मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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लाखों इराक़ियों के हत्यारे सिर्फ दस- बीस थे

​​युद्ध का समर्थन करने वाला मीडिया अपने प्राइम टाइम को ख़ास दलों के प्रसार में बहुत बारीकी से लगा रहा है

रवीश कुमार/ जब भी मीडिया युद्ध का समर्थन करे या उसकी भाषा बोले, सतर्क रहने की आदत डाल लेनी चाहिए। मीडिया एक डिज़ाइन है। वो सामान्य दिनों में आपके हक हुकूक की बात करेगा लेकिन इसी दम पर बीच बीच में कोई बड़ा खेल खेल जाता है। इस खेल को समझने की क्षमता साधारण जन में नहीं होती है। युद्ध का समर्थन करने वाला मीडिया अब अपने प्राइम टाइम को ख़ास दलों के प्रसार में बहुत बारीकी से लगा रहा है। पूरी दुनिया में हो रहा है। मीडिया का मूल काम कोरपोरेट और राजनीतिक हितों का प्रसार होता जा रहा है। इसलिए आज के समय में अच्छी पत्रकारिता या सत्ता विरोधी पत्रकारिता वैकल्पिक संगठनों के मंचों से हो रही है जिनका नाम हम और आप जानते भी नहीं होंगे।

एक उदाहरण देता हूँ। जब भी कोई जवान शहीद होता है तो मीडिया ख़ास किस्म की भावुकता पैदा करता है। मैं भी ज़माने तक समझता रहा कि जिसने देश के लिए जान दिया है उसकी विदाई पूरे राजकीय सम्मान के साथ ही होनी चाहिए। टीवी चैनल लाइव दिखाता है, तमाम मंत्री वगैरह जाते हैं, लोगों की भीड़ होती है। जहाँ मंत्री या सरकार का कोई नहीं पहुँचता वहाँ लोग मांग करने लगते हैं कि जब तक कोई नहीं आएगा, अंतिम संस्कार नहीं होगा। लोगों को भी लगता है कि वही एकमात्र सम्मान और सही मांग है। मीडिया और प्रतिस्पर्धी राजनीति के कारण लोगों का यह व्यवहार बदला है।

जब सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट आई तब चर्चा के दौरान पता चला कि हमारे जवानों का वेतन तो बहुत कम है। वे मात्र सत्रह अठारह हजार की सैलरी पर काम करते हैं। सरकार को सेना की सैलरी का अध्ययन कर रिपोर्ट देने वाली संस्था के निदेशक ने हमें बताया कि उन्हें भी हैरानी होती है कि हमारे सैनिक इतनी कम तनख्वाह पर कैसे काम कर लेते हैं। क्या आपने देखा है कि मीडिया अभियान चला रहा हो कि हमारे जवानों की सैलरी कम क्यों हैं। जवान की बुनियादी मांग छोड़ कर उसकी शहादत का गुणगान किया जाता है ताकि सत्ता प्रतिष्ठान को लाभ पहुँचे। जनता के बीच छवि बने कि सरकार बहुत ख़्याल रखती है। जवानों की इतनी ही चिंता है तो उनके उन सवालों के लिए भी एंकरों को चीख़ना चाहिए जब वो ज़िंदा है।

यह बात इसलिए कही क्योंकि ब्रिटेन में चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट आई है। इस कमेटी ने सात साल के अध्ययन के बाद छह हज़ार पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है। इसके बारह अंक हैं। इस रिपोर्ट में इराक़ युद्ध से जुड़े तमाम दस्तावेज़ हैं जो बताते हैं कि ब्रिटेन ने अमरीका के साथ युद्ध करने का फ़ैसला क्यों किया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने पहली बार किसी संप्रभु राष्ट्र पर हमला करने का फ़ैसला किया था। यह एक खेल था जो जनमत को अंधेरे में रखकर खेला जा रहा था। आप छह हजार पन्ने की रिपोर्ट तो पढ़ नहीं पायेंगे लेकिन पढ़ते तो पता चलता कि कैसे मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष चंद कारपोरेट हित की ख़ातिर हम पर युद्ध थोपते हैं।

चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट सरकारी है। इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए ब्लेयर ने संसद, मंत्रिमंडल और ब्रिटेन की जनता से झूठ बोला। इराक़ में सद्दाम हुसैन के पास रसायनिक हथियार होने का कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं था। निराधार थी ये बात। यही वो तात्कालिक कारण था जिसके आधार पर इराक़ को तबाह किया था। वहाँ लाखों लोग मारे गए। कई ऐतिहासिक और ख़ूबसूरत शहर बर्बाद हो गए। आज भी उसके परिणाम में इराक़ में लोग मारे जा रहे हैं। तेल की इस राजनीति को हमें किसी नाईक के कुतर्कों से ज़्यादा समझना चाहिए। मगर ब्लेयर को आतंकी बताकर कहीं कोई हंगामा नहीं होगा जिसने लाखों बेकसूरों को मरवाने में ब्रिटेन की सेना को झोंक दिया।

चिल्कॉट जब यह रिपोर्ट पेश कर रहे थे तब उनके साथ इराक़ में मारे गए ब्रिटिश सैनिकों के परिवार वाले रो रहे थे। उन्होंने अपने पूर्व प्रधानमंत्री और मौजूदा सांसद टोनी ब्लेयर को आतंकवादी कहा। कई अखबारों ने ब्लेयर के इस फ़ैसले को निजी युद्ध करार दिया है। सेना के प्रमुखों ने उनसे माफी की मांग की है। ब्लेयर लेबर पार्टी के सांसद हैं। पार्टी के मौजूदा नेता कोर्बिन ने अपनी पार्टी की तरफ से इराक़ की जनता से माफी माँगी है। ब्लेयर बेशर्मी से कह रहे हैं कि फिर से ऐसा फ़ैसला लेंगे। शायद उन्हें पता है कि दुनिया में राष्ट्रवाद और सेना के नकली गौरव के नाम पर सनकने वाले मूर्खों की कोई कमी नहीं है।

बात मीडिया से शुरू हुई थी। इराक़ युद्ध में मीडिया की भूमिका भी संदिग्ध रही थी। वो भी प्राइवेट आर्मी की तरह बर्ताव कर रहा था। उसने युद्ध को गौरवान्वित किया जिसके नतीजे में लाखों मारे गए और करोड़ों लोग आर्थिक मानसिक यातना झेल रहे हैं। पूरी दुनिया की जनता का बड़ा हिस्सा युद्ध के विरोध में था लेकिन चैनलों ने अपनी रेटिंग को ही जनता घोषित कर दिया और आतंक के इस खेल में शामिल हो गए। क्या हम उन लाखों इराक़ियों की मौत पर अफ़सोस करेंगे जो झूठे आधार पर मार दिये गए।

आतंकवाद के कारणों को खोजते खोजते जड़ों तक लोगों को पहुँचना चाहिए। वैसे ये सारी बातें पहले भी लिखी गईं है मगर अपनी समझ की बेहतरी के लिए ज़रूरी है कि हम चिल्कॉट रिपोर्ट के बारे में जाने। यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे एक नेता अपने मुल्क की जनता को अंधेरे में रखकर किसी दूसरे देश की लालच में साथ देने के लिए अपनी सेना झोंक देता है। मीडिया उस सेना की बहादुरी गाने लगती है और दस बीस लोगों का जमात हमारी सोच से लेकर सामाजिक जीवन तक पर क़ब्ज़ा कर लेता है। टोनी ब्लेयर हम सबके लिए सबक है।

(रवीश कुमार जी के ब्लॉग कस्बा से साभार )

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