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बिहार की मीडिया :खबरों को लेकर कितना संवेदनशील ?

आदर्श तिवारी / बिहार की मीडिया जिस बदसूरत ढंग बिहार की सूरत दुनिया के सामने पेश करती है,उससे बिहार के बाहर बिहारियों को ऐसे देखा जाता है जैसे वो किसी दूसरे लोक के प्राणी है। आज भी अगर बिहारियों को कमतर आंका जाता है तो इसके पीछे यहाँ कि मीडिया सबसे ज्यादा कसूरवार है। इसका दर्द सामान्य बिहारियों के चेहरे पे सहज ही पढ़ा जा सकता है।बिहार के अख़बार विकास जैसे कृषि ,कुटीर उद्योग और अन्य विकासात्मक कार्य को प्रकाशित करने के बजाय प्रदेश में लूट ,हत्या ,बलात्कार जैसी घटनाओं को सनसनीखेज बना प्रकाशित करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

ग्रामीण समस्या और ग्रामीण विकास कि खबरें अगर प्रकाशित हो भी जाती हैं तो वो भी अख़बार के अंदर के पन्नों में किसी कोने में संछिप्त रूप से। जैसे कि खबर छपकर प्रबंधन ने पाठकों/जनता पे कोई एहसान कर दिया हो।

आज अख़बार को बाजार में साबुन कि तरह बेचने होड़ सी मची हुई है।पाठकों को तरह-तरह के गिफ्ट दे ,सबसे कम कीमत में अख़बार उपलब्ध करने के तमाम हथकंडे अपना अपने -अपने खेमे में करने का प्रयास चरम पर है।पाठकों के लिये सबसे बड़े दुर्भाग्य कि बात तो ये है की इन सब के बीच विकासमूलक खबरें और जनहित के प्रायोजन दूर-दूर तक नजर नहीं आते।कभी भी अख़बारों में जनसमस्याओं से जुडी खबरों को प्रमुखता नहीं दी जाती।

राज्य से सबसे ज्यादा पलायन उसी जगह से होता है जहा के लोग आज भी मूलभत सुविधाओं से वंचित हैं।लेकिन ये समस्या अख़बार में शायद ही खबर बन पाती है,अगर अख़बार खबरों को प्रमुखता देता है तो मुन्नाभाई जैसे सरीखों को।कोई अपराधी राजनेता के साथ कोई घटना होती है तो वास्तविक तस्वीर जनता के सामने पेश करने के बजाय उसका जमकर गुणगान होता है।अपराधी छविधारी नेता अखबार के पहले पन्ने पे स्थान पाते हां अगर कोई इनकी कुंडली उजागर करता है तो वो है अंग्रेजी अख़बार।

ग्रामीण विकास ,शिक्षा ,स्वास्थ्य और केंद्र प्रायोजित योजनाओं का जमकर गोलमाल होता है पर ये अख़बार के लिए मुद्दा नही बन पाते।ऐसा नहीं है कि इन समस्याओं कि जानकारी संवाददाताओं को नहीं होती पर संपादक के मुताबिक ये खबरें सनसनीखेज और मसालेदार नहीं है।

एक पुराने आंकड़े के मुताबिक बिहार में लगभग 1538समाचारपत्रों का प्रकाशन होता है जिनमें 373दैनिक ,33.त्रि या द्वि साप्ताहिक ,653साप्ताहिक ,156पाक्षिक,232मासिक,62त्रैमासिक ,1वार्षिक और अन्य 28 पत्रों का प्रकाशन होता है। इस आकङे से सहज ही अंदाजा लगाया की आज अख़बार खबरों को लेकर कितनी संवेदनशील है।

 

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बिलकुल सही कहा आपने।

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nyalay dwara dendatmek karywahi petrkar ho ya koi bhi sb per saman hona chahiye

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