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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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तो हिंदी भाषी इसलिए पढ़ें अंग्रेजी अखबार ...

January 22, 2014

श्रीकांत सौरव। 'ई हिंदी अखबरवा सब पगला गया है का हो? शिक्षक नियोजन में संशोधन के न्यूज के लिए तीनों पेपरवा हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर पलट लिए. तीनों ससुरा मुखे पृष्ठ पर खबर दिया है. लेकिन पढ़े के बाद कुछो भेजा में नहीं घुसा. बुझा रहा है जानकारी देने से जादा नितीश का प्रचार कर रहा है. बिना सचिव से बयाने लिए अपने मने सब पुरनका बतवा लिख दिया है. पटना में कइसन कइसन बिना पढ़ल लिखल बकलोल के संवाददाता रख लिया है. ' आज सुबह गांव के एक शिक्षक भाई के दरवाजे पर गया. तो एक पत्रकार होने के नाते तीनों अखबार मुझे दिखाते हुए शिकायत करने लगे.

दरअसल बुधवार को सूबे के सभी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर टीईटी पास वालों के लिए नियोजन नियमावली संशोधन से संबंधित खबर कैबिनेट की बैठक के हवाले छपी थी. जब मैंने भी तीनों अखबारों में छपी खबर को बारी बारी से पढ़ा तो माथा चक्करा गया. सभी ने तीन कालम की खबर छापी थी. मगर प्रस्तुति ऐसी कि पता ही नहीं चल पाया कहना क्या चाह रहे हैं सिवाय सरकार को महिमामंडित करने के. लग रहा था घिसी पिटी पुरानी बातों को परोस रहे हैं. मैंने उन्हें सलाह दी या तो किसी अंग्रेजी अखबार को देख लीजिए कुछ नया मिल जाए या फिर एक दो दिन इंतजार करें पूरी नियमावली विभागीय सूचना के रुप में प्रकाशित होगी तो जानकारी स्पष्ट हो जाएगी. उन्हें पहला सुझाव उचित लगा सो हाकर से अंग्रेजी अखबार मांगी गई. उसने कहा, 'चार गो 'हिंदुस्तान टाइम्स' उठइबे करते हैं. अंतिम वाला भी बांट दिए स्कूलवा में.' भाई भागे गए और बगल के निजी कांवेट से अखबार उठा लाए. और उसमें भी इससे संबंधित रिपोर्ट मुख पृष्ठ पर छपी थी. बिल्कुल तथ्य पर आधारित, बिना किसी लाग लपेट या अतिश्योक्ति के. खबर छोटी ही सही पर सटीक थी. जब भी हिंदी अखबारों के कंटेट देखकर गर्व का अहसास होता है. इस तरह का वाकया एक गहरी टीस दे जाता है. और जेहन में यह सवाल भी कुरेदता है. कि हिंदी अखबारों की इस दस टकिया पत्रकारिता के लिए आखिर जिम्मेवार कौन है? हम हिंदी वाले कुछ भी लिखकर महज पन्ना भरने की हड़बड़ व सतही मानसिकता वाली रिपोर्टिंग से कब उबर पाएंगे?

Srikant Saurav

 

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