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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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क्या क्रिसमस की छुट्टी पर है पत्रकारिता

December 25, 2015

डी डी सी ए मामले में रिपोर्टिंग नहीं हो रही है

रवीश कुमार/ खोजी पत्रकार क्रिसमस की लंबी छुट्टी पर चले गए हैं ! तभी तो डी डी सी ए मामले में उतना ही सामने आ रहा है जितना बयानों में आ रहा है । अब तक ऐसे बड़े मामलों में प्रेस कांफ्रेंस से आगे जाकर रिपोर्टिंग हो जाती थी लेकिन इस बार चुप्पी है । हेराल्ड का मामला आया तो खोजी पत्रकारों ने पंचकुला से लेकर बांद्रा तक इस अख़बार को मिली ज़मीन के काग़ज़ खंगाल डाले । बहुत अच्छा किया । कम से कम ऐसे ही राजनीति का काला सच सामने आता रहे लेकिन क्या वैसा डी डी सी ए के मामले में हो रहा है ? एक तरफ से आरोप आ रहे हैं और दूसरे तरफ से जवाब लेकिन काग़ज़ नहीं आ रहा है । खोजी पत्रकारों की कोई बिरादरी नहीं होती है पर कुछ लोग ऐसा करते हैं और बाकी लोग ऐसे मौकों पर लगा दिये जाते हैं ।लगता है उन्हें काम पर लगाने वाले छुट्टी पर हैं !

डी डी सी ए मामले में रिपोर्टिंग नहीं हो रही है । बयानों से किसी की छवि को नुक़सान हो रहा है पर चुप्पी की स्वामी भक्ति से बेहतर नहीं होता कि रिपोर्टिंग के ज़रिये तथ्यों को उजागर किया जाता और ऐसी सतही राजनीति पर अंकुश लगता । मीडिया बता सकता था कि वो प्रेस कांफ्रेंस का खिलौना नहीं है । मीडिया बताता भी है पर इस बार सारा ज़ोर बहस की तू तू मैं मैं से निकल जाने पर है । तथ्यों को स्थापित करने पर नहीं । आखिर उसके ऐसा न करने से मीडिया में व्यक्ति का नाम तो आ ही रहा है । उसकी छवि ख़राब हो ही रही है ।

मैं तो हमेशा कहता हूँ कि पहले भी नहीं था और अब भी नहीं है । सुविधा की पत्रकारिता ही संघर्ष की पत्रकारिता है । आप किसी खेमे या दरबार से आसानी से अटैच होकर दिखा दीजिये । इसलिए पत्रकारों को नेता और पार्टी से खुलेआम अटैच हो जाना चाहिए । पत्रकारिता की पढ़ाई में अटैची पत्रकारिता का चैप्टर होना चाहिए । अटैची पत्रकारों के लिए गाइडलाइन बने कि वे सिर्फ अपने नेता या पार्टी का बचाव करेंगे । अटैची पत्रकार विरोधी दल के नेता पर ट्वीट कर पत्रकार होने का भ्रम नहीं पालेंगे ।

नए पत्रकार  किसी आदर्शवादी बहकावे में न आएं । वे शुरू से ही किसी दरबार को चुन लें । दर्शक और पाठकों में तटस्थता की तलाश कर रहे कुछ आदर्शवादी नादानों की परवाह न करें । रिपोर्टिंग को समाप्त करने का सार्वजनिक एलान हो जाना चाहिए । बयान को ही तथ्य मान लिया जाए । दशकों से जब ये मीडिया की सच्चाई है तो इसे लेकर ढोंग क्यों किया जाए ? क्यों न खुलेआम किया जाए और लाभ प्राप्त किया जाए ! रही बात दर्शक और पाठक की तो उन्हें अगर जानने और जागरूक होने में इतनी ही दिलचस्पी है तो अपनी पत्रकारिता खुद कर लें !

आप देखेंगे कि तीन महीना पहले जिस ललित मोदी के ट्वीट चैनलों पर पल पल फ़्लैश होते थे, लगता है उन्हें भी कोई नहीं पूछ रहा । मुझे नहीं पता कि चैनलों ने उनका फोन से इंटरव्यू किया या नहीं लेकिन बुधवार रात वे खुलकर जेटली पर सवाल उठा रहे थे । राजस्थान क्रिकेट बोर्ड में उनकी वापसी हो गई है । उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव वापस लेने वाले अमीन भी बीजेपी के ही नेता है । कहा गया कि वसुंधरा और ललित मोदी में कुछ पैच अप हुआ है । ललित मोदी ने वसुंधरा को भी परेशानी में डाल ही दिया था । इसके बावजूद वो शख्स उनकी नाक के नीचे राजस्थान क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष बन जाता है । कांग्रेस से लेकर चैनल तक सब चुप रहते हैं । कौन जाने  ये क्रिकेट की राजनीति है या भाजपा की अंदरूनी या कांग्रेस बीजेपी की सहमति की राजनीति ? लेकिन वही ललित मोदी फिर से अरुण जेटली को निशाना बना रहे हैं । चैनल अख़बार सब चुप ।

अगर प्रेस कांफ्रेंस में कही गई बातों में दम नहीं होता तब तो आराम से काउंटर पेपर के ज़रिये कीर्ति और आम आदमी पार्टी के साहसिक उत्साह को पब्लिक की निगाह में ठंडा किया जा सकता था । कोई पत्रकार SFIO की खोज नहीं कर रहा, जिसकी रिपोर्ट पर मामले को रफ़ा दफ़ा किया जा रहा है । आखिर इसकी रिपोर्ट को अंतिम क्यों माना जा रहा है ? अगर अंतिम है तब तो और आसान है कि उसे पूरी तरह सार्वजनिक कर दें और उस पर भरोसा करते हुए मामला SIT को सौंप दिया जाए । गृह मंत्रालय ने स्टेडियम में विशिष्ट बाक्स बनाए जाने की जाँच के लिए वाया खेल मंत्रालय दिल्ली सरकार को लिखा । बीजेपी प्रवक्ता इसे इस तरह पेश कर रहे हैं कि वो इतने पारदर्शी हैं कि विरोधी पर भी भरोसा कर सकते हैं । तो क्या इसी तरह वे दिल्ली सरकार की जाँच पर भरोसा करेंगे ? पारदर्शिता !

जेटली का नाम राजनीतिक कारणों से भी आ रहा है ।पहली बार वे अपने विरोधियों के हाथ लगे हैं । जेटली के बयान भले घुमावदार और तीखे होते हैं लेकिन उन पर भ्रष्टाचार के आरोप कभी नहीं लगे । निजी बातचीत में भी किसी पत्रकार ने नहीं कहा । उनके पास पत्रकारों की खास टोली है यही अब तक सबसे गंभीर आरोप है ! अगर यह गंभीर है तो । वैसे अब हर नेता के पास अपना मीडिया है । चूँकि मीडिया पर कई लोगों का दावा होता है इसलिए कई नेताओं के पास अपने क़रीबी पत्रकार हैं ।

लेकिन राजनीतिक दलों ने जेटली से संबंध क्यों निभाये ? कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि आपकी सरकार में बनी SFIO की रिपोर्ट में फ्राड के आरोप को स्वीकार नहीं किया गया है तब आपने उस वक्त रिपोर्ट को चुनौती दी थी ? या वो रिपोर्ट क्रिकेट की दुनिया की अंदरूनी सहमति के कारण कांग्रेसी नेताओं को नज़र नहीं आई या उस रिपोर्ट में कांग्रेसी नेताओं की भी कोई भूमिका रही होगी ! कितनी बार या या या लगाकर वाक्य बनाया जाए ! क्या कांग्रेसी नेता इसलिए बचा रहे थे कि इससे एक व्यापक सहमति का निर्माण होगा और कोई एक दूसरे के बड़े नेताओं पर हाथ नहीं डालेगा । किसे पता था कि ऐसी अंदरूनी सहमतियां मोदी युग में बेकार कर दी जाएँगी । गांधी परिवार को भी कोर्ट में लाया जाएगा । फिर भी कांग्रेस जेटली के इस्तीफे की मांग कर ‘नाटकीयता की औपचारिकता’ निभा रही है ।

कांग्रेस के प्रवक्ताओं के पास भी सिर्फ बयान है या डी डी सी ए से संबंधित कुछ प्रमाण भी है ? कांग्रेस के नेता भी क्रिकेट की राजनीति में दखल रखते हैं । उनके समय में जांच भी हुई है । तो क्या वे कुछ अतिरिक्त पेश करेंगे या कीर्ति कीर्ति कहकर ही काम चलायेंगे । इसलिए कांग्रेस जेटली को संदिग्ध बनाने का प्रयास करती है तो खुद भी संदिग्ध हो जाती है । चूँकि बीजेपी अलग होने का दावा करती है और कांग्रेस को मिटा देने की राजनीति करती है इसलिए उसे अपने बचाव में कांग्रेस के उदाहरणों का इस्तमाल नहीं करना चाहिए । यह सोचना चाहिए कि कांग्रेस के मिट जाने के बाद अपना बचाव कैसे करेगी !

जेटली के विरोधी भी कहते हैं कि वे निजी तौर पर भ्रष्टाचार नहीं करेंगे । उन्हें भी यक़ीन नहीं होता । उन्हें जानने वाले किसी को नहीं होता । सार्वजनिक जीवन में साबित होने तक  इन बातों को भी मौका मिलना चाहिए । एक आदमी की साख इतनी आसानी से दाग़दार नहीं होनी चाहिए । वे अपनी वकालत की फ़ीस से ही इतना कमाते हैं कि किराये पर सोलह हजार का लैपटॉप मंगवाने की जगह अपनी जेब से सोलह हजार लैपटॉप ख़रीद कर बाँट सकते हैं । कीर्ति ने भी सीधे सीधे जेटली पर आरोप नहीं लगाए हैं । उन्होंने कहा है कि डी डी सी ए में भ्रष्टाचार हुआ है । बिना जाँच और तथ्य के यह मान लेना ठीक नहीं कि अध्यक्ष के तौर पर जेटली शामिल ही हों लेकिन यह भी मान लेना ठीक नहीं होगा कि उनकी ‘अनदेखी’ का लाभ उनके करीब माने जाने वालों को नहीं हुआ है । डी डी सी ए पर जाँच बिठाकर देखा जाना चाहिए कि वहाँ भ्रष्टाचार हुआ या नहीं । क्रिकेट बोर्ड और संघ की करतूतों की साख भी क्या जेटली की निजी साख जैसी बेदाग़ है ! नहीं तो उसकी जाँच हो सकती है । सुप्रीम कोर्ट की एस आई टी कर सकती है ।

बीजेपी ने इस मामले में अपनी घबराहट ही दिखाई है । आम आदमी पार्टी के आरोपों पर कोर्ट में दल बल के साथ पहुँचने की कोई जरूरत नहीं थी । मानहानि करने से पहले यह तो देख लेते कि मानहानि को असंवैधानिक बताने के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में बहस की है । कभी भी फ़ैसला आ सकता है कि मानहानि संवैधानिक है या नहीं । ( मुझे पूरा डिटेल नहीं मालूम ) क्या जेटली को भी उन नेताओं से सर्टिफ़िकेट की जरूरत पड़ेगी जिनसे वे आधा वाक्य बोलकर ही आगे निकल जाते हैं ।

कीर्ति आजाद को निकाल कर बीजेपी ने अनुशासन बहाल किया या पार्टी में विरोध के स्वर के लिए दरवाज़े बंद कर दिये ?  इससे तो कार्यकर्ताओं में और हताशा बढ़ेगी । दहशत फैलेगी । वे अपनी बात ही नहीं कह पायेंगे । सांसद आर के सिंह ने तो करोड़ो में टिकट बेचने के आरोप लगाए थे । राजकुमार सिंह की ईमानदारी पर तो किसी को शक नहीं । लेकिन जिस ईमानदारी का लाभ अरुण जेटली को मिल रहा है उसका लाभ ईमानदार राजकुमार सिंह को क्यों नहीं मिला !

प्रधानमंत्री ने भी हवाला कांड से तुलना कर बहस को आगे बढ़ा दिया कि क्या जेटली को इस्तीफ़ा देना चाहिए । मोदी तो व्यापम में भी क्लिन चिट दे गए जबकि अभी जाँच  चल रही है । व्यापम को लेकर सीबीआई की सक्रियता कितनी है ? शायद होगी ही ! शत्रुध्न सिन्हा भी जेटली पर हमला कर रहे हैं । वैसे मोदी युग में बीजेपी के भीतर जेटली के आरंभिक विरोधी सुब्रमण्यम स्वामी चुप हैं ! रामजेठमलानी बाहर हल्दी हैं । तो कहीं हमला है कहीं चुप्पी है । कुछ तो है जो बीजेपी के भीतर बिखर रहा है । पर इन सवालों का डी डी सी ए से क्या लेना देना ? डी डी सी ए मामले को दबा देने से बीजेपी की अंदरूनी राजनीति का हल हो जाएगा !

क्या जो लोग अभी तक डी डी सी ए पर चुप हैं वो अंदरूनी राजनीति पर लिखकर इस मामले को नया मोड़ देंगे ? वित्त मंत्री पर कोई भी दाग़ सीधा प्रधानमंत्री की निजी और ग्लोबल छवि पर पड़ेगा । जेटली और प्रधानमंत्री गुजरात दंगों के मुक़दमों के दिनों से साथी हैं । जेटली ने तब साथ दिया है जब दिल्ली बीजेपी में मोदी के समर्थक नेता कम थे । इसलिए गुप्त रूप से चल रही इस थ्योरी में प्रमाणिक तथ्य नहीं है कि प्रधानमंत्री किनारे लगा रहे हैं । जेटली किनारे लगाने वाले नेता नहीं हैं । वे अकेले सक्षम हैं । राजनीति में छवि बड़ी चीज़ होती है पर छवि ही सबकुछ नहीं होती । छवियों पर दाग़ लगते रहे हैं और नेता वापसी करते रहे हैं । इस विवाद से जेटली विरोधियों को संतुष्टि मिली होगी लेकिन जेटली उन्हें लेकर अंसुतष्ट हो गए तो !

इसलिए संविधान में संशोधन कर भारत में नैतिकता शब्द को ही प्रतिबंधित कर देना चाहिए । सबको मुक्ति मिल जाएगी । अनैतिकता ही नागरिकता का आभूषण है । आप पाठक चाहें तो मेरे नाम से रेलवे स्टेशनों पर लिखवा दें । पर रेल मंत्री से पूछ लीजियेगा ! इस समाज में नैतिक होना और ईमानदार होना जोखिम का काम है । उसे ही सूली पर लटकाया जाता है और अनैतिक भी इन्हीं नैतिकों का सहारा लेकर खुद को ईमानदार बता कर बच जाते हैं ।

इसलिए मैं न तो नैतिक हूँ और न ईमानदार । मूर्खता के इस दौर में मेरी इस बात के लिए भी तारीफ हो सकती है कि कम से कम खुलकर बोलता तो है कि ईमानदार नहीं है ! बाकी आप तमाम दलों से मेरा बक़ाया पेमेंट दिलवाने में मदद कीजिये जिनकी दलाली करने के आरोप लगते रहे हैं । मैं ये उधार की दलाली से तंग आ गया हूँ ! भावी दलाल पहले पैसा ले लें फिर दलाली करें । 

धारणा और अवधारणा को मथते मथते किसी को बेईमान साबित करने का खेल ख़तरनाक है । इसके शिकार न तो जेटली हों और न जेटली को इसका लाभ मिले ! सोशल मीडिया पर रोज़ चलता है । रोज़ कोई न कोई बदनाम किया जाता है । आँखें फोड़कर देखिये । दुनिया में अगर कहीं ईमानदार राजनीति और नेता है तो वो भारत ही है । गुप्त रूप से जमा किये गए  वैध पैसे से भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए राजनीतिक दल चुनाव जीत जाते हैं ! बेईमानी अगर कही हैं तो इन ईमानदारों पर शक की जाँच करने वाले जाँच आयोगों में है । जाँच आयोगों को अवैध घोषित किया जाए । क्रिसमस की छुट्टी पर चला जाए !

(रवीश जी के ब्लॉग कस्बा से साभार)

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