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सोशल नेटवर्किंग पर सार्थक विमर्श

July 31, 2013

डॉ. सी. जय शंकर बाबु / इंटर्नेट के विकास के साथ ही सामाजिक संबंधों-संवादों के कई रूपों, कई सुविधाओं, व्यवस्थाओं और व्यवसायों के उभरने से दुनिया में रिश्तों के कई नए जाल फैल चुके    हैं ।  ऐसी एक नई व्यवस्था जिसमें नए संवादों की असीम संभावनाएँ उभरकर सामने आई हैं, उसे सोशल नेटवर्किंग की संज्ञा से अभिहित किया गया है ।  सोशल नेटवर्किंग के आज कई आयाम समाज के विभिन्न वर्गों को, लगभग सभी अवस्थाओं के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें कई परिचित, अपरिचित लोगों के साथ संवाद बनाए रखने, विचारों, भावनाओं के आदान-प्रदान, ज्ञान-विज्ञान, विशेषज्ञतावाले विषयों में मुक्त एवं उन्मुक्त विमर्श के लिए मंच देने की वजह से इनकी ओर समाज का आकर्षण बढ़ रहा है, विशेषकर युवा पीढ़ी ज्यादा प्रभावित है ।  सोशल नेटवर्किंग के विभिन्न आयामों पर सार्थक एवं सामयिक विमर्श पर केंद्रित एक नई कृति ‘सोशल नेटवर्किंग - नए समय का संवाद’ के शीर्षक से सामने आई है, जिसका संपादक जानेमाने पत्रकार, मीडिया आलोचक और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जन संचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया है ।  सोशल नेटवर्किंग के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, कूटनीतिक, नैतिकस न्यायिक एवं तकनीकी तथा अन्य आयामों पर केंद्रित लेख इस कृति में शामिल हैं ।  इसमें कुल 26 लेख शामिल हैं जिनमें 21 लेख हिंदी में और शेष 5 लेख अंग्रेजी में हैं ।  

 मीडिया क्षेत्र से जुड़े जाने-माने पत्रकार, आलोचक, आचार्य आदि की लेखनी से सृजित इन लेखों के माध्यम से सोशल नेटवर्किंग के लगभग तमाम आयामों पर सविस्तार सार्थक विमर्श को स्थान दिया गया है ।  मुक्त सूचना का समय शीर्षक से इस कृति के संपादकीय में संजय द्विवेदी जी ने लिखा है कि – “आज ये सूचनाएं जिस तरह सजकर सामने आ रही हैं कल तक ऐसी करने की हम सोच भी नहीं सकते थे ।  संचार क्रांति ने इसे संभव बनाया है ।  नई सदी की चुनौतियाँ इस परिप्रेक्ष्य में बेहद विलक्षण हैं ।  इस सदी में यह सूचना तंत्र या सूचना प्रौद्योगिकी ही हर युद्ध की नियामक है, जाहिर है नई सदी में लड़ाई हथियारों से नहीं, सूचना की ताकत से होगी।  जर्मनी को याद करें तो उसने दूसरे विश्वयुद्ध में ऐतिहासिक जीतें दर्ज कीं, वह उसकी चुस्त-दुरुस्त टेलीफोन व्यवस्था का ही कमाल था ।  सूचना आज एक तीक्ष्ण और असरदायी हथियार बन गई  है ।...... फेस बुक, ब्लाग और ट्विटर ने जिस तरह सूचनाओं का लोकतंत्रीकरण किया है उससे प्रभुवर्गों के सारे रहस्य लोकों की लीलाएं बहुत जल्दी सरेआम होंगी ।  काले कारनामों की अंधेरी कोठरी से निकलकर बहुत सारे राज जल्दी ही तेज रौशनी में चौंधियाते नजर आएंगे।  बस हमें, थोड़े से जूलियन असांजे चाहिए ।” (पृ.2,3)

उन्मुक्त सूचनातंत्र के इस युग में सोशल नेटवर्किंग की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए द्विवेदी जी की संपादकीय वाणी इस विचार को भी बल देती है कि, “सोशल नेटवर्किंग आज हमारे होने और जीने में सहायक बन गयी है ।  इस अर्थ में मीडिया का जनतंत्रीकरण भी हुआ है ।  आम आदमी इसने जुबान दी है ।  इसने भाषाओं को, भूगोल की सीमाओं को लांघते हुए एक नया विश्व समाज बना लिया है ।  इसकी बढ़ती ताकत और उसके प्रभावों पर इक बातचीत की शुरूआत इस किताब के बहाने हो रही है ।” (पृ.3)  माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने इंटर्नेट आधारित सोशल नेटवर्किंग को ‘मानवता के लिए वरदान’ के रूप में माना है ।  उनका विचार है कि सोशल नेटवर्किंग के कारण से मानवीय संपर्कों और संबंधों की सीमाएं अंकन हो गईं ।  प्रो. कुठियाला जी का विचार है – “इंटरनेट आधारित जो संवाद की प्रक्रियाएँ आर्थिक लाभ के लिए किया जाए, उसी से आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ दूर होंगी ।  इंटरनेट की अपनी प्रकृति ऐसी है कि यह अपने ही ‘डिजिटल गैप’ को समाप्त करने की क्षमता रखती है ।”  (पृ.15)

 इस कृति में शामिल लेखों में शोशल नेटवर्किंग के कई आयामों पर सविस्तार सार्थक चर्चा हुई है।  कुछ लेखों के शीर्षक ही ऐसे हैं कि वे इस नए संवाद के विभिन्न आयामों पर सहज विश्वेषण प्रस्तुत करते हैं – जैसे ‘अंतरंगता का जासूस’ (प्रकाश दुबे), ‘मनचाही अभिव्यक्ति का विस्तार’ (कमल दीक्षित), ‘कहाँ पहुँचा रहे हैं अंतरंगता के नए पुल’ (विजय कुमार), ‘टाइम किलिंग मशीन’ (प्रकाश हिंदुस्तानी), ‘अप संस्कृति की गिरफ्त में’ (संजय कुमार), ‘खतरे आसमानी भी हैं और रूहानी भी’ (संजय द्विवेदी), ‘सावधानी हटी-दर्घटना घटी’ (आशीष कुमार ‘अंश’), ‘कानूनी सतर्कता का सवाल’ (डॉ. सी. जय शंकर बाबु), ‘इक्कीसवीं सदी का संचार’ (डॉ. सुशील त्रिवेदी), ‘आभासी दुनिया की हकीकतें’ (तृषा गौर), ‘A Replica of the Social Realities’ (Ranu Tomar) आदि ।

 लेडी श्रीराम कालेज, दिल्ली में पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष वर्तिका नंदा ने ‘एक पाती फेसबुक के नाम’ शीर्षक से अपने लेख में सोशल नेटवर्किंग के प्रभाव का विश्लेषण कुछ आंकडों के माध्यम से इस रूप में की है – “नए आँकड़े बड़ी मजेदार बातें बताते हैं ।  अगर दुनिया-भर के फेसबुक यूजर्स की संख्या को आपसे में जोड़ लिया जाए, तो दुनिया की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश हमारे समाने खड़ा होगा ।  अब, जबकि आबादी का 50 प्रतिशत हिस्सा 30 से कम उम्र का है, तुम स्टेटस सिंबल बन चुके हो ।  आधुनिक बाजार का 93 प्रतिशत हिस्सा सोशल नेटवर्गिंक साइट्स का इस्तमाल करता है ।  भारतीय युवा तो इस नए नटखट खिलौने के ऐसे दीवाने हो गए हैं कि भारत दुनिया का चौथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तामाल करने वाला देश बन गया है।” (पृ.29)

 शिल्प अग्रवाल का अंग्रेजी प्रस्तुत लेख - ‘You are connected’ भी ऐसे ही कुछ आँकडें प्रस्तुत करता है – “80,0000000 connections globally, 100 million and more in India – to hundreds of connections in my own list.  All of this under 7 years.  The pace with which these have grown intrigues any min and to the less tech savvy it’s boggling.  But how can anyone stay away from perhaps the most important revolution of modern times.”

 शोध-संवाद और सार्थक विमर्श के लिए इस कृति में शामिल लेखों से काफ़ी महत्वपूर्ण विचार मिल जाते हैं जो सोशल नेटवर्किंग के अतीत, वर्तमान और भविष्य के समग्र प्रभाव का विश्वेषण और पूर्वानुमान भी प्रस्तुत कर देते हैं ।  इनमें अभिव्यक्ति विचार लेखकों के अनुभव और व्यवहार जनित ही नहीं, तथ्यात्मक, तार्किक और सिद्धांतपरक भी है ।  लेखों के सृजन और कृति प्रकाशन के बीच व्यवधान की अधिकता भी कुछ स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि इन लेखों में चर्चित एकाध मुद्दों पर बहस काफ़ी आगे बढ़ भी चुकी है और निरंतर जारी भी है ।  (इन आलेखों के लेखन का माह और वर्ष भी शामिल किया जा सकता था ।)  इस सीमा के बावजूद यह कृति इस विषय क्षेत्र के अध्ययन में लगे मीडिया के छात्रों, शोधार्थियों, मीडिया आलोचकों के लिए निश्चय ही प्रेरक एवं उपयोगी कृति है ।  इस कृति के इस रूप में प्रस्तुति के लिए लेखकगण, संपादक संजय द्विवेदी और यश पब्लिकेशंस, दिल्ली बधाई के पात्र हैं ।  कृति के आवरण (दूसरे) पृष्ठ  पर छपी टिप्पणी में ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व संपादक विश्वनाथ सचदेव ने राय दी है कि, “एक सर्वथा नए विषय पर इनती सामग्री का एक साथ होना भी नए विमर्शों की राह खोलेगा इसमें दो राय नहीं है ।  पुस्तक की उपयोगिता भी इससे साबित होती है कि इसमें लेखकों ने एक सर्वथा नई दुनिया में हस्तक्षेप करते हुए उसके विविध पक्षों पर सोचने की शुरूआत की है ।”

 आज अधिकांश पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं में शायद कंप्यूटर में अक्षर संयोजकों और प्रूफ़ पढ़ने वालों की लापरवाही की वजह से मुद्राराक्षसों का दर्शन (प्रूफ़ की अशुद्धियों का नज़र आना) आम बात बन चुकी है, कम मात्रा में ही क्यों न हो, यह कृति भी इसका अपवाद नहीं है ।  संपादक ने इस कृति को सृजनगाथ डाट काम के संपादक जयप्रकाश मानस को समर्पित किया है ।

पुस्‍तक  - सोशल नेटवर्किंग - नए समय का संवाद (ISBN: 978-81-926053-6-4),

संपादक – संजय द्विवेदी

प्रथम संस्करण 2013,

पृष्ठ –115,

मूल्य – रु.295,

प्रकाशक – यश पब्लिकेशंस, 1/11848 पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली – 110 032

 

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पुस्‍तक - ‘सोशल नेटवर्किंग - नए समय का संवाद’ (ISBN: 978-81-926053-6-4),
संपादक – संजय द्विवेदी
प्रथम संस्करण 2013, मूल्य – रु.295
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