या लेना-देना। सद्गुरु रैदास एक आदर्श समाज निर्माण की कल्पना करते हैं, और बुद्ध? बुद्ध तो समाज मिटाने-बिगाड़ने का काम करते हैं। ऐसे में, कर्दम साहब ने यह झूठ क्यों लिखा कि 'वस्तुतः रविदास उस बौद्ध चेतना के संवाहक हैं...', बताएँ? इन्होंने यह भूमिका 27 अक्टूबर, 2018 को लिखी है। यानी किताब 'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' के आने के लगभग 22 महीने बाद। ये यह कह भी नहीं सकते कि इन्होंने यह किताब नहीं पढ़ी है। कैलाश दहिया जी ने बताया है कि उन्होंने खुद डा. धर्मवीर जी की यह किताब कर्दम साहब को अपने हाथों से दी है।

प्रदीप कुमार गौतम ने अपने लेख में लिखा है -

"सामंतवादी हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों द्वारा ये शब्द जबरन थोपे गए हैं कबीर एवं रैदास की क्रांतिकारी वाणी को दबाने का प्रयास करने के लिए इन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था।"

किस ने दबा दिया था? ये दूसरे पर आरोप कैसे मढ़ सकते हैं। ये सद्गुरुओं कबीर और रैदास की वाणी को दबाये जाने का आरोप सामंतवादी साहित्यकारों पर मढ़ रहे हैं। इन्हीं से पूछा जाए कि, आज ये और इन जैसे दलित तथा डा. राम भरोसे, डा. जयप्रकाश कर्दम, प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन आदि क्या कर रहे हैं? डा. धर्मवीर के रूप में आज इन के सामने मौजूद कबीर और रैदास की वाणी को दबाने के लिए खुद इन जैसे दलितों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। तब, यह कैसे माना जाए कि मध्यकाल में कबीर और रैदास की वाणियों को किसी सामंत या ब्राह्मण ने दबाया? पूरी सम्भावना है, तब भी कबीर और रैदास के सामने ऐसे ही कोई प्रदीप कुमार गौतम, राम भरोसे, जयप्रकाश कर्दम, श्यौराज सिंह बेचैन जैसे दलित मौजूद रहे हों। आज के प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन की तरह प्राचीन काल के एक सकडालपुत्र की खोज डा. साहब ने किया ही है।

आधुनिक काल के डा. अम्बेडकर की बात की जाए। ये आजीवक कौम के विरोधी बुद्ध के शरणागत हुए हैं। बुद्ध का शरणागत होने के लिए बाबा साहेब को क्या किसी ब्राह्मण ने कहा था? यदि कहा भी था तब भी ब्राह्मण की बात बाबा साहेब ने क्यों मानी? उन्होंने अपने महापुरुषों स्वामी अछूतानंद और बाबू मंगूराम की बात क्यों नहीं मानी, जो 'आदि हिन्दू' तथा 'आदि धर्मी' कह कर अपने खुद के धर्म की तरफ चलने का आह्वान कर रहे थे? इसे क्या माना जाए? आज भी इन दलितों द्वारा अपने महापुरुष डा. धर्मवीर की बात न सुन कर ब्राह्मण बजरंग बिहारी तिवारी तथा महाजारिणी रमणिका गुप्ता की बात क्यों सुनी जा रही है? यह तिकड़म क्या है? यह इन के दिमाग की कैसी बनावट है जो, लगातार दलितों में चली आ रही है?

*पुस्तक -'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' से

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना