मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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आइने में अपना चेहरा भी देखे मीडिया

संजय कुमार /   मीडिया का महिला प्रेम उजागर हो चुका है यानी मीडिया मठाधीशों द्वारा मीडिया हाउस में महिला पत्रकारों के साथ शोषण की बात अब आम हो चली है और इसे आम किया है, सोशल मीडिया ने। मीडिया में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर शोषण की कहानियां सोशल मीडिया के आने के बाद जोर शोर से सुनाई से देने लगी है। वैसी महिला पत्रकार जो हर हाल में जगह पाना चाहती है, वे मीडिया के मठाधीशों के चुगंल में आसानी से आ जाती हैं। वहीं, इसका खामियाजा वैसी महिला पत्रकारों को भी उठाना पड़ता है जो अपने दम पर आती हैं। मीडिया मठाधीश अपने झांसे में लेने की पुरजोर कोशिश करते हैं और  तरूण तेजपाल जैसों की कहानी दुहराई जाती है। हालात यह है कि मीडिया के महिला पे्रम की चपेट में कई तेजपालों की पोल खुलती ही जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मीडिया में क्यों हो रहा है यौन शोषण? मीडिया पर काबिज पुरूषसत्ता, महिलाओं को मीडिया हाउस में जगह देने में प्रारदर्शिता नहीं बरतता है? जुगाड़ या फिर संुदरता का पैमाना स्त्री विमर्श पर सवाल खड़ा कर जाता है? मीडिया में जगह दिलवाने के एवज में या फिर कार्य के दौरान अपनी महिला सहकर्मियों को प्रताड़ित कर यौन शोषण के जाल में फंसाया जाना आम हो गया है। इंकार करने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। हालांकि मामला का खुलासा होने से कई पुरूष पत्रकारों को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा है।

निजी मीडिया के साथ ही साथ सरकारी मीडिया में भी यौन शोषण के छींटे पड़े हैं। दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो में काम कर रही महिलाकर्मियों की शिकायतों की गंुज सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय होते हुए अखबारों तक पहुंची। मीडिया में यौन शोषण के घेरे में छोटे बड़े सभी पत्रकार आये हैं। शोषण करने और होने वालों में दोनों पहलू गवाह बने हैं। यहंा नाम गिनाने की जरूरत नहीं है। सवाल है आखिर क्यों ? या तो मामला मीडिया की चकाचैंध का है या फिर कैरियर का या महिलायों की भागीदारी कम होने का ? पुरुषवादी समाज के प्रभुत्व का खामियाजा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि महिलाएं भी  मीडिया में आने के बाद कैरियर के प्रति चिंतित होती है और एक बार शिकार होती है तो बार-बार उन्हें घेरने की कोशिश पुरूष प्रभुत्व करता है।

मीडिया के राष्ट्रीय सर्वे से पता चलता है कि राष्ट्रीय मीडिया में महिलाओं की भागीदारी 17 प्रतिशत है। अंग्रेजी मीडिया में अपेक्षाकृत महिलाओं की भागीदारी ठीक है, जबकि अंग्रेजी इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में इनकी भागीदारी संतोषजनक है। अगर मीडिया हाउस में महिला पत्रकारों की भागीदारी पुरूषों के बराबर हो जाये और शिखर पर महिला काबिज हो तो यौन शोषण पर अंकुश लग सकता है। मीडिया की चमक-दमक से युवतियां खींची चली आती हैं और हर हाल में जगह पाने की होड़ उन्हें यौन शोषण की ओर धकेल देती है? वहीं कैरियर की भी ललक होती है जो महिला सशक्तीकरण की दृृष्टि से जायज है। महिलाओं को भी मीडिया क्षेत्र में आना चाहिये। आ भी रही हैं लेकिन जाति व जुगाड़ तंत्र से प्रवेश पाने वाली महिलाओं से उन महिलाओं को खतरा है जो सही मायने में एक पत्रकार की भूमिका में कुछ करने की ललक के साथ आती है। जबकि दूसरी धारा की यानी फैशन-पैशन-जाति-जुगाड़ के तहत आने वाली महिलाओं से स्थितियां बदरंग हो जाती हंै और सब कुछ सवालों के घेरे में आने लगता है। इसमें सरकारी व गैर सरकारी दोनों मीडिया शामिल है। पारदर्शिता, नियम-कानून और सिद्धांतों को ताक पर रख प्रवेश करा दिया जाता है। जाति काम नहीं आयी तो जुगाड़-पैरवी को सीढ़ी बना लिया जाता है। इसे लेकर चर्चा आम भी होती हैं। 

मीडिया के महिला प्रेम  से उत्पन्न सवाल, स्त्री विमर्श आंदोलन से माफी चाहता है। हालात यह है कि मीडिया में महिला प्रेम की घटना से महिलाएं इस क्षेत्र में आने से कतराने लगी हैं तो वहीं अभिभावक भी दूसरे क्षेत्र में भेजने की सलाह देते हैं। देखा जाता है कि इस दलदल में एक बार जो फंस जाती है उसके लिए निकल पाना मुश्किल सा हो जाता है। कई जीवंत उदाहरण है। ऐसी महिला पत्रकार को लेकर मीडिया में फुसफुसाहट व सुगबुगाहट होने लगती है। बात एक शहर के एक मीडिया हाउस की है। एक छोटे से कस्बे से आयी युवती ने मीडिया हाउसों का चक्कर लगाया। महिला, जाति व जुगाड़ तंत्र से एक जगह काम मिला तो कुछ ही दिनों में उसके बाॅस के करीबी होने को लेकर चर्चा आम हो गयी। उसके बाॅस ने भी नियमों को नजरअंदाज कर महिला को जगह दी। ऐसा नहीं कि सभी मीडिया हाउस और सभी पुरूष व महिला पत्रकार एक जैसे होते हों। लेकिन एक-आध मामले आने से दाग भी लगना स्वभाविक है।

यौन शोषण से जुड़े ज्यादातर मामले सेटेलाइट चैनलों से हैं । टीवी पर आने की ललक या कैरियर के लिए मीडिया में आने वाली महिला पत्रकारों को थोड़ी देर के लिए विवश तो बना ही जाता है। लेकिन कई मामलों में कहानी कुछ और होती है। पुरूष को सीढ़ी बनाकर या पावर के इस्तेमाल से महिलाएं जहंा आगे आती है वहीं, सही मायने में मीडिया को कैरियर बनाने वाली महिला पत्रकारों को संघर्ष करना पड़ता है। महिला पत्रकार उत्पीड़न का विरोध या शिकायत करना चाहती है तो उसे रोका जाता है साथ ही महिला सहकर्मी उसे ऐसा करने से रोकती भी है। पत्रकारिता जगत में यौन हिंसा या शोषण के मामले पर बीबीसी का साभार लेकर ‘आधी आबादी’ ने अपनी वेबसाइट पर 26 नवंबर 2013 को यह पोस्ट प्रकाशित किया जो हकीकत बयां करती है। 

‘पूरी दुनिया से सवाल पूछने वाले, बराबरी और सच की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार, जिनके काम की आप बहुत इज्जत करते हैं, जब उनमें से ही कोई अपनी महिला सहकर्मियों के साथ दुव्र्यवहार करे तो ये बहुत दःुखदायी और निराशाजनक होता है। अपने अनुभवों को बीबीसी से साझा करते हुए पत्रकार रुक्मिणी सेन कहती हैं कि किसी मीडिया संस्था में ताकतवर पद पर पहुंचने के बाद कोई पुरुष अगर अपने सिद्धांतों को ताक पर रख दे तो ये महिलाओं को बहुत हतोत्साहित करता है। 18 साल से पत्रकारिता कर रही रुक्मिणी के मुताबिक जब अपनी नौकरी को ताक पर रखकर कोई महिला अपने से वरिष्ठ सहकर्मी के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत जुटाती भी है, तो उस वक्त ज्यादातर पुरुष सहकर्मी उनके साथ नहीं खड़े होते हैं। तो क्या लोकतंत्र का चैथा  स्तंभ माने जाने वाले पत्रकारिता जगत में यौन हिंसा या शोषण के मामले उतने ही आम हैं जितने और क्षेत्रों में? पिछले कुछ महीनों में काम की जगह पर यौन शोषण के कई मामले सामने आए जैसे दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो में काम कर रही महिलाकर्मियों की शिकायत, सन टीवी की एक महिलाकर्मी एस अकिला का मामला और अब तहलका पत्रिका के संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ यौन हिंसा की शिकायत।

बीबीसी से बातचीत में एस अकिला ने बताया कि सन टीवी में काम करते हुए जब उनके सीनियर ने उनसे अश्लील बातें करनी शुरू की तो कई महिला सहकर्मियों ने ही उन्हें शिकायत करने से मना किया। अकिला ने कहा, दफ्तर में वो शख्स ऐसा बर्ताव कई महिलाओं के साथ सालों से करते आ रहा था, लेकिन नौकरी चले जाने के डर से किसी ने शिकायत नहीं की, मुझे भी सबने मना किया, लेकिन मेरे लिए ये करना जरूरी था। अकिला की शिकायत के बाद एक अन्य मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। पर अकिला के मुताबिक ये उनकी शिकायत की वजह से किया गया। उनकी शिकायत के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए दिशा निर्देश के तहत एक शिकायत कमेटी का गठन भी हुआ, लेकिन फैसला उनके हक में नहीं आया। दो महीने पहले समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अकिला ने जिन धमकियांे और अश्लील बातों के आरोप लगाए हैं, वो फोन पर दिए गए यानी वो कार्यस्थल पर नहीं हुए इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। ये जरूर है कि जिस शख्स के खिलाफ उन्होंने शिकायत की, उन्होंने अब सन टीवी से इस्तीफा दे दिया है। शिकायत के बाद भी प्रताड़ना। भारत में काम कर रही महिला पत्रकारों के संगठन ‘नेटवर्क फॉर वुमेन इन मीडिया इन इंडिया’ की राष्ट्रीय संयोजक और पत्रकार लक्ष्मी मूर्ति मानती हैं कि पत्रकार होने की वजह से महिलाएं अपनी बात कहने में ज्यादा सक्षम महसूस करती हैं, लेकिन उनकी शिकायत पर कैसा अमल होगा इसका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए दिशा निर्देशों के तहत कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकायत किए जाने पर संस्था की जिम्मेदारी है कि वो एक शिकायत कमेटी का गठन करे, जिसकी अध्यक्षता एक महिला करे, उसकी आधी से ज्यादा सदस्य महिलाएं हों और उसमें यौन शोषण के मुद्दे पर काम कर रही किसी बाहरी गैर-सरकारी संस्था की एक प्रतिनिधि भी शामिल हो। बीबीसी से बातचीत में लक्ष्मी ने कहा, यौन शोषण पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश और अब कानून बनना महिला आंदोलन की एक बड़ी सफलता है, लेकिन अब भी 80-90 फीसदी मीडिया दफ्तरों में शिकायत कमेटियां नहीं बनाई गई हैं और ना ही उनके सदस्य सही तरीके से नियुक्त किए जाते हैं। लक्ष्मी के मुताबिक शिकायत के बाद भी महिलाओं से ही सवाल पूछे जाते हैं, उनकी सच्चाई पर शक किया जाता है और उन्हें एक दिक्कत पैदा करने वाली कर्मचारी माना जाने लगता है जिसकी वजह से उन्हें काम के कई अच्छे मौकों से महरूम किया जाता है।

