ओम थानवी / अख़बारों और पत्रिकाओं में व्यंग्य की जगह छीजती जा रही है। व्यंग्यचित्रों की भी। जितनी जगह बची है, वहाँ धार कुंद होती दिखाई देती है।
कोई ज़माना था जब अख़बारों में नियमित व्यंग्य छपते थे। अनेक में रोज़ ही। संपादकीय पन्ने पर। रविवारी परिशिष्टों में भी।
जब मैं स्कूल में पढ़ता था, दैनिक हिंदुस्तान में गोपालप्रसाद व्यास का स्तम्भ "नारदजी ख़बर लाए हैं" बहुत लोकप्रिय था। वेदव्यास नाम से छपता था। मेरे दादाजी उनकी लेखनी के मुरीद थे। मुझे भी पढ़ने को कहते।
अज्ञेय कुट्टिचातन् नाम से व्यंग्य लिखते थे। अनेक अन्य साहित्यकार भी पत्रिकाओं में व्यंग्य लिखते आए। श्रीलाल शुक्ल इंडिया टुडे (हिंदी) में लिखते थे। फ़ेसबुक पर सही, विष्णु नागर के व्यंग्य अब भी पढ़े जा सकते हैं।
हरिशंकर परसाई भी पत्र-पत्रिकाओं में लिखते। लेखन उनकी आजीविका थी। कमलेश्वर सारिका के संपादक हुए तो परसाईजी से स्तम्भ लिखवाया। नवभारत टाइम्स में राजेंद्र माथुर ने शरद जोशी का स्तम्भ "प्रतिदिन" अरसे तक प्रतिदिन प्रकाशित किया।
अँगरेज़ी अख़बारों में संपादकीय पन्ने पर मुख्य लेख के नीचे व्यंग्य से परिपूर्ण "मिडल" छपा करते थे। राजस्थान पत्रिका में भी ऐसा स्तम्भ था, जिसके लेखक का क़लमी नाम 'मिडलची' ही होता। उसे कई लोगों ने लिखा। हमारे बीकानेर के मेघराज श्रीमाली जी ने भी, जो आगे जनसंपर्क विभाग में उच्च पद से रिटायर हुए।
कुछ रोज़ पहले 'पत्रिका' की संस्थापक-टीम के दूसरे स्तम्भ रहे लक्ष्मीनारायण शर्मा जी से मिला, हम जिन्हें जीएम साहब कहा करते थे। उन्होंने बताया कि अख़बार के आरंभिक दिनों में एक लेखक "मिडलची" लिख जाते, मानदेयस्वरूप उन्हें एक दुकान से रोज़ दो अंडे लेने की छूट थी। अंडों के नियमित सेवन की सलाह चिकित्सक ने दी थी।
जब मैं 'पत्रिका' से जुड़ा, ओम शर्मा "बात करामात" लिखते थे। हम दोनों एक ही कमरे में बैठते। वे रफ़्तार से अपना स्तंभ लिख लेते। बाद में हम लोग जनसत्ता अपार्टमेंट में एक ही ब्लॉक में साथ रहे भी।
पत्रिकाओं में व्यंग्य की जगह रहती थी। धर्मयुग में 'बैठे-ठाले' और साप्ताहिक हिंदुस्तान में 'ताल-बेताल' बहुत पढ़े जाते थे।
रविवार में आख़िरी पन्ने पर कृष्णचंद्र चौधरी का किट्टू के नाम से छपने वाला स्तंभ ‘तीसरी आँख’ बहुत जानदार होता था। पत्रिकाओं में प्रेम जनमेजय नियमित लिखते थे। हाल तक अशोक राही का व्यंग्य भी 'पत्रिका' में पढ़ने को मिलता रहा।
मैंने चंडीगढ़ ((1989) के बाद जब दिल्ली में जनसत्ता का संपादन संभाला (1999), नोएडा में राजेंद्र धोड़पकर के घर जा कर उन्हें फिर से अख़बार में ले आया था। कार्टून के अलावा अक्सर वे तीसरा विनोदी संपादकीय भी लिखते।
चुनाव आयोग की कारगुज़ारी पर इक्का-दुक्का कार्टून तो देखने को मिले, क्या कोई व्यंग्य आपने अख़बारों में पढ़ा है? कौन अख़बार नियमित रूप से मारक व्यंग्य प्रकाशित कर रहे हैं?
(फेसबुक वाल से साभार )

