वीरेंद्र यादव/ पटना/ सोमवार को विधानमंडल के बजट सत्र का पहला दिन था। हर तरफ रौनक ही रौनक। दोनों सदनों के मुख्य द्वार को फुलों से सजाया गया था। दरवाजे पर स्वागत के लिए मार्शल तैनात थे। पूरे परिसर को छावनी में बदल दिया गया था। सत्र के दौरान आमतौर पर यही नजारा रहता है। सेंट्रल हॉल बनने के बाद काफी कुछ रौनक विस्तारित भवन के मुख्य द्वार की ओर स्थानांतरित हो गया है। राज्यपाल की आगवानी के लिए स्पीकर, सभापति और मुख्यमंत्री उसी दिशा में जाते हैं।
पहले दिन यही सब हुआ। पहले दोनों सदनों की अलग़-अलग बैठक अपनी-अपनी जगह पर हुई। बाद में अभिभाषण के लिए विधायक, विधान पार्षद और पदाधिकारी सेंट्रल हॉल पहुंचे। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने साढ़े 11 बजे अपने भाषण शुरुआत की। इसे अभिभाषण कहते हैं। इसमें कुछ नयापन नहीं था। इस बार राज्यपाल के संबोधन में भाषा का लालित्य नहीं था। चेहरे की भाषा भी उबाऊ थी। संबोधन में लालू यादव राज की छाया हावी थी। कम से कम 6 बार राज्यपाल ने नवंबर, 2005 का जिक्र किया। इस जुमले के साथ कि उसके पहले बिहार में कुछ था। राज्यपाल की अपनी मजबूरी है। वह सरकार के भाषण का वाचन ही कर सकते हैं।
सेंट्रल हॉल का प्रेस दीर्घा पत्रकारों के लिए अंधा कुआं की तरह है। न साफ सुनाई पड़ता है और न दिखायी पड़ता है। पत्रकार दीर्घा के लिए जिस स्थान का चयन किया गया है, वह आफसाइड में है। इस जगह से आसन यानी मंच को देखना संभव नहीं है। इसलिए वक्ता की भाव-भंगिमा, चेहरे की अभिव्यक्ति और सभागार में बैठे लोगों की प्रतिक्रिया को समझना मुश्किल होता है। प्रेस दीर्घा में पहले दो टीवी स्क्रीन लगा हुआ है, जो बेकार हो गया है। इस बार छोटा सा नया टीवी स्क्रीन लगाया गया था, लेकिन उससे सुनना संभव नहीं था, क्योंकि 50 से अधिक पत्रकारों के लिए छोटा स्क्रीन अपर्याप्त था। विधान सभा के स्पीकर आते-जाते रहे, लेकिन प्रेस दीर्घा की बदहाली यथावत बनी रही। इस बार छोटा स्क्रीन का इंतजाम भी किया गया तो वह भी बेकाम ही साबित हुआ।
फिर लाइव प्रसारण की अपनी सीमा होती है। वह सिर्फ वक्ता को फोकस करता है। अन्य लोगों की गतिविधियां दायरे से बाहर होती है। इस कारण अन्य लोगों की गतिविधियां आफस्क्रीन ही नजर आती है, जिसकी उपलब्धता सेंट्रल हाल में नहीं है। इससे पत्रकारों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। इस समस्या से कई बार अधिकारियों को अवगत कराया गया, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात। दोनों सदनों की प्रेस सलाहकार समिति की बैठक में पत्रकारों से सकारात्मक खबर पर फोकस करने का आग्रह किया जाता है, लेकिन पत्रकारों की सेंट्रल हाल से जुड़ी एक समस्या का समाधान वर्षों में नहीं हो पाया। आगे भी होने की उम्मीद नहीं है। क्योंकि आसन पर बैठा व्यक्ति भले बदल जाए, उनकी जाति बदल जाए, पार्टी बदल जाए या गले में पड़ा पट्टा बदल जाए, लेकिन काम करने वाले लोग न बदलते हैं और न उनकी कार्यशैली में बदलाव आता है। इसलिए सेंट्रल हाॅल के पत्रकार दीर्घा की समस्या अपनी जगह पर कायम है।
खैर विधान मंडल की संयुक्त बैठक के बाद फिर दोनों सदनों की अलग-अलग बैठक हुई और कुछ विधायी कार्य संपन्न होने के बाद कार्यवाही मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गयी। इससे पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करीब सवा 10 बजे विधान सभा पहुंचे। उनकी आगवानी के लिए संसदीय कार्यमंत्री विजय कुमार चैधरी समेत कई मंत्री और विधायक मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने दोनों सदनों के आसन प्रमुखों से बारी-बारी से मुलाकात की और उनका स्वागत किया। विधान सभा में वरीयता के आधार पर विधायकों की सीटिंग व्यवस्था में कुछ बदलाव किया था। इसलिए शुरुआत में सीट तलाशने में लोगों को परेशानी हुई, लेकिन सचिवालय कर्मियों ने निर्धारित जगह पर बैठाया। राष्ट्रगान के साथ दोनों सदनों की कार्यवाही शुरू हुई।