भारत सरकार ने वर्ष 2013 में कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ एक कानून पारित किया। इसके तहत कार्यस्थल की परिभाषा सिर्फ दफ्तर तक सीमित नहीं रखी गई है और इसमें असंगठित क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को भी शामिल किया गया है। नए कानून का पालन ना करने पर कंपनी के मालिक को 50 हजार रुपए तक का जुर्माना भी देना पड़ सकता है,(साभार- बीबीसी हिंदी)।

अकिला की कहानी का दोहराव जारी है। 7जुलाई 2014 को भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार संदीप ठाकुर का आलेख चैंकता है। यह आलेख मीडिया में महिलाओं के साथ हो रहे यौन शोषण और मीडिया के महिला प्रेम  की पोल खोलता है।

घटना 22 जून 2014 की है। रविवार होने के कारण मैं घर पर ही था तभी एक साथी का फोन आया। उसने बताया कि टी आर पी के रेस में अव्वल आने को आतुर न्यूज चैनल इंडिया टीवी की एक जवान व खूबसूरत एंकर ने कार्यालय में ही जहर खाकर जान देने का प्रयास किया। मीडिया के अन्दरुनी हालात से अच्छी तरह वाकिफ होने के कारण यह खबर सुन मुझे कोई हैरानी नहीं हुई, लेकिन देखने जानने की उत्सुकता जरुर हुई कि आखिर माजरा है क्या? फौरन टीवी आन किया और एक-एक कर तमाम न्यूज चैनल खंगाल डाले, लेकिन एंकर की आत्महत्या की खबर कहीं नहीं दिखी। अगले दिन कुछ अखबारों ने अन्दर के पन्नों पर सिंगल कॉलम में खबर छापी थी। लिखा था-एक न्यूज चैनल की एंकर ने अपने बॉसेज की हरकतों से परेशान होकर कार्यालय में ही जहर खाकर जान देने का प्रयास किया। छपी खबरों में ना तो चैनल का नाम था और ना ही उस एंकर का जिसने जहर खाया। भला हो सोशल मीडिया का जिसने चैनल व एंकर दोनों के नाम और तस्वीरें प्रमुखता से छाप मीडिया जगत को इस घटना की जानकारी देने का फर्ज पूरा किया था। एंकर तनु शर्मा द्वारा जान देने का प्रयास आम लोगों के लिए एक सामान्य घटना हो सकती है लेकिन मीडिया जगत के लिए यह एक बड़ी घटना मानी जाएगी । चॅूकि, यह घटना इंडिया टीवी के कर्ताधर्ता के चैनल से जुड़ी है इसलिए दब गयी। यदि आत्महत्या का प्रयास करने वाली महिला किसी अन्य पेशे से जुड़ी होती तो चैनल वालो ने उसका, उसके परिवार का और साथ ही कार्यालय वालों का जीना हराम कर दिया होता। 
सवाल यह है कि मीडिया में ऐसे हालात क्यों पैदा होते जा रहे हैं कि इस पेशे से जुड़े लोगों को जान देने की नौबत तक आ गयी है। दरअसल पत्रकारिता की दुनिया बाहर से जितनी खूबसूरत, भव्य और ग्लैमरस दिखती है अन्दर से उतनी ही बदरंग है। खास तौर से टीवी पत्रकारों की तो बेहद बुरी हालत है। लगभग दो दशक की पत्रकारिता के कैरियर में मेरी जानकारी में कई ऐसे मामले आए हैं। एक न्यूज चैनल है ग्रेटर नोएडा में, चैनल के आलीशान और भव्य कार्यालय के अन्दर क्या-क्या होता है इसके किस्से अक्सर बाहर आते रहते हैं। महिला पत्रकारों के शोषण के अधिकांश किस्से इसी चैनल से जुड़े हैं। 
कुछ वर्ष पहले एक सज्जन इस चैनल में एंकर थे। आजकल वे रात के नौ बजे के आस-पास किसी दूसरे चैनल पर भाषण देते हुए देखे जा सकते हैं। इस एंकर ने कई महिला पत्रकारों को टहलाया घुमाया। एक बार तो पुलिस ने नोएडा फिल्म सिटी में ही उनकी कार में एक महिला पत्रकार के साथ उन्हें रंगे हाथों पकड़ा था। मामला चैनल से जुड़ा होने के कारण रफा-दफा हो गया था। इसी चैनल में एक अन्य सज्जन एक्जीक्युटिव प्रोड्यूसर थे। इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कैरियर बनाने आई कई इन्टर्न पर अपनी मर्दानगी का भरपूर प्रदर्शन किया। लेकिन, एक इन्टर्न दबंग निकली। उसने दबंगई के साथ प्रोड्यूसर महोदय का गला पकड़ लिया और शादी करने पर मजबूर कर दिया। पहले से शादीशुदा प्रोड्यूसर महोदय की एक नहीं चली और अपनी उम्र से तकरीबन 18 साल छोटी लड़की को अपनी पत्नी बनाना पड़ा।

कई न्यूज चैनलों में बतौर राजनीतिक सम्पादक काम कर चुके एक ऐसे पत्रकार को मैं जानता हूं जिनकी पत्नी भी इसी पेशे में हैं। पत्नी तेजतर्रार है और उसे पत्रकारिता में बगैर काबिलियत के आगे बढ़ने के सारे गुर पता हैं।  आज, चैनलों में इस मोहतरमा की गिनती भी बड़े पत्रकारों में होती है। इसका पता उसके पति को भी है लेकिन वे चुप हैं। हरियाणा में प्रमुखता से देखे जाने वाले एक क्षेत्रीय चैनल की एक एंकर प्रिया सिंह ने कुछ वर्ष पहले आत्महत्या कर ली थी। यह घटना सितम्बर 2007 की है। बिहार की रहनी वाली प्रिया ने आत्महत्या करने से पहले एक पत्र में इसके लिए अपने सीनियर बॉसेज को जिम्मेदार बताया था। प्रिया ने अपने सुसाईड नोट में लिखा था कि इन दोनों के शोषण से परेशान होकर जान देने पर मजबूर होना पड़ रहा है। मामले की जॉच चली, लेकिन मीडिया से जुड़ा होने के कारण अन्ततः मामला रफा-दफा हो गया। 

पत्रकारिता में महिलाओं का शोषण कोई नई बात नहीं है। कई महिला पत्रकार भी पुरुष का शोषण करने से बाज नहीं आतीं। तकरीबन तीस वर्ष पहले दूरदर्शन एकलौता चैनल हुआ करता था। उन दिनों दूरदर्शन में महिला पत्रकारों की संख्या अच्छी खासी थी। एक महिला रिपार्टर थी जो कामधाम कुछ नहीं करती लेकिन वेतन पूरा उठाती थी। एक दिन उसके बॉस ने उस महिला रिपोर्टर से कहा कि ऐसे कबतक चलेगा। आप आॅफिस आती नहीं हो और सैलरी पूरी उठाती हो। उस महिला रिपोर्टर ने अधिकारी से कहा कि आपको पता है कि कुछ लोग बुद्धिबल से नौकरी पाते हैं तो कुछ बाहुबल से। मैंने .......से नौकरी पाई है। मैं तुम्हारे बॉंस को अभी तुम्हारी शिकायत कर दूं तो शायद तुम इस कुर्सी पर कल से दिखोगे नहीं। यह सुन अधिकारी सन्न रह गया। 

महिलाओं के शोषण की बात खुशवन्त सिंह की चर्चा के बगैर अधूरी रह जाएगी। खुशवन्त सिंह का नाम पत्रकारिता जगत में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। लेकिन खुशवन्त सिंह ने महिलाओं को सदैव कामुक नजर से देखा। यह मैं नहीं कह रहा बल्कि उन्होंने यह बात अपनी पुस्तक में खुद स्वीकारी है। गत वर्ष प्रकाशित ‘खुशवन्तनामा: द लैसंस ऑफ माई लाइफ’ नामक पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि मैं हमेशा अय्याश व्यक्ति रहा। अय्याशी हमेशा मेरे दिमाग में रही। मैंने कभी भारतीय सिद्धान्तों में विश्वास नहीं किया कि मैं महिलाओं को अपनी मां, बहन या बेटी के रुप में सम्मान दूं। उनकी जो भी उम्र हो, मेरे लिये वे यानी महिलाएं सिर्फ वासना की वस्तु थी और रहेंगी। अपनी एक अन्य पुस्तक ‘सन-सैट क्लब’ में तो उन्होंने यहां तक लिखा है कि जब वे लोदी गार्डेन में टहलते थे तो वहां स्थित इमारत की गुम्बद उन्हें महिलाओं के स्तन की याद दिलाती थी। 

नीरा राडिया के उल्लेख के बिना पत्रकारिता जगत में फैले गंध की बात पूरी नहीं हो सकती। नीरा राडिया का असली नाम नीरा शर्मा है। केन्या में जन्मी व लन्दन में पली बढ़ी नीरा की शादी गुजराती फाइनेन्सर जनक राडिया से हुई थी। उसके बाद ही वे नीरा राड़िया बन गयीं। पति से अनबन होने के बाद वे भारत आई और सबसे पहले उनकी दोस्ती हरियाणा के दिवंगत मुख्यमंत्री राव विरेन्द्र सिंह के पोते धीरज सिंह से हुई। यहीं से देश के राजनीतिक गलियारे में उनका प्रवेश शुरू हुआ। राजग सरकार में नागर विमानन मंत्री रहे अनन्त कुमार की वे चहेती थीं। इतनी चहेती कि लंकेश पत्रिका ने उनके बारे में पूरा विशेषांक ही निकाल दिया था। मंत्रियों, उद्योगपतियों, अफसरशाहों, टीवी चैनलों, आर्थिक व अंग्रेजी अखबारों के सम्पादकों से नीरा राडिया के प्रगाढ़ सम्बन्ध बने। इतने प्रगाढ़ कि नीरा राडिया यह तय करने लगी कि यूपीए-2 में किसे मंत्री बनाना है किसे नहीं। 

देश जिस मीडिया से सच्चाई, साहस और संघर्ष की उम्मीद करता है उस मीडिया की अति महत्वाकांक्षी सम्पादकों व चंद महिला पत्रकारों ने ऐसी की तैसी करके रख दी। इस पेशे में ऐसे - ऐसे लोग आ गये हैं जिनके लिए नैतिकता, ईमानदारी और मेहनत का कोई मोल नहीं है। कोई काम नहीं सूझ रहा तो पत्रकार बन जाओ। आज दूधिया से लेकर प्रापर्टी डीलर और पनवाड़ी से लेकर चिटफन्ड कम्पनी की आड़ में लोगों को लूटने वाले लोग किसी न किसी समाचार पत्र, पत्रिका व चैनल के मालिक बने बैठे हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य मीडिया के माध्यम से अपने गलत कार्यों का बचाव करना और ब्लैकमेलिंग कर पैसे कमाना है। उनके इस कार्य में महिला पत्रकार व दलाल काफी उपयोगी साबित हो रहे हैं। शायद यही वजह है कि पत्रकारिता में जीभ और जांघ का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है,(साभार-7 जुलाई 2014 को भड़ास4मीडिया में संदीप ठाकुर का आलेख.......कुछ शब्दों को हटाकर दिया गया है)।

मीडिया में महिलाओं के यौन शोषण के लिए सिर्फ और सिर्फ पुरुषवादी समाज के प्रभुत्व को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। संदीप ठाकुर के आलेख को देखें तो योग्यता नहीं रखने वाली महिलाएं जाति व जुगाड़ तंत्र का प्रयोग कर स्थान पा लेती हैं। हां, उन महिलाओं को नुकसान होता है जिनके पास योग्यता तो होती है लेकिन जाति व जुगाड़ का कार्ड नहीं होता।

मीडिया के महिला पे्रम का एक और बड़ा खुलासा सोशल मीडिया पर हुआ। न्यूज24 चैनल के अलावा कई मीडिया हाउस से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार अतुल अग्रवाल का एक महिला पत्रकार के साथ के संबंध सामने आये। न्यूज24 चैनल से एक गुमनाम आईडी से ग्रुप मेल भेजने के आरोप में उनकी नौकरी गई तो भास्कर न्यूज से एक लड़की से यौन दुर्व्यवहार को लेकर निकाले गए। इन दिनों ईटीवी में थे, जहां से उन्हें इसलिए इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि उनका एक सेक्स टेप यूट्यूब पर वायरल हो गया है। भड़ास4मीडिया ने पूरी कहानी, 7 मार्च 2015 को प्रकाशित किया है।

वाशिंगटन के इंटरनेशनल वीमन्स मीडिया फाउंडेशन और लंदन के इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट ने 822 महिला मीडियाकर्मियों का साक्षात्कार किया और निष्कर्ष निकाला कि मीडिया संस्थाओं में काम करने वाली महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर पहले वैश्विक सर्वेक्षण में लगभग दो तिहाई महिला पत्रकारों को कार्य के दौरान उत्पीड़न या धमकी का अनुभव सहना पड़ता है। इसमें पाया गया कि महिला मीडियाकर्मियों को धमकी और उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं कार्यस्थल पर होती हैं और ये काम पुरुष वरिष्ठ अधिकारियों, निरीक्षकों और सहकर्मियों द्वारा किया जाता है। 

इन कुछ घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मीडिया हाउस में महिलाओं को लेकर हालात क्या हैं ? मीडिया में महिलाओं के सियासी गठजोड़ की कहानी भी कम नही है। दिग्विजय सिंह की कहानी ताजा है। ऐसी कई कहानियां सामने आती रही है। गौर करने वाली बात यह है कि यह मीडिया जो दूसरों की तरफ अंगुली दिखाती है, उसकी चार अंगुली उसकी तरफ ही होता है। ऐसे में मीडिया की भी नीति शास्त्र होना चाहिए। लेकिन व्यवहार में बाहर तो नीति शास्त्र दिखता है लेकिन जब अपनी बारी आती है तब उसपर परदा डालने की भरपूर कोशिशें होती हंै। मतलब साफ है कि दूसरों को चेहरा दिखाने का काम करने वाली मीडिया कभी कभार अपना चेहरा भी देख लिया करे तो शायद मीडिया में महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हो सके।

चिंता की बात यह है कि मीडिया में महिलाओं के प्रति गलत अवधारणा कायम होती जा रही है। इस अवधारणा का ही परिणाम है कि ज्यादातर पत्रकार मीडिया में महिलाओं की भागीदारी तो देखना चाहते हैं लेकिन परिवार के महिला सदस्य को मीडिया में आने से रोकते है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि मीडिया में महिलाओं की स्थिति कैसी है? हालांकि स्वामित्व और प्रभावशाली पदों पर महिलाओं के बारे में ऐसी बातें लागू नहीं होती है। जाहिर है मीडिया में महिला भागीदारी बढ़े तभी पुरूष प्रभुत्व को लेकर जो सवाल उठ रहा है उस पर अंकुश लगे या फिर कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ बने कानून का इस्तेमाल व पालन कड़ाई से हो। 
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