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जार चिंतन शिरोमणि- अर्थात्, प्रेम कुमार मणि

कैलाश दहिया/ पिछड़ों के विचारक प्रेम कुमार मणि ने 4 सितंबर, 2020 को अपनी फेसबुक वॉल पर 'यह जार चिंतन क्या है?' शीर्षक से अपना लेख लगाया है। बताया जाए, सर्वप्रथम तो इन का यह शीर्षक ही गलत है। यह होना चाहिए था 'यह दलित चिंतन या मोरल चिंतन क्या है?' यह भी बताया जा सकता है कि इस मोरल चिंतन का पर्यायवाची ही है आजीवक चिंतन। लेकिन, जारकर्म समर्थकों को कौन समझाए, इन का दिमाग चलता ही ऐसे है। इन्हें चौबीसों घंटे जारकर्म के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं, तो इन की तरफ से ऐसा ही शीर्षक आना था।

अगली बात, जिस से इन मणि जी के दिमाग को समझा जा सकता है, ये लिख रहे हैं, 'जब तक वह (डॉ. धर्मवीर) जीवित थे, तब तक इस पर बहुत जोर नहीं था।... लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी कुछ लोगों ने इस पर चर्चा बनाए रखने की कोशिश की है। तब इसका अर्थ है वाकई इस पर एक बार चर्चा होनी चाहिए।' जाना जाए इन की इस लिखत का क्या अर्थ है? अर्थ यह है, जब तक महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर जीवित थे तब तक इन की हिम्मत नहीं हुई कि यह उन के सामने मुंह खोल सकें। फिर, डॉ. साहब की मृत्यु के बाद इन्होंने दूसरी बार जुबान खोली है। इन्होंने पहले भी ऐसे लिखा है जिस पर यह मुंह की खा चुके हैं। यह सोचते हैं कि ये जो भी अंट- शंट लिख देंगे कोई इन्हें टोकने वाला नहीं है। लेकिन, यह जान लें कि दलित विमर्श में तो यह चलने वाला नहीं, हां, पिछड़ों के बीच जा कर ये अपनी पींपनी बजा सकते हैं। दरअसल इन की ऐसी सोच द्विजों की संगत में बनी है, अन्यथा कोई बुद्धिजीवी ऐसे लिखना तो दूर सोच भी नहीं सकता।

असल में, जार और जारकर्म समर्थकों का यही हाल है। पकड़े जाने पर ये 'जार-जार' चिल्लाने लगते हैं। एक की हालत तो ऐसी हो गई है उस ने 'जारों को... एक साथ उठाकर अलमारी में बंद (छुपा) कर दिया।' अब इस पर ज्यादा कुछ कहने के लिए नहीं है, हम तो बता ही रहे हैं कि जारकर्म छुप-छुपा कर किया जाने वाला अपराध है‌। पति के आने पर जार को ऐसे ही अलमारी में या कहीं छुपा कर अपना अपराध छुपाया जाता है।

ये कह रहे हैं, 'जार-कर्म पर जब भी बहस हो, पुरुषों और स्त्रियों दोनों के व्यभिचार पर हो।' इस पर वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चौहान जी ने दिवंगत डॉ. धर्मवीर को लिखे अपने पंद्रहवें पत्र में दिनांक 5 सितंबर 2020 को लिखा है, 'अब इन मणि जी को कौन और कैसे समझाएं कि सर आप भी तो शुरू से ही कह और लिख रहे थे कि जार और जारिणी दोनों ही बराबर के दोषी हैं और कानून बनाकर दोनों को बराबर की सजा मिलनी चाहिए।' चौहान जी ने सही ही लिखा है, बावजूद इस के मणि जी के लिए दलित साहित्य से तीन आत्मकथाएं सामने रखी जा रही हैं, इन में आए जारकर्म के प्रमाण पर ये पुरुष और स्त्रियों  को सजा दिलवाने में हