लेकिन मुझे हर वक़्त एक संपादक का साथ चाहिए
विनीत कुमार/ संपादक जैसी अब कोई संस्था बची नहीं है. संपादक अब सब मैनेजर हो गए हैं. मार्केटिंगवालों के आगे संपादक की चलती कहां है ? सेल्फ पब्लिशिंग के दौर में संपादक का काम ही क्या बचा है ! सोशल मीडिया के दौर में तो हर लेखक के भीतर संपादक पैदा हो गया है, अब अलग से उसकी क्या ज़रूरत !
ये कुछ ऐसे वाक्य हैं जो मीडिया सेमिनारों में कोई न कोई एक वक्ता ज़रूर दोहराते हैं. वो जब डिजिटल मीडिया का यशोगान कर रहे होते हैं, तब भी और मौज़ूदा पत्रकारिता पर चिंता जाहिर कर रहे होते हैं, तब भी.
अपने यहां साल 2005-06 में जब ब्लॉगिंग का दौर शुरु हुआ तो यह वाक्य उछाला गया- अब संपादक का दौर ख़त्म. अब लिखो और सीधा पोस्ट करो. मैंने ख़बरिया चैनल की नौकरी छोड़ने के बाद अगली ही सुबह ब्लॉग बनाया और लिखना शुरु कर दिया. कुछ दिनों बाद ही मैंने महसूस किया कि यहां तो किसी एक निर्धारित संपादक के बजाय हम चौतरफा संपादकों से घिरे हैं. कोई भी, कभी भी इनबॉक्स में कभी वर्तनी तो कभी वाक्य-विन्यास तो कभी तथ्य को लेकर चेताते कि इसे ठीक कर लो. यकीं मानिए, इस बात पर चिढ़ने के बजाय मुझे अच्छा लगता. अपनापा बढ़ता और आज जो कुछ दोस्ती है, उसके मूल में यही है. बस अब इस बात को भी समझने की कोशिश करता हूं कि ऐसा किस इरादे से कर रहे हैं. वज़्ह ये कि अब सोशल मीडिया की दुनिया पहले जैसी रही नहीं. वैसे अब उस भाव से लोग जुड़ते भी कम ही हैं. ख़ैर,
मैं सोशल मीडिया पर आए दिन कुछ न कुछ लिखता रहता हूं. आपलोगों का जो अब तक स्नेह मिला है, जो प्यार जताते हैं, उससे ये हौसला बन पाया कि कुछ लिखूंग् तो छप जाएगा. प्रिंट में छपने से अभी भी घबराहट होती है लेकिन ख़ुशी बिल्कुल पहले की ही तरह मिलती है. ऐसे में मैं हमेशा ज़्यादा तो नहीं लेकिन कम से कम कोई एक काम करता रहता हूं जिससे संपादक के संपर्क में रहूं.
संपादक का टोकते रहना, थोड़ा हड़काना, सलाह देना..ये सब मुझे अच्छा लगता है. एक बेहतर संपादक यदि आप लेखक के जीवन में है तो आप बाक़ी बातों को पीछे कर दें तो दिमाग़ी तौर पर बहुत आश्वस्त महसूस करते हैं. मेरे जैसा व्यक्ति सुरक्षित भी कि कोई है जो संभाल लेगा. मुझे अपने जीवन और लेखन, दोनों में गार्जियनशिप चाहिए. कोई मना करनेवाला, कोई टोकनेवाला, कोई ग़लत के ग़लत कहनेवाला, बच्चों की तरह लिखे पर गोला मारकर ठीक करनेवाला. मेरे लिए प्रिंट के लिए कुछ लिखने या किताब करने का सुख ही यही है कि साथ में एक संपादक जुड़ते हैं.
संपादक के रीढ़ के बहुत क़िस्से सुने हैं. लोग अभी भी सुनाते हैं. मेरे अपने भी अनुभव हैं. कई शानदार संपादक की निगरानी में लिखने-छपने का मौक़ा मिला..इन सब पर फिर कभी लेकिन यहां सिर्फ इतना कि एक संपादक हो और हमारा उस पर भरोसा हो, यही बात भीतर बहुत कुछ बचा लेती है और रचने के लिए उत्साहित करती रहती है.
मैं अपने भाई-बहनों में सबसे छोटा हूं. छुटपन में मुझे जल्दी-जल्दी बड़ा होने की चुल्ल मचती जिससे कि इनके निर्देशों ऐर टोका-टोकी से मुक्त हो सकूं. अब बड़ा हो गया तो लगता है, जीवन में कुछ लोग मौज़ूद रहें जिनके आगे मैं छोटा, बच्चा बना रहूं. उम्र और अनुभव का भार कई बार फेंककर जीने को जी चाहता है. संपादक इस इच्छा को एक हद तक पूरी करते हैं और इसलिए उनका साथ अच्छा लगता है.
आज जब अपने एक संपादक को मैसेज किया और कहा- वायदे के मुताबिक़ मैं लिखकर भेज तो रहा हूं लेकिन मुझे कुछ और भी बातें करनी है और उनका एकदम से फोन आ गया तो लगा, आपको बताऊं कि ऐसा होना कितना सुखद है !

