मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

धाराशायी हो रहे मीडियाई सैनिक

पत्रकारों का फेसबुक वाला अंदाज उनके माध्यम में नहीं

विकास कुमार गुप्ता/भारतीय मीडिया का समग्र ढांचा कहीं न कहीं पाश्चात्य मीडिया के अनुसरण पर आधारित है। इतिहास गवाह है, मीडिया शब्द को वैश्विक स्तर के अनेक पत्रकारों ने खून-पसीने से सींचा है। प्रख्यात द टाईम्स ने एक सिद्धान्त बनाया था कि समाचार पत्र भण्डाफोड़ से जीवित रहते हैं। द टाईम्स को सरकार की आवाज कहा जाता था। सरकारों द्वारा जब द टाइम्स को अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई थी तब इसने इस सिद्धान्त को बनाया था। अमेरिका के निक्सन जैसे राष्ट्रपति को वाशिंगटन पोस्ट ने इस्तीफा देने पर विवश कर दिया था।

साहस, दिलेरी, हौसला, हिम्मत, निडर, अटल आदि शब्द पहले पत्रकारों और मीडिया के लिए इस्तेमाल किये जाते थे। अब ये कुछ के लिए विलोमार्थी बनकर रहे गये है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली एवं भारत सरीखे देशों में मीडिया का निडर इतिहास स्पर्णाक्षरों में अंकित है। हमारे देश के पत्रकार अपने फेसबुक वाल पर जिस अंदाज में लिख रहे है क्या उनका वहीं अंदाज उनके माध्यम में है, कतई नहीं? इससे तो यही अनुभूति हो रही हैं न कि इन तथाकथित मीडियाई सैनिकों को जिस मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिये उसी मजबूती से ये अपने माध्यमों में खड़े नहीं हो पा रहें। बहुधा ऐसा सिर्फ इसीलिए है क्योंकि सरकारी कानून इनके आगे रोड़ा बन रहा है और फेसबुक अथवा सोशल मीडिया पर यह कानून मायने नहीं रखता। कुछ पत्रकार तो कानून के आगे मजबूर है तो तो कुछ ने तो अपना ईमान बेच रखा है। पत्रकारों को जनहित की जगह ग्लैमर और धनपशुओं के धन और सरकारी फायदे से कुछ ज्यादा ही सरोकार हो चुका है। अभी दिव्य संदेश ने यूपी के पत्रकारों के कारनामें खोले थे तो बिहार का हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला सबके सामने है। नीरा राडिया और जी-न्यूज के सम्पादकों के कारनामे अभी पुराने भी नहीं हुये। और सैकड़ों मामले मधुमक्खियों के छाते पर अभी भी भीनभीना रहे हैं? क्या मीडिया व्यापार बन चुका है? क्या देशहित से ज्यादा पैसा और विज्ञापनहित मायने रखने लगा है? आजादी की लड़ाई के समय जिस मीडिया ने घुटने नहीं टेके वह आपातकाल के समय से टेकने लगी है। देश में अपराधी हत्या का करोबार त्याग, शैक्षिक संस्थाओं और एनजीओ आदि को अपने कमाई का जरिया बनाने लगे है। मंहगाई की मार ने गरीब के जबान पर ताला लगा दिया है। भारतीय बुद्धिजीवी चिन्तामग्न है कि कोई भ्रष्टाचार नापने का यंत्र बने। ताकि भ्रष्टाचारियों का विनाश हो सके। अथवा कोई अवतार हो वो चाहे किसी धर्म से हो और भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद आदि खत्म हो। लेकिन बीच-बीच में बम ब्लास्ट और घोटालों के पिटारें सामने आते ही जा रहे हैं। समानता का गला कबका घोंटा जा चुका है और लाइसेंसी राज मजबूती से चल ही रहा है। एक ही कोर्स के अनेकों फीस है। एक ही पद के अनेकों भर्ती नियम है। जनता के टैक्स पर सरकार और सरकारी लोग ऐश फरमा रहे है। अफसरशाही, चमचागरीरी, हरामखोरी अपने सबाब पर है। ज्यादातर सरकारी कर्मचारी एचआरए भी ले रहे है और सरकारी आवास में डेरा भी डाले हुये है। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन और प्राइवेट कालेज एवं संस्थाओं के वेतन के अनुपात में जमीन आसमान का अन्तर आ गया हैं। मनरेगा, एनआरएचएम और अनेकों योजनाओं में आ रहा भ्रष्टाचार सबके सामने है और इसमें एन0जी0ओ0 और अधिकारियों की बंदरबांट में निरंतर वृद्धि भी जारी है। वोटबैंक का जीन राजनीति का खंभा बन गया है। कौआ मोती चुन रहा है और हंस दाने-दाने को मोहताज है। पहले चमचागीरी, घूसखोरी जैसे शब्द जबान लड़खड़ा देते थे। लेकिन आज के परिवेश में सच्चाई बोलने में मीडिया सहित सबकी जबाने लड़खड़ाने लगी है। मीडिया तबका पुंजिपतियों के विज्ञापन के अंधकार तले शान्त है।
अकबर इलाहाबादी के दो शेर मीडिया में खासे चर्चित है एक है "खीचों न कमानों को न निकालों तलवार, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालों" और दूसरा "जिन्दगी देखी कामील यकीं आया, उसे जीना नहीं आया जिसे मरना नहीं आया"।

लेखक विकास कुमार गुप्ता www.pnews.in के सम्पादक हैं ।
9451135000
9451135555

 

Go Back

Comment