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खतरे सोशल मीडिया के

April 13, 2017

निर्मल रानी/ पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में भी कंप्यूटर-इंटरनेट क्रांति का युग चल रहा है। और इस युग में इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया आम लोगों की आवाज़ बुलंद करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि इसी सोशल मीडिया के माध्यम से ही पूरे विश्व में दशकों से बिछड़े करोड़ों लोग एक-दूसरे की सफलतापूर्वक तलाश कर उनसे संपर्क कर चुके हैं। दूरदराज़ के ऐसे समाचार जो जल्दी अपने जि़ला मु यालय तक पहुंच पाना संभव नहीं हो पाते थे वे अब आनन-फानन में पूरे विश्व में किसी भी कोने में पहुंचाए जा सकते हैं। निश्चित रूप से विज्ञान का अब तक का यह सबसे बड़ा करिश्मा अर्थात् कंप्यूटर, इंटरनेट व इसके माध्यम से चलने वाली सोशल नेटवर्किंग साईटस पूरी दुनिया के लिए ज्ञान एवं सुविधा का अब तक का सबसे बड़ा माध्यम साबित हो रही है। परंतु इसी तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया नेटवर्किंग साईटस को कुछ असामाजिक तत्वों व नकारात्मक सोच रखने वालों ने अफवाह, दहशत, ठगी, धोखा जैसे अपराध का माध्यम भी बना लिया है।

आज जहां गुग्गल, फेसबुक, व्हाट्सएप, टवीट, इंस्टाग्राम जैसे कई और नेटवर्क पूरी दुनिया को एक-दूसरे से पलक झपकते ही जोडऩे की क्षमता रखते हैं वहीं इन्हीं के माध्यम से असामाजिक तत्व फजऱ्ी आईडी बनाकर इस आभासी संसार में लोगों से अलग-अलग पहचान के साथ मित्रता गांठकर कभी उनके जीवन से खिलवाड़ करने की कोशिश करते हैं,कभी शादी-विवाह का झांसा देकर दुराचार करने की खबरें इसी माध्यम की बदौलत सुनाई देती हैं। कभी अपहरण की घटनाएं इन्हीं वेबसाईटस के द्वारा होती देखी जाती हैं। कभी किसी को लालच के जाल में फंसा कर उससे पैसे ऐंठ लिए जाते हैं तो कभी-कभी किसी का पूरा बैंक एकाऊंट ही खाली कर दिया जाता है। पिछले दिनों भारतवर्ष में एक नई कंपनी पेटीएम के नाम से बाज़ार में उतरी। इस कंपनी को शुरुआती दौर में ही कुछ शरारती तत्वों ने चूना लगा दिया। और पेटीएम के ही पैसे उड़ा ले गए। दूसरी ओर कुछ ठगों द्वारा भी पेटीएम का इस्तेमाल कर लोगों को अपने झांसे में लेकर उनसे इसी माध्यम से अपने पेटीएम एकाऊंट में पैसे डलवाए जाने की भी खबरें हैं। गोया जनता की सुविधा तथा कैश की लेन-देन से बचने के लिए बनाई गई इस एप्स को भी ठगों ने अपनी मर्जी के अनुसार अपने फायदे का माध्यम बना डाला।

परंतु सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट की दूसरी कई सामाजिक वेबसाईटस के माध्यम से होने वाली किसी भी प्रकार की ठगी, धोखा या अपहरण, फिरौती या जालसाज़ी जैसी घटनाएं तो फिर भी किसी हद तक कोई एक व्यक्ति या परिवार सहन कर सकता है। परंतु बड़े अफसोस की बात है कि यह माध्यम अब हमारे देश में सांप्रदायिकता फैलाने, दंगे-फसाद करवाने, जातिवाद को हवा देने तथा समाज के अनेकता में एकता रखने वाले उस ताने-बाने को तोडऩे लगा है जो हमारे देश की सदियों पुरानी पहचान रहा है। देश में कई राज्यों में ऐसे दंगे-फ़साद हो चुके हैं जिसमें इसी सोशल मीडिया की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कभी मुसलमानों पर देश के किसी भाग में होने वाले अत्याचारों को कश्मीर में सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित कर वहां के लोगों में उत्तेजना पैदा करने की कोशिश की जाती है। बाबरी मस्जिद विध्वंस की वीडियो कश्मीर में खूब चलाई व दिखाई जाती है। इसी प्रकार पाकिस्तान व बंगला देश में अल्पसं यक हिंदुओं पर होने वाले ज़ुल्म की वीडियो भारत में प्रसारित कर यहां सांप्रदायिक सद्भाव बिगाडऩे की कोशिश की जाती है। कभी गौकशी की किसी दूसरे देश की वीडियो या चित्र भारत में प्रसारित कर गौभक्तों में गुस्सा पैदा करने की कोशिश की जाती है तो कभी मस्जिदों, दरगाहों या सिख समुदाय से जुड़ी कोई उत्तेजना पैदा करने वाली फोटो शेयर कर आम जनता को वरगलाने का प्रयास किया जाता है।

हमारे देश की जनता कितनी सीधी व भोली-भाली है यह बताने या समझाने की ज़रूरत नहीं है। हमारे देश की एक-दूसरे पर भरोसा करने वाली जनता को आज से नहीं सदियों से लूटने वाले लोग सांप-नेवले की लड़ाई दिखाकर भीड़ इकठ्ठा कर उनके हाथों कभी कोई तेल बेच जाते हैं तो कभी जादू-टोना, सांडे के तेल बेचने के नाम पर लोगों का झुंड लगा दिखाई देता है। बंदर-भालू, सांप,आदि के नाम पर भीड़ इकट्ठी कर मदारी द्वारा लोगों को सामान बेचना यहां के चतुर लोगों की पुरानी कला है। ऐसे में यदि राजनीतिज्ञ लोग जनता को वरगला कर या कोई सब्ज़ बाग दिखाकर सत्ता में आ जाएं तो अधिक आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। यह बातें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए काफी हैं कि हमारे देश की अधिकांश जनता आमतौर पर बिना किसी सत्यापन के अथवा बिना किसी प्रमाण के लोगों की बातों पर विश्वास कर लेती है।। और उस कहावत को चरितार्थ करती दिखाई देती है कि ‘कौवा कान ले गया तो अपना कान देखने के बजाए कौवे के पीछे भाग जाती है’। ज़ाहिर है हमारे देश की जनता के इसी साधारण एवं सरल स्वभाव का लाभ वह शरारती व असामाजिक तत्व उठाते हैं जिन्हें दंगे-फसाद,खूनरेज़ी,सांप्रदायिकता तथा जातिवाद की दुर्भावना फैलने से लाभ हासिल होता है। या वे किसी के मोहरे बनकर ऐसा गंदा खेल खेलते हैं।

आजकल हमारे देश में इसी सोशल मीडिया का प्रयोग राजनैतिक विचारधारा में मतभेद रखने वाले लोगों के विरुद्ध ज़बरदस्त तरीके से किया जा रहा है। एक पक्ष के पैरोकार अपने पक्ष की आलोचना या उसके विरुद्ध किसी प्रकार का कोई तर्क-वितर्क सुनने को तैयार नहीं है। परिणामस्वरूप कोई भी व्यक्ति यदि अपनी विचारधारा या अपने पक्ष की कोई बात रखता है या दूसरे की आलोचना करता है तो उसे इसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स के माध्यम से ही भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती हैं तथा डराने-धमकाने व अपमानित करने की कोशिश की जाती है। सोशल मीडिया के इसी हमले का शिकार भारत के शहीद कैप्टन मंदीप सिंह की बेटी गुरमेहर कौर से लेकर पत्रकार साक्षी जोशी तक हो चुकी हैं। साक्षी जोशी ने तो अपने विरुद्ध की गई एक अभद्र व अश्लील टिप्पणी के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की तथा नोएडा पुलिस ने गुजरात के नवसारी से उस शोहदे को गिर तार भी कर लिया जिसने साक्षी जोशी को गंदी गालियां दी थीं। परंतु यह भी हकीकत है कि प्रत्येक लडक़ी साक्षी जोशी जैसा साहस दिखाते हुए पुलिस में एफआईआर नहीं दर्ज करा पाती और न ही ऐसी प्रत्येक एफआईआर पर पुलिस इस प्रकार का तत्काल एक्शन ले पाती है जैसाकि साक्षी के मामले में लिया गया था।

ऐसे में हम भारतवासियों को खासतौर पर बड़ी गंभीरता से सोशल मीडिया के विषय पर यह चिंतन करने की ज़रूरत है कि हम इस माध्यम पर कितना विश्वास करें और कितना न करें? अभी  पिछले ही दिनों इसी माध्यम से दो खबरें ज़बरदस्त तरीके से वायरल हुर्इं। एक िफल्म अभिनेता विनोद खन्ना की मृत्यु का समाचार तो दूसरा राजधानी ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने का समाचार सचित्र प्रसारित किया गया। परंतु दोनों ही समाचार झूठे थे। कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक मानते हैं कि झूठ तथा अफवाह के पीछे बिना किसी तसदीक़ व सत्यापन के विश्वास कर लेने वाले लोगों के लिए यह माध्यम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इस माध्यम में केवल दंगा-फ़साद व अराजकता फैलाने की ही नहीं बल्कि इसमें गृहयुद्ध छेड़ देने तक की क्षमता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पश्चिमी देशों ने इस माध्यम को ऐसे ही अवसरों के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है ताकि दुनिया आपस में लड़ती रहे और उनके अस्त्र-शस्त्र बिकते रहें। ज़ाहिर है हमें सोशल मीडिया के ऐसे खतरों से सावधान रहना पड़ेगा। 

निर्मल रानी                                                                           

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