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बिहार में सोशल मीडिया: स्वरूप, संभावना और चुनौती

March 29, 2014

फेसबुक ने पत्रकारिता को नया मंच दिया

बीरेन्द्र कुमार यादव/ बिहार में सूचना तकनीकी के दौर में सोशल मीडिया एक नयी ताकत के रूप में उभरी है। पांच साल पहले हमने आह्वान की शुरुआत की थी। हमारे लिए नया अनुभव था। तकनीक की भी जानकारी नहीं थी। लेकिन हिन्दुस्तान के कार्यालय में सुविधाएं उपलब्ध थीं। इसका मैंने पूरा उपयोग किया। इसके बाद पत्रिका को नियमित बनाए रखने की लगातार कोशिश करता रहा। कभी नियमित तो कभी अनियमित आह्वान, का प्रकाशन व प्रसारण होता रहा। प्रारंभिक दौर से ही हम इसे ईमेल के जरिए लोगों तक भेजते थे।

इस बीच पटना में हमारे ही सर्किल के कई लोगों ने सोशल मीडिया में अपनी सक्रियता बढ़ायी। इसमें लीना, इर्शादुल हक, नवल किशोर कुमार,  अनिता गौतम, अरुण कुमार सिंह जैसे लोगों ने अपने बेव साइट के साथ सोशल मीडिया में हस्तक्षेप शुरू किया। इसमें एक विशेषता रही कि सभी लोग विषय विशेष को लेकर अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगे रहे। ये लोग हिन्दी साइटों को लेकर सोशल वर्ल्ड में सक्रिय हुए। इससे पहले बिहार टाइम्स के अजय कुमार अंग्रेजी में अपनी पहचान बना चुके थे।

इस दौरान फेसबुक ने पत्रकारिता को नया मंच दिया। पत्रकारों का नयी पहचान भी दी। आज अधिकांश मीडिया से जुड़े लोग फेसबुक पर मौजूद हैं। कुछ सक्रिय हैं तो कुछ काफी सक्रिय हैं। कई नयी और हंगामेदार खबरें भी फेसबुक पर छा रही हैं। 

स्वरूप: पत्रकारिता में एक नयी अवधारणा जन पत्रकारिता की आयी है। इसे सभी बड़े अखबारों ने बढ़ावा दिया। जनसमस्याओं से जुड़ी सूचनाओं की मांग पाठकों से की जाने लगी। इससे संबंधित अखबारों में नियमित विज्ञापन भी प्रकाशित किये जा रहे हैं। विषय विशेष से लेकर पाठकों से संवाद की व्यापक कोशिश की गयी। एक मायने में तो अखबारों में होड़ लग गयी है। इस कोशिश को सोशल मीडिया ने व्यापक ऊंचाई दी। इस पर हर कोई बिना किसी आमंत्रण के अपनी बात रख रहा है। स्थानीय जनसमस्याओं से लेकर बड़े-बड़े मुद्दों पर बहस हो रही है। सबसे बड़ी बात है कि यह बहुपक्षीय मंच है। आप एक साथ कई लोगों के साथ संवाद स्थापित कर सकते हैं। अपनी बातों से उन्हें अवगत करा सकते हैं और आप उनकी बातों से समर्थन या विरोध जता सकते हैं। 

अब तक अखबार, रेडियो और टीवी एक पक्षीय संवाद के माध्यम रहे थे। इसमें आप किसी खबर या विचार पर अपनी बात बाद में रख सकते हैं। तत्काल अपनी बात रखने का विकल्प सीमित ही है। टीवी की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण तत्काल अपनी बात रखने का मौका मिलता है, लेकिन यह सुविधा सीमित व्यक्तियों के लिए है। इससे हटकर सोशल मीडिया बहुपक्षीय संवाद स्थापित करने का मौका उपलब्ध कराता है। आप अपनी बात तत्काल सामने वाले से शेयर कर सकते हैं। कमेंट कर सकते हैं। यानी सोशल मीडिया ने संवाद व विमर्श को गतिशील, ऊर्जावान और प्रभावी बना दिया है। इसी का असर है कि फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। 

वजह है कि हर कोई चाहता है कि अपनी बात पर तत्काल सामने वाले की प्रतिक्रिया मिले और यह काम सोशल मीडिया की कर सकता है। यही वजह है कि बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, आरसीपी सिंह, पप्पू यादव, जर्नादन सिंह सिग्रीवाल, अश्विनी चौबे समेत बड़ी संख्या में सांसद और विधायक भी फेसबुक पर अपनी बात पोस्ट करते नजर आ रहे हैं। यह एक सकारात्मक पक्ष है कि उनके पोस्ट पर कमेंट, शेयर और लाइक जैसे आप्शन का भी काफी इस्तेमाल हो रहा है। 

संभावना: अब बिहार सोशल मीडिया का बड़ा बाजार बनने  लग है। इसके के लिए कई प्रोफेशनल कंपनियां अपनी सेवा प्रारंभ कर रही हैं। कई व्यापारिक, व्यावसायिक और राजनीतिक कर्मी इन कंपनियों की सेवाएं ले रहे हैं। जहां तक सोशल मीडिया की संभावनाओं का सवाल है, इसमें हर दिन नयी संभावना पैदा हो रही है, हर दिन नये लोग जुड़ रहे हैं। यानी इसका बाजार निरंतर व्यापक हो रहा है।

अभिव्यक्ति की आजादी हर समाज के लिए बड़ा सवाल रहा है। सोशल मीडिया ने इस आजादी को हमारे कमरे तक पहुंचा दिया है। नेट कनेक्शन के साथ आप वैश्विक हो जाते हैं। देश और भूगोल की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। आप एक बड़े समूह के बीच खड़े जा जाते हैं, जहां आपको हजारों लोग देख रहे होते हैं और आप हजारों लोगों को देख रहे होते हैं। 

चुनौती: इस नयी मीडिया के समक्ष कई तरह की चुनौतियां हैं। फेसबुक जैसी सोशल साइट युवाओं की सर्वाधिक पसंद है। वह इसे मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि अभी सोशल मीडिया का पूर्णतया व्यावसायिकरण नहीं हुआ है। प्रोफेशनल लोग भी जुड़ रहे हैं। अब लाभ की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। अभी यह प्रचार की भूख को ही तृप्त कर रहा है। लेकिन इसका व्यावसायिकरण भी तेजी से रहा है।

 

 

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