मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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अब मीडिया का जनविकल्प मोबाइल नेटवर्किंग!

मोबाइल से ही जनता की आवाज सुनी जायेगी! आदिवासी जो जल जंगल जमीन से बेदखल है,उन्हें आप न नेट से, न अखबार से और न अन्य माध्यमों से संबोधित कर सकते हैं।

पलाश विश्वास/ अगर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) से मिले आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें कमी के बावजूद प्रिंट मीडिया उद्योग ने जोरदार वापसी दर्ज की है। आईआईपी के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल में समाचार पत्र उत्पादन में 56.7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि कुल औद्योगिक वृद्धि एक साल पूर्व की इसी अवधि के 5.3 फीसदी की तुलना में महज 0.1 फीसदी रही। प्रकाशन, प्रिंटिंग और पुनरुत्पादन सहित समूचे मीडिया क्षेत्र की वृद्धि शानदार 52.7 फीसदी रही। वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान 10.78 फीसदी भार वाले इस खंड की वृद्धि 29.6 फीसदी रही। आईआईपी में 0.2 फीसदी हिस्सेदारी वाले मोबाइल हैंडसेट और अन्य टेलीफोन उपकरणों के उत्पादन में अप्रैल में 30 फीसदी की तेजी दर्ज की गई।

बीबीसी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के ज़िले कवर्धा में एक वनरक्षक ने जब कुछ बैगा आदिवासियों से कथित तौर पर 99 हज़ार रुपए रिश्वत ली, तो स्थानीय लोगों ने मोबाइल रेडियो स्टेशन ‘सीजीनेट स्वर’ पर इसकी शिकायत कर दी. शिकायत का पता चलते ही वन अधिकारी को पैसे लौटाने पड़े और उन्होंने माफ़ी भी मांगी. मामले की अब जांच हो रही है.

ये ताक़त है लोकल कम्यूनिटी नेटवर्क की, जिसने स्थानीय लोगों को अपनी आवाज़ सत्ता-प्रशासन में बैठे लोगों तक पहुँचा पाने का एक विश्वास दिया है.

सीजीनेट स्वर' मध्य भारत के आदीवासी क्षेत्रों पर केंद्रित और मोबाइल पर आधारित एक रेडियो स्टेशन है. लोग अपना संदेश फ़ोन के ज़रिए रिकॉर्ड करते हैं और यह संदेश प्रारंभिक जांच के बाद वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया जाता है साथ ही इन्हें मोबाइल पर भी सुना जा सकता हैं. मोबाइल पर सुनने के लिए श्रोताओं को बस एक नंबर पर कॉल करना होता है.

मोबाइल क्रांति ने बाजार को देहात के दूरदराज के इलाके तक विस्तृत कर दिया है।मोबाइल धारकों के मार्फत अत्याधुनिक उपभोक्ता संस्कृति देश के चप्पे  चप्पे में है और मुक्त बाजार के शिकंजे में हैं जंगल, पहाड़, मरुस्थल,रण और समुंदर। लेकिन अगर इसी मोबाइल क्रांति को मीडिया का जनविकल्प तैयार कर दिया जाये तो हालात बदल भी सकते हैं।

वैकल्पिक मीडिया अब तक बुद्धिजीवी मध्यवर्गीय अभिव्यक्ति का माध्मम रहा है।वंचित तबके के लिए वैकल्पिक मीडिया का दरवाजा खोलने के लिए यह एक चामत्कारिक पहल है और हमें इसको विस्तत करने की कोशिश अवश्य करनी चाहिए।

दूसरी ओर, आदिवासी जो जल जंगल जमीन से बेदखल है,उन्हें आप न नेट से, न अखबार से और न अन्य माध्यमों से संबोधित कर सकते हैं।

असल बात तो यह कि हवाई बातों से कुछ हो ही नहीं सकता अगर हमारे पांव जमीन पर न हो। छत्तीसगढ़ में मोबाइल नेटवर्किंग के जरिये सीधे जनसुनवाई की जो पद्धति आजमाई जा रही है,उसे देश भर में मोबाइल क्रांति से जोड़ने में हमारे तकनीक दक्ष मित्र कुछ मदद कर सकें तो बेहतर नतीजे निकल सकते हैं। इसीलिए आज का यह रोजमामचा इसी मुद्दे पर।

अखबारों के मार्फत खुद पत्रकारिता पेशे से जुड़े लोगों की जनता के हक हकूक की आवाज उठाने की मनाही है।कारपोरेट प्रबंधन कारपोरेट हित में मीडिया की नीतियां तय करते हैं।संपादक अब सीईओ हैं तो मैनेजरों के पालतू गुलाम होकर घुट घुटकर जी मर रही है जनपक्षधर पत्रकारिता।

अखबारों के प्रसिद्ध स्तंभकार के नियमित कालम में भी मीडिया मालिकों की इच्छा का मुताबिक रंगबिरंगा लेखन चल रहा है और मुक्तबाजार,विकास,आर्थिकसुधार, नमोमय  शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश,निजीकरण और विनिवेश,पीपीपी माडल,प्रोमोटर बिल्डर राज,जनसंहारी राजकाज के खिलाफ चूं तक करने की गुंजाइश नहीं है।

लघु पत्रिकाओं का जो आंदोलन सत्तर के दशक में वैकल्पिक मीडिया बतौर सामने आया था,वह भी अब पार्टीबद्ध सीमाबद्धता होते हुए अस्तित्व की लडा़ई में बाजार निर्भर है तो साहित्य कला के दायरे से वैचारिक राजनीतिक बहस के अलावा वहां भी कोई जनसुनवाई नहीं हो रही है।

सोशल मीडिया का कारोबार अब कमोबेश केसरिया है। मजीठिया अन्याय के खिलाफ क्रांति के आवाज के दम तोड़ने से यह साबित हो गया है कि मीडियाकर्मी किस तरह निःशस्त्र चक्रव्यूह में एकदम अकेले मारे जाने को अभिशप्त है।

निजी तौर पर ब्लाग लेखन और समूह संवाद को सर्च इंजन के जरिये खोजने की गुंजाइश वैसे भी नहीं रही और गंभीर लेखन जनप्रतिबद्ध लेखन मोबाइल कंप्यूटर से जनता के बीच पहुंचता ही नहीं है और न कोई गोलबंदी उसके जरिये अब संभव है।

रियल टाइम मीडिया फेसबुक ट्विटर से संपर्क तो तुरत फुरत मध्य वर्गीय नेटनागरिकों से हो सकता है,लेकिन उनके वर्गीय जातिगत हित उन्हें सीधे तौर पर जनसरोकारों से जोड़ते नहीं है।

दूसरी ओर,मोबाइल इंटरनेट और ब्रांड से आनलॉइन जुड़ने का प्रमुख जरिया बनता जा रहा है। इन्मोबी द्वारा तैयार मोबाइल मीडिया खपत रपट के मुताबिक मोबाइल मीडिया की मांग लगातार बढ़ रही है और मोबाइल सिर्फ उपभोक्ताओं के संचार की जरूरत ही पूरी नहीं कर रहा है बल्कि एक प्रमुख जरिया है बनता जा रहा है जिसके माध्यम से वे इंटरनेट और विभिन्न ब्रांड से आनलाइन जुड़ते हैं।

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