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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ठिठुरती हुई पत्रकारिता

अविनाश कुमार/ राष्ट्र के कोने-कोने में जागरण, नवस्फूर्ति और नवनिर्माण के मंत्र को फूंकना ही पत्रकारिता का पावन लक्ष्य है। यह वह रचनाशील विद्या है जिससे समाज का आमूल-चूल परिवर्तन संभव है। पत्रकारिता जो व्याकुल विचार-दृष्टि, मर कर जीने की कला, वैचारिक चेतना तथा काल-धर्म की तीसरी आंख है और जिसे लोकतंत्र का चौथा पाया की संज्ञा प्राप्त है, आज वह मिथ्या आवरण ओढ़े एवं दिग्दर्शन की बजाय दिगभ्रांति का शिकार हो गया है। इससे पत्रकारिता ठिठुरती हुई नजर आती है। कुछ पत्रकारों के अवसरवादिता के शिकार होने से इसकी गरिमा समाप्त होती जा रही है। इसे समाज में एक अलग स्थान प्राप्त था, जिसे हर वर्ग के लोग धर्म का प्रतीक मानते थे, कहीं न कहीं आज इसकी छवि धूमिल होती जा रही है।                            

पत्रकारिता का ठिठुरने से संबंध इस प्रकार है कि भारतीय पत्रों में कुछ पत्र ऐसे हैं, जिन्होने कभी इंदिरा गांधी को माँ दुर्गा, संजय गांधी को विश्व का उज्ज्वल नक्षत्र तथा जय प्रकाश नारायण को अंधकार में एक प्रकाश लिखा तो कभी उन्हीं पत्रों ने क्रमशः लोकतंत्र संहारिणी, आपातकाल की नाजायज औलाद तथा सिरफिरा जयप्रकाश लिखा। गुण दोष की आलोचना संबंधी ऐसी प्रवृति पत्रकारिता में पहले थी। लेकिन आज पत्रकारिता सुविधा की राजनीति में प्रवेश कर गया है। इनमें कुछ खास का झुकाव उद्योगपतियों की ओर है तो कुछ का सतारूढ पार्टियों की ओर।

आजकल के कई पत्र- पत्रिकायें समय काटने और मनोरंजन के साधन स्वरूप बन गए हैं। ऐसी पत्रिकाएं विभिन्न समाजिक मुद्दों जैसे गरीबी उन्मूलन के उपाय, स्वच्छता, स्वास्थ्य, विज्ञान तथा शिक्षा के प्रति जागस्कता के प्रकाशन के बजाय साज, श्रृंगार, फैशन, रूप रंग को कैसे निखारें और स्मार्ट कैसे दिखें, पर ही जोर देती है। क्या ये बातें काफी नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि पत्रकारिता ठिठुरती जा रही है ? यदि नहीं तो और भी कई उदाहरण ऐसे है जिससे यह सिद्ध हो जाएगा कि अब यह सिकुड़ती एवं ठिठुरती जा रही है। पत्रकारों को यह बात सोच में डालनी होगी कि पत्रकारिता का पक्षपाती होना एवं स्वयं का न्यायपालिका बनना, बिना बांध वाली वह बरसाती नदी है, जो चंद घंटों की रिमझिम में सबकुछ बहा ले जाती है।

जिस प्रकार अभिव्यक्ति की आजादी का धड़ल्ले से दुरूपयोग हो रहा है, उसी प्रकार सूचना के क्षेत्र में दायित्वहीनता देश के लिए अनर्थकारी सिद्ध हो रहा है। पत्रकारिता का लगभग हर माध्यम चोरी, डकैती, दंगे, फसाद, दुर्घटनाएं, चरित्रहनन और मन को छिन्न कर देने वाली तस्वीरों से भरे होते हैं। जबकि इसके अलावा भी समाज में सकारात्मक घटनाएं होती है जिसमें पाठकों एवं दर्शकों की रूचि होती है, किन्तु इसे मीडिया में जगह नहीं मिलती है। खबरों पर हावी राजनीति लगता है अपराधियों की बनकर रह गई है। जिसे जेल में होना चाहिए वे विधानसभा एवं लोकसभा में बैठे हैं और मीडिया उन्हें हीरो बना रही है।

इस पर पं माखनलाल चतुर्वेदी ने भी कहा है- पत्रकारिता (समाचार पत्र) अपनी गैर-जिम्मेदारी से स्वयं ही मिट्टी तेल के मोल का नहीं हो जाता बल्कि अनेक महान अनर्थों का उत्पादक और पोषक भी होजाता है।

पत्रकारिता, जिस पर लोगों का एक विश्वास था आखिर क्यों कम हो गया? क्यों लोग इसे समाजिक गुंडा कहते हैं ? क्यों ये कर्तव्यविमूढ़ हो गया? इन सवालों के जबाब शायद महान साहित्यकार हरिशंकर परसाई जी के इस महत्वपूर्ण वाक्यांश से मिल सकता है- इस देश में जो जिसके लिये प्रतिबद्ध है वही इसे नष्ट कर रहा है।

अविनाश कुमार  कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस, पटना में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के छात्र हैं।  

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