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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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तो क्यों न मैन पावर ही घटा लें?

अखबारों में छंटनी क्या कम कमाई के कारण है? 

पुष्य मित्र। अखबारों में कर्मियों की छटनी जरूर हो रही है, मगर यह कहना गलत है कि कोरोना काल में अखबारों की आय घटी है। अखबारों की प्रसार संख्या जरूर घटी है, मगर अखबारों का एकनॉमिक्स समझने वाले जानते हैं कि प्रसार बढ़ने का अखबारों की आय बढ़ने से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। बल्कि कई दफा प्रसार घटने से अखबारों की लागत घट जाती है और बचत ही हो जाती है।

बिहार में अखबारों को अपने कुल रेवेन्यू का आधा से अधिक हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से मिलता है, इसमें कोई कमी नहीं आई। बढ़ोतरी ही दर्ज की गयी। लॉक डाउन में भी। 

अभी चुनाव की वजह से पोलिटिकल विज्ञापन भी बढ़ेंगे। चुनाव में अखबार वालों की उल्टी सीधी कमाई भी होती है। इसलिये यह मामला मंदी या नुकसान का नहीं है। मामला सिर्फ इतना है कि कोरोना और लॉक डाउन में अखबार वालों ने कम मैन पॉवर में काम करना सीख लिया है। जब कम मैन पॉवर में कम पन्ने छाप कर, कम एडिशन निकाल कर भी उतनी ही कमाई हो रही है तो मैन पॉवर क्यों न घटा लिया जाये। मामला दरअसल यही है।

Pushya Mitra के फेसबुक वाल से साभार

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना