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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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क्या आपका हिन्दी अख़बार या चैनल मामले की ख़ुद से पड़ताल कर रहा है?

आलोक वर्मा के घर किसी सिफ़ारिश करने गए थे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त चौधरी ?

रवीश कुमार/ हिन्दी अख़बारों के संपादकों ने अपने पाठकों की हत्या का प्लान बना लिया है। अख़बार कूड़े के ढेर में बदलते जा रहे हैं। अख़बार अब साल या महीने में दो चार अपवाद स्वरूप बेहतरीन ख़बरों से अपनी साख बनाए रखते हुए बाकी समय प्रोपेगैंडा का सामान ही ढोते नज़र आ रहे हैं। इसीलिए पिछले साढ़े चार साल में हिन्दी अख़बारों या चैनलों से कोई बड़ी ख़बर नहीं लिखी। साहित्य की किताबों से चुराई गई बिडंबनाओं की भाषा और रूपकों के सहारे हिन्दी के पत्रकार पाठकों की निगाह से बच कर निकल जाते हैं।

लेकिन जब बात ख़बरों को खोज निकालने और पहले पन्ने पर छापने के लिए लगातार पड़ताल की होगी तो हिन्दी का पत्रकार कहीं नज़र नहीं आता है। ऐसा नहीं है कि उसके पास ख़बर नहीं है, उसकी योग्यता किसी से कम है मगर अख़बारों के मालिक और ग़ुलाम संपादक उनकी धार कुंद कर देते हैं। इसीलिए चाहे जितना बखान कर ले, हिन्दी पत्रकारिता बुनियादी रूप से साधारण और दब्बू रही है। क्या आपका हिन्दी अख़बार या चैनल आलोक वर्मा के मामले की ख़ुद से पड़ताल कर रहा है?

आधी रात से पहले हाई पावर कमेटी बैठती है। आलोक वर्मा को हटा दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई उस कमेटी से अलग कर लेते हैं। इस आधार पर कि फैसला उन्होंने लिखा है। मगर उस कमेटी में प्रधानमंत्री बैठ जाते हैं। जबकि संदेह की सुई उन पर है कि वे अंबानी को बचाने के लिए रफाल मामले को दबा सकते हैं। प्रधानमंत्री ख़ुद को अलग नहीं करते हैं। कायदे से इस कमेटी को यही कहना चाहिए कि था कि फैसला सुप्रीम कोर्ट करे। जिस सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर फैसला हुआ, उस पर सुप्रीम कोर्ट भी फैसला ले सकती थी।

दि वायर में रोहिणी सिंह का खुलासा तो और भी गंभीर है। रोहिणी सिंह ने लिखा है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के वी चौधरी आलोक वर्मा के घर गए थे कि वे राकेश अस्थाना के खिलाफ अपनी शिकायत वापस ले लें। आलोक वर्मा ने यह बात जस्टिस पटनायक को लिख कर दिया था जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा पर लगे आरोपों की जांच के लिए कहा था। रोहिणी सिंह की खबर का अभी तक सीवीसी चौधरी ने खंडन तक नहीं किया है। सोचिए ये हालत हो गई है।

रोहिणी सिंह ने लिखा है कि आलोक वर्मा प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अफसर भास्कर कुल्बे पर मुकदमा दायर करने का फैसला लेने वाला थे। भास्कर कुल्बे पर कोयला घोटाले में आरोप है। राकेश अस्थाना इस बात का विरोध कर रहे थे। इसी को लेकर लड़ाई शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब 36 घंटे के लिए बहाली हुई तब आलोक वर्मा ने भास्कर कुल्बे के ख़िलाफ़ फैसला ले लिया मगर उनके हटने के बाद नए कार्यवाहक निदेशक ने वर्मा के सारे फैसले पलट दिए। इसी भास्कर कुल्बे को लेकर आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना आमने सामने हुए थे।

रोहिणी सिंह लिखती हैं कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के वी चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट से भी यह बात छिपाई कि वे आलोक वर्मा के घर गए थे और अस्थाना की तरफ से बात की थी। यह जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वर्मा के खिलाफ सीवीसी ने जो रिपोर्ट दी है वह पूरी तरह से अस्थाना की शिकायतों के आधार पर है। चौधरी चाहते थे कि अस्थाना के सालाना रिपोर्ट में जो प्रतिकूल टिप्पणी की है उसे बदल दें। प्रतिकूल टिप्पणी के कारण प्रमोशन वगैरह रूक जाता है। आलोक वर्मा के मना कर देने के बाद राकेश अस्थाना ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को वर्मा के खिलाफ शिकायतें भेजनी शुरू कर दी। उसी के आधार पर वर्मा को हटाया गया।

जस्टिस पटनायक ने भी इंडियन एक्सप्रेस की सीमा चिश्ती से कहा है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट में जो आरोप हैं वे सही नहीं हैं। निराधार हैं। जस्टिस पटनायक ने रोहिणी सिंह से भी कहा है कि उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से जो कहा है उस पर कायम हैं। अस्थाना के खिलाफ सीबीआई में जांच के छह-छह मामले लंबित हैं। अस्थाना दिल्ली हाईकोर्ट गए थे कि एफ आई आर ख़ारिज की जाए मगर हाईकोर्ट ने उल्टा सीबीआई को ही दस हफ्ते के भीतर जांच करने के आदेश दे दिए।

अब आप बताइये कि क्या आपको लगता है कि आलोक वर्मा को हटाने के फैसले में प्रधानमंत्री को पड़ना चाहिए था? नैतिकता का तकाज़ा क्या कहता है? क्या अंबानी के लिए हुकूमतें कुछ भी कर जाएंगी ? अब इसी ख़बर को आप अपने किसी भी हिन्दी अख़बार में खोजें। क्या कोई अख़बार इस ख़बर का फोलो अप कर रहा है? ऐसी नहीं है कि हिन्दी अख़बारों के पास मंझे हुए पत्रकार नहीं हैं, मगर ऐसी ख़बरें कहां हैं? सरकार और सीवीसी को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें पता है कि ऐसी खबरें हिन्दी अख़बारों और चैनलों के ज़रिए जनता तक पहुंचेंगी ही नहीं।

आज टेलिग्राफ अख़बार ने पूर्व चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर ने भी कहा कि आलोक वर्मा को अपनी बात रखने का मौका देना चाहिए। किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके दौर की मीडिया की हालत से शुरू होना चाहिए। अगर मीडिया ही आज़ाद नहीं है तो फिर आप किस सूचना के आधार पर उस सरकार का मूल्यांकन कर रहे हैं, यह सवाल ख़ुद से पूछें और अपने हिन्दी अख़बार और न्यूज़ चैनलों से पूछें। सबकुछ बर्बाद हो जाए, इससे पहले यह सवाल ज़रूर पूछें।

(रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा से साभार)

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