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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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शोषण और पतन के दो पाटों के बीच फंसी-बची पत्रकारिता

कुमार दिनेश/ हर पेशे में अनुभव की कद्र है, विशेष कर वकालत, चिकित्सा और पत्रकारिता में, लेकिन अखबार मालिक कम पैसे में ज्यादा लोगों से काम लेने की शोषणकारी मानसिकता के कारण दोहरी नीति अपनाते हैं। 

वे युवाओं को कम पगार देते हैं यह कह कर कि तुम्हारे पास तजुर्बा नहीं और अनुभवी को बूढ़ापे का डर दिखाकर वेतन आधा कर देते हैं या उसकी छुट्टी करते हैं। बनारस का एक नामवर अखबार तो हाल के वर्षों तक 55 साल में पत्रकारों को रिटायर करता रहा। कुछ साठा पत्रकारों को वहां 55 के बाद प्रसाद पर्यन्त ( मालिक की कृपा बनी रहने तक) नौकरी करने का मौका दिया जाता रहा। काशी पत्रकार संघ की पहल से हालात कुछ बदले जरूर। 

बड़ी बात है कि इस जोखिम भरी जिंदगी के बावजूद अनेक पत्रकारों ने जनता और लोकतंत्र की उम्मीदों का दीया जलाये रखा है। पतन की मौसमी हवाओं ने कई दीपों को कंपाया या बुझाया भी- इससे कौन इनकार करेगा?

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