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क्या सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के पत्रकार नारद को अपना पूर्वज मानते हैं?

May 24, 2016

नारद जयन्ती (23मई) पर एक लेखक का अपना विचार

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ मुझे पता ही नहीं था कि आज किसी ऐसे आदि पत्रकार की जयन्ती है जो ब्रम्हाण्ड का सर्वप्रथम पत्रकार कहलाता है। उसे लोग नारद कहते हैं। किसी पत्रकार से पता चला कि आज नारद जयन्ती है तो कुछ लिखने का मूड हो आया। होता भी क्यों न जब आदि पत्रकार देवर्षि नारद की जयन्ती का अवसर हो तो लगभग हर कलमकार के अन्दर छिपा हुआ पत्रकार अवश्य ही प्रकट होकर अपने व्यक्तित्व का बोध सर्वसामान्य को कराना चाहेगा कि वह भी पत्रकार है। 

मैंने कई धारावाहिकों में उसी नारद को सूचनाओं के समस्त उपकरणों से लैस तीनों लोकों में विचरता हुआ देखा है और उनके मुँह से निकलने वाला नारायण, नारायण शब्द के उद्घोष को भी सुना है। बहरहाल मैं नारद को देवर्षि कहकर हिन्दू समाज में अलगाववादी तत्व के रूप में अपनी पहचान नहीं बनाना चाहता और न ही अन्य धर्म-सम्प्रदाय के लोगों का अप्रिय बनना चाहता हूँ, क्योंकि नारद को हिन्दुओं के आदिदेव ब्रम्हा, विष्णु और महेश में से ब्रम्हा जी का मानस पुत्र कहा जाता है इसलिए वर्तमान के संदर्भ में नारद पर कुछ भी लिखना अपने को अधिसंख्य लोगों का विरोधी बनाने जैसा होगा। वैसे यदि नारद ही ब्रम्हाण्ड के आदि पत्रकार हैं तो जाहिर सी बात है कि हर जाति, धर्म के लोग जो भी पत्रकारिता में होंगे वे उन्हें अपना पूर्वज/आदर्श ही मानेंगे। 

बहरहाल! देश/समाज की वर्तमान स्थिति देखकर यह साहस ही नहीं होता कि कुछ ऐसा-वैसा लिखूँ जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों चौपट हो जाए। हाँ नारद की जयन्ती के अवसर पर जब नारद शब्द की चर्चा शुरू हो ही गई है तो आपसे अपने कुछ पुराने अनुभव साझा करूँ ऐसा मन में विचार हो आया। पाठक बोर न हों और मेरे द्वारा साझा किए जा रहे लेख से उनका मन खिन्न अथवा बोझिल न हो इसका ध्यान अवश्य ही रखूँगा। बचपन में अपने बुजुर्गों से नारद शब्द का इस्तेमाल किया जाना सुनता रहा हूँ। तब मुझे यह नहीं मालूम था कि नारद ब्रम्हाण्ड के आदि पत्रकार हैं। हमारे बुजुर्ग नारद उसे कहा करते थे जो इधर की बात उधर और उधर की इधर और अन्ततः यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रसारित किया करता था। चाहे वह स्त्री रहा हो अथवा पुरूष। 

नारद- हमने हमारे बचपन में बुजुर्ग पारिवारिक सदस्य से नारद के बारे में कुछ स्पष्ट करने को कहा था तो उन्होंने बताया था कि चुगलखोरी करने वाला व्यक्ति (पुरूष/स्त्री) ही नारद कहलाता है। मेरा बचपना था अपने बुजुर्ग की बात सुनकर खामोश हो गया था और जब एक लम्बे अन्तराल बाद मैं कलमघसीट (पत्रकार) बन गया तब नारद के महत्व को समझने लगा। हालाँकि मैं सब कुछ जानते हुए भी विशुद्ध कूटनीतिज्ञ की तरह व्यवहार करता हूँ। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे लेखन अथवा उद्बोधन या फिर अन्य क्रिया-कलाप से विभिन्न धर्मों / सम्प्रदायों / जातियों में बंटे समाज के लोग नाराज हों। मैं एक सफल राजनेता की तरह व्यवहार करता हूँ, जिसमें किसी भी जाति, धर्म का विरोध अथवा पक्ष न हो। ठीक उसी तरह जैसे समस्त राजनैतिक पार्टियाँ व इनके नेता करती हैं अपवाद के रूप में कट्टरवादी/ कट्टर पंथियों को छोड़कर। 

पाठकों! सम्भवतः विषयान्तर होने लगा था मैं पुनः नारद पर ही आता हूँ वह नारद जिनकी आज जयन्ती है। नारद- जब हमारे बुजुर्ग ने मुझे समझाया था जुगलखोर ही नारद कहलाता है तब मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई थी और उम्र बढ़ने के साथ-साथ मैं हर वरिष्ठ शिक्षित जानकार से चुगलखोर के बारे में जानने का प्रयास करता रहा। आज नारद के अर्थ को बेहतर समझने लगा हूँ। बुजुर्गो ने कत्तई गलत नहीं कहा था कि नारद जुगलखोर को कहते हैं। देख रहा हूँ कि ऐसे नारदों की बहुलता हो गई है, जो हर जाति/धर्म/सम्प्रदाय में हैं। आज का नारद बड़ा वैभवशाली, सुख-सुविधा सम्पन्न जीवन जी रहा है। 

मैंने तो उस चित्रपटीय नारद को देखा है जो प्रिण्ट, वेब और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समस्त उपकरण लिए हाथ में इकतारा और करताल तथा पाँव में खड़ाऊँ पहने तीनों लोकों में नारायण-नारायण करते हुए विचरण करता रहता है। हाँ यह भी देखा है कि वह नारद इधर की बात उधर और उधर की बात इधर तात्पर्य यह कि सर्वकल्याणार्थ सूचनाओं का आदान-प्रदान अपने अन्दाज में करता, बिना थके सतत सक्रिय रहकर निष्ठापूर्वक करता है। आज के नारद और चित्रपटीय नारद में जमीन/आसमान का अन्तर दिखता है। यदि एक कल्पना है तो दूसरी हकीकत। 

क्या मैं यह प्रश्न जो मेरी जेहन में उभर रहा है करने की धृष्टता कर सकता हूँ कि- जो लोग अपने को धर्म से हिन्दू कहते हैं और मनुवादी व्यवस्था के घोर विरोधी हैं क्या वे अपने को नारद वंशीय मानते हैं? मेरी समझ से शायद नहीं। क्योंकि बीते 3 दशक से देश की परिवर्तित सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में मैंने अनुभव किया कि मनुवादी व्यवस्था के विरोधी ऐसा नहीं कर रहे हैं। मुझे किसी के विचार और उसकी सोच व स्वतंत्रता पर कुछ भी नहीं कहना। मैं बौद्ध, सिख, इसाई और मुस्लिम धर्म मानने वाले पत्रकारों से यही प्रश्न करना चाहूँगा कि क्या वे भी कथित आदि पत्रकार नारद को अपना पूर्वज/आदर्श मानते हैं? कुछ भी हो मुझे किसी भी पचड़े में नहीं पड़ना है और न ही मैं ऐसी टिप्पणी करके कोई बहस छेड़ने की मंशा रखता हूँ जिससे मानव समाज में अशान्ति उत्पन्न हो।

मित्रों एक बात और- जैसा कि मुझे मालूम है कि नारद बाल ब्रम्हचारी थे, उनका विवाह नहीं हुआ था और उनकी उत्पत्ति हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में सृष्टि रचयिता ब्रम्हाजी के मानस पुत्र के रूप में हुआ था तब ऐसी स्थिति में उनके सन्तान कहाँ से पैदा होगी? क्या यह शोचनीय नहीं है? मैंने चित्रपट के नारद को देखा है, उनके बारे में जाना, समझा है उसके अनुसार नारद के मन में शादी रचाने का विचार आया था जिससे स्वर्ग में निवास कर रहे त्रिदेवों में खलबली मच गई थी और नारद का मोह जो विवाह के प्रति था समाप्त हो इसके लिए गहन विचार विमर्श कर वह स्थिति उत्पन्न कर दिया था कि नारद परिणय-सूत्र में बंध ही न सकें। यह कार्य भगवान श्री विष्णु ने नारद का मुँह बन्दर के रूप में करके किया था, जिससे नारद स्वयंवर में मात्र हंसी का पात्र बनकर रह गये थे और इस तरह उनका विवाह नहीं हो सका।

आज का दिन के बारे में अनेकानेक पत्रकारों द्वारा कहा जा रहा है कि आज उसी नारद की जयन्ती है जिसे सूचनाओं को आदान-प्रदान का आदिदेव, ब्रम्हाण्ड के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारद कहा जाता है। लोगों ने हमें बधाई दिया है हम भी मंगलकामनाओं के साथ उनको प्रत्युत्तर दे रहे हैं कि आप को भी कोटिशः बधाई।

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

मो.नं. 9454908400

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