मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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रिलायंस देश में मीडिया भी रिलायंस हवाले!

February 14, 2017

अगर यह खबर सच होती है तो, अब पत्रकारिता भी तेल, गैस, संचार, निर्माण विनिर्माण कारोबार की तर्ज पर!

पलाश विश्वास/ ऐम्बेसैडर ब्रांड के अस्सी हजार में बिक जाने पर लिखते हुए हमने डिजिटल कैशलैस इंडिया में  कारपोरेट एकाधिकार की वजह से देशी कंपनियों के खत्म होने का अंदेशा जताया था।सत्ता संरक्षण और कारपोरेट लाबिइंग से छोटी बड़ी कंपनियों का क्या होना है,बिड़ला समूह के हालात उसका किस्सा बयान कर रहे हैं।टाटा समूह दुनिया पर राज करने चला था और साइरस मिस्त्री के फसाने से साफ हो गया कि उसके वहां भी सबकुछ ठीकठाक नहीं है। नैनो का अंजाम पहले ही देख लिया है।यह बहुत बड़े संकट के गगनघटा गहरानी परिदृश्य है। फासिज्म के राजकाज में आम जनता ,खेती बाड़ी, काम धंधे और खुदरा कारोबार में जो दस दिगंत सर्वनाश है, जो भुखमरी, मंदी और बेरोजगारी की कयामतें मुंह बाएं खड़ी है,इनकी तबाही से देशी पूंजी के लिए भी भारी खतरा पैदा हो गया है।बिड़ला और टाटा समूह का भारतीय उद्योग कारोबार में बहुत खास भूमिका रही है।बिड़ला समूह से किन्हीं मोहनदास करमचंद गांधी का भी घना रिश्ता रहा है। इस हकीकत का सामना करें तो हालात देशी तमाम औद्योगिर घरानों और दूसरी छोटी बड़ी कंपनियों के लिए बहुत खराब है।

निजी तौर पर हम जैसे पत्रकारों के लिए हिंदुस्तान का रिलायंस में विलय भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता का अवसान है। वैसे भी मीडिया पर रिलायंस का वर्चस्व स्थापित है। यह वर्चस्व तेल,गैस,संचार,पेट्रोलियम,ऊर्जा से लेकर मीडिया तक अंक गणित के नियमों से विस्तृत हुआ है तो इसमें सत्ता समीकरण का हाथ भी बहुत बड़ा है।आजाद मीडिया अब भारत में नहीं है,यह अहसास हम जैसे सत्तर के दशक से पत्रकारिता में जुड़े लोगों के लिए सीधे तौर मौत की घंटी है। खबर है कि बिड़ला घराने की ऐम्बसैडर कार के बाद उसका अखबार हिंदुस्तान टाइम्स भी बिक गया है।खबरों के मुताबिक शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिंदुस्तान टाइम्स के बारे में चर्चा है कि हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया ने इस अखबार को पांच हजार करोड़ रुपये में देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस के मुकेश अंबानी को बेच दिया है। यही नहीं चर्चा तो यहाँ तक  है कि प्रिंट मीडिया के इस सबसे बड़े डील के बाद शोभना भरतिया 31 मार्च को अपना मालिकाना हक रिलायंस को सौंप देंगी और एक अप्रैल 2017 से हिंदुस्तान टाइम्स रिलायंस का अखबार हो जाएगा।

गौरतलब है कि 2014 में फासिज्म के राजकाज के बिजनेस फ्रेंडली माहोल में रिलायंस ने नेटवर्क 18 खरीदकर मीडिया में अपना दखल बढ़ाया है।नेटवर्क.18 कई प्रमुख डिजिटल इंटरनेट संपत्तियों की मालिक हैं, जिसमें इन डॉट कॉम, आईबीएनलाइव डॉट कॉम, मनीकंट्रोल डॉट कॉम, फर्स्टपोस्ट डॉट कॉम, क्रिकेटनेक्स्ट डॉट इन, होमशाप18 डाट काम, बुकमाईशो डॉट कॉम,बुकमाईशो डॉट कॉम, शामिल हैं। इनके अलावा यह कलर्स, सीएनएनआईबीएन, सीएनबीसी टीवी18, आईबीएन7, सीएनबीसी आवाज चैनल चलाती है।

जाहिर है कि हिंदुस्तान समूह के सौदे से एकाधिकार  कारपोरेट वरचस्व का यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्क्ति की आजादी का क्या होना है,इसकी कोई दिशा हमें नहीं दिख रही है। खबर तो यह भी है कि रिलायंस डीफेंस अब अमेरिका नौसेना के सतवें बेड़े की भी देखरेख करेगा। वहीं सातवा नौसैनिक बेड़ा जो हिंद महासागर में भारत पर हमले के लिए 1971 की बांग्लादेश लड़ाई के दौरान घुसा था। अब यह भी खबर है कि मुप्त में इंचरनेट की तर्ज पर मुफ्त में अखबार भी बांटेगा रिलायंस। जाहिर है कि भारतीय जनता को भी मुफ्तखोरी का चस्का लग चुका है। इसी बीच रिलायंस जियो की वीडियो ऑन डिमांड सेवा जियोसिनेमा, जिसे पहले जियोऑन डिमांड के नाम से जाना जाता था, में देखने लायक कई सिनेमा उपलब्ध हैं। अब इस ऐप में नया फ़ीचर जोड़ा गया है।

इस भयावह जीजीजीजीजी संचार क्रांति से भारतीय मीडिया अब समाज के दर्पण, जनमत, जनसुनवाई, मिशन वगैरह से हटकर विशुद्ध कारोबार है सत्ता और फासिज्म के राजकाज के पक्ष में,जिसे देश के रहे सहे ससंधन भी तेल और गैस की तरह रिलायंस के हो जायें।यह जहरीला रसायन आम जनता के हित में कितना है, पत्रकारिता के संकट के मुकबाले हमारे लिए फिक्र का मुद्दा यही है।

हिंदुस्तान समूह से मेरा कुछ भी लेना देना नहीं होने या टाटा बिड़ला से खास प्रेम मुहब्बत न होने की बावजूद देश के रिलायंस समूह में समाहित होने की यह प्रक्रिया हमें बेहद खतरनाक लग रही है। तेल गैस और पेट्रोलियम की तरह मीडिया का कारोबार होगा,एक्सप्रेस समूह में पच्चीस साल तक आजाद पत्रकारिता करने के बाद यह भयंकर सच हम हजम नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हम पत्रकारिता के सिपाहसालार, मसीहा, संपादक ,आइकन, साहिबे किताब,प्रोपेसर वगैरह कभी नहीं रहे हैं और न होंगे।

छात्र जीवन में हमने जैसे समय को जनता के हक में संबोधित कर रहे थे और पेशेवर पत्रकारिता में आम लोगों की तकलीफों और पीड़ितों वंचितों की आवाज की गूंज बने रहने की कोशिश की है,उसके मद्देनजर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कारपोरेट एकाधिकार के जरिये सत्ता के रंगभेदी फासिज्म के कारोबार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा,उसकी हमें बहुत फिक्र हो रही है।

काबिल और कुशल लोग इस तंत्र में भी पत्रकारिता कर लेंगे, लेकिन जो पैदल सेना है, उनकी पत्रकारिता और उनकी नौकरी दोनों शायद दांव पर है।

बहरहाल खबरों के मुताबिक एक अप्रैल 2017 से रिलायंस प्रिंट मीडिया पर अपना कब्जा जमाने के लिए मुफ्त में ग्राहकों को हिंदुस्तान टाइम्स बांटेगा। ये मुफ्त की स्कीम कहां कहाँ चलेगी इस बात की पुष्टि तो नहीं हो पाई है और इस पांच हजार करोड़ की डील में कौन कौन से हिंदुस्तान टाइम्स के एडिशन है और क्या उसमे हिंदुस्तान भी शामिल है इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है लेकिन ये हिंदुस्तान टाइम्स में चर्चा तेजी से उभरी है कि हिंदुस्तान टाइम्स को रिलायंस ने पांच हजार करोड़ रुपये में ख़रीदा है और हिंदुस्तान टाइम्स ने ये समझौता रिलायंस से कर्मचारियों के साथ किया है।

अगर यह खबर सच होती है तो हिंदुस्तान टाइम्स के कर्मचारी 1 अप्रैल से रिलायंस के कर्मचारी हो जाएंगे। फिलहाल रिलायंस द्वारा प्रिंट मीडिया में उतरने और हिंदुस्तान टाइम्स को खरीदने तथा मुफ्त में अखबार बांटने की खबर से देश भर के अखबार मालिकों में हड़कंप का माहौल है।सबसे ज्यादा टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है।

खबर है कि शोभना भरतिया और रिलायंस के बीच यह डील कोलकाता में कुछ बैकरों और अधिकारियों की मौजूदगी में हुई है। इसका आशय भी बेहद खतरनाक है।

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