विनीत कुमार/ आजतक न्यूज़ चैनल अपनी जर्जर होती साख को दुरुस्त करने के इरादे से हैशटैग के साथ “भरोसा कमाया जाता है” जिस पंचलाइन का इस्तेमाल किया है, वह बीबीसी हिन्दी की कैम्पेन का हिस्सा है. आजतक के आला एंकर, संपादक, बॉस शायद दिल्ली मेट्रो की यात्रा नहीं करते हों तो उन्हें कभी यह दिखाई नहीं दिया होगा लेकिन
साल 2024-25 में आपमें से जिस किसी ने भी दिल्ली मेट्रो की यात्रा की होगी, वो बीबीसी हिन्दी के अलग-अलग पत्रकारों, उनकी किसी एक स्टोरी की स्टिल फोटो के साथ इस पंक्ति को ट्रेन की कोच से लेकर प्लेटफॉर्म पर बहुत ही आसानी से देख पा रहे होंगे.
यह पंक्ति बीबीसी हिन्दी की किसी स्टोरी का हिस्सा नहीं रही है कि चलते-फिरते ढंग से उसका इस्तेमाल करके निकल लिया जाय. ये वहां काम कर रहे पत्रकारों-मीडियाकर्मियों की स्टोरी, रिपोर्टिंग और फिर उसके बाद तैयार किए गए पूरे अभियान का हिस्सा रही है. इस पर संस्थान ने लाखों रूपये खर्च किए होंगे.
विज्ञापन की पहली-दूसरी कक्षा में जब मीडिया, विज्ञापन और जनसंपर्क की पढ़ाई कर रहे छात्रों को कॉपी लिखने, लेआउट तैयार करने के बारे में बताया-सिखाया जाता है तो कॉपीराइट कानून के बारे में भी व्यवस्थित ढंग से पढ़ाया जाता है. यह जोर देकर बताया जाता है कि हमारी सारी मेहनत और क्रिएटिविटी वहीं ध्वस्त हो जाती है जब हम किसी दूसरे ब्रांड की पंक्ति, आइडिया, फॉन्ट, कलर कोड आदि की हूबहू नकल कर लेते हैं. मिलते-जुलते नाम, पंचलाइन और सिग्नेचर ट्यून तो बहुत बड़ी बात है. इससे ब्रांड की न केवल साख ध्वस्त होती है बल्कि कानूनी दायरे में आने पर छवि को जबरदस्त बट्टा लगता है.
आजतक में काम कर रहे एक से एक मीडियाकर्मी और स्ट्रैटजी प्लानर हैं जिन्होंने देश के बेहतरीन मीडिया संस्थानों से पढ़ाई की है और उनके मास्टरों ने भी विज्ञापन और अभियान के बारे में यह सब ज़रूर पढ़ाया होगा.
लेकिन
बीबीसी हिन्दी के जिस अभियान को दिल्ली और देश-दुनिया से आए लाखों लोगों ने देखा, वो आजतक के किसी भी ऐसे मीडियाकर्मी की नज़र से नहीं गुज़रा, एक के भी दिमाग़ में यह बात नहीं आयी कि हम जिस पंक्ति का इस्तेमाल करने जा रहे हैं, वो तो तीन साल पहले ही विज्ञापन की शक़्ल में इस्तेमाल किया जा चुका है. इसके दो मायने हो सकते हैं-
एक तो ये कि आजतक के भीतर क्रिएटिविटी का जबरदस्त अभाव है. जो चैनल कभी नए ढंग से सोचने, चौंकाने और रिझाने की भाषा गढ़ने के लिए जाना जाता रहा, अब वो हर थोड़े दिन पर कुछ न कुछ ऐसी हरकरत कर जाता है जिससे ये समझने में मुश्किल नहीं होती कि सबसे तेज़ होने का दावा करनेवाला चैनल महज चूहा दौड़ में लगा है.
सबसे तेज़ के नाम पर अपने दर्शकों के भीतर एक ख़ास तरह की हड़बड़ी, बेचैनी और अंधेरे की तरफ धकेल रहा है जिससे कि उसे आजतक के अलावा कुछ और दिखाई ही न दे. चैनल के ब्रांड एंकर चॉपर से 100 लोकसभा चुनावी क्षेत्र कवर करने का नगाड़ा पीट सकते हैं लेकिन ढंग से दो ऐसी पंक्ति नहीं सोच सकते जिनमें रचनात्मकता हो, अपने दर्शकों से जुड़ाव का भाव शामिल हो और सबसे ज़्यादा कि वो कॉपी-पेस्ट मटीरिअल न हो.
दूसरा ये कि चैनल को इस बात का भरोसा हो चला है कि हमारी दबंगई के आगे, कोई कुछ नहीं बोलेगा, आपत्ति ज़ाहिर करेगा. साल में दो-तीन बार प्लास्टिक-सस्ते फाइबर से बने झोलाभर के मोमेंटो से अपने दर्शकों की आंखों को चुंधिया देना काफी होगा कि हमारे मीडियाकर्मियों ने कितने अवार्ड जीते हैं, जीतते आए हैं. यही कारण है कि दूसरे चैनलों, संस्थानों की सामग्री को बिना क्रेडिट दिए, ग़ैरज़रूरी ढंग से छेड़छाड़ किए इस्तेमाल करके उसे एक्सक्लूसिव या सुपर एक्सक्लूसिव बताना पैटर्न का हिस्सा हो चला है जो कि शर्मनाक है. इस संदर्भ में मैं आपको बस एक उदाहरण देता हूं और मेरे कहने पर आप दोनों वीडियो देखिएगा जो कि यूट्यूब पर उपलब्ध है.
15 अगस्त के मौक़े पर साल 2022 में आजतक ने एक स्पेशल शो तैयार किया. इसमें आज़ादी से पूर्व और उसके बाद के भारत को दिखाने के लिए ब्रिटिश पाथे की फुटेज का न केवल इस्तेमाल किया गया बल्कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की शक़्ल छुपाने और बाद में ट्विटर( अब एक्स) पर हंगामा होने के बाद ठीक करने की कोशिश में चैनल के एंकर का चेहरा लगाया गया. शो के दौरान न तो ब्रिटिश पाथे का नाम लिया और न ही गेट्टी इमेज़ेज सहित किसी और स्रोत का हवाला दिया. ब्रिटिश पाथे की वीडियो फुटेज के साथ जमकर छेड़छाड़ की गयी, मॉर्फ्ड करके नेहरू के आगे ख़ुद एंकर को खड़ा करके दिखाकर शो को एक्सक्लूसिव बताकर दिखाया गया.
आजतक के इस शो से गुज़रते हुए जब ऐंकर की स्क्रिप्ट पर ग़ौर करना शुरु किया तो ध्यान आया कि ये जो कुछ भी बोल रही हैं, इसके स्रोत तो कहीं और हैं.चैनल और ऐंकर में इस स्तर की नैतिक-पेशेवर ईमानदारी नहीं है कि वो इन स्रोतों का हवाला दे, क्रेडिट के साथ इनका इस्तेमाल करे. शो देखने के बाद मैंने दोबारा उस वीडियो को देखा जहां से आजतक ने न केवल स्टोरी आइडिया ही नहीं उड़ाया बल्कि उसमें बताए स्रोतों का भी बहुत ही भद्दे ढंग से इस्तेमाल किया.
बीबीसी हिन्दी के यूट्यूब चैनल पर ’15 अगस्त 1947: वो सुबह जिसका इन्तज़ार था’शीर्षक से बीबीसी हिन्दी पर कुल 17:54 मिनट का वीडियो है. इस वीडियो में रेहान फ़ज़ल 14 और 15 अगस्त के दिन क्या-क्या घटनाएं हुईं और कैसा मंज़र रहा, इनका ब्यौरा पेश करते हैं, जिन स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं, उन सबका ज़िक्र करते हैं कार्यक्रम के दौरान उनके नाम और यदि वो किताब है तो उसकी आवरण पृष्ठ और पृष्ठ संख्या शामिल करते हैं. जहां-जहां ब्रिटिश पाथे और गेट्टी इमेज़ेज का इस्तेमाल किया गया है, वो स्क्रीन पर आभार की शक़्ल में शामिल है.
आप जब दोनों वीडियो को एक साथ देखेंगे तो समझने में मुश्किल नहीं होगी कि आजतक ने न केवल ब्रिटिश पाथे, दर्जनों किताबों की सामग्री का बिना क्रेडिट दिए इस्तेमाल किया बल्कि इसने सीधे-सीधे मूल सामग्री से गुज़रने की जहमत उठाए बिना ही बीबीसी की स्टोरी आइडिया ही कॉपी कर ली. हां, एक्सक्लूसिव के नाम पर अपनी स्टाइल शीट रखी जिससे कि सत्ताधारियों की ओर से पीठ थपथपाने की गुंज़ाईश बनी रहे.
अब मैं अकेला ऐसा दर्शक तो हूं नहीं कि जिसने बीबीसी हिन्दी पर रेहान फ़ज़ल की भी स्टोरी देखी हो और आजतक की भी. मेरे जैसे देश के लाखों दर्शक होंगे और उस पीढ़ी के दर्शक भी जो अपनी याद से ही चैनल पर भरोसा नहीं करते. बाक़ी बातें पीछे रखकर थोड़ी देर के लिए इस सिरे से सोचिए कि जो चैनल अपने दर्शकों के प्रति वफ़ादार नहीं है, नहीं चाहता कि उसे देखनेवाले मूल स्रोत तक पहुंच सकें, वो किस सूरत में भरोसा क़ायम कर सकेगा ! चालू मुहावरे और लेबलिंग के साथ किसी को नकार देना, किसी के आगे चरण-चाप करने लग जाना अलग बात लेकिन बात तो यही है न कि भरोसा कोई एक दिन में और अचानक से ख़त्म नहीं होता, चैनल ख़ुद इसके लिए ज़मीन तैयार करते आए हैं.
नोटः इंटरनेट पर ‘द गोल्डन वर्ड’ श्रृंखला के तहत ‘इंडिया ब्रेक्स फ्री’ शीर्षक से ‘British Pathe’ ’ का 7:56 मिनट का वीडियो इंटरनेट पर पिछले आठ साल से मौज़ूद है. आप चाहें तो इसे आजतक की एक्सक्लूसिव की चिप्पी हटाकर मूल सामग्री के तौर पर देख सकते हैं.
तसवीर साभारः बीबीसी हिन्दी वीडियो स्क्रीनशॉट

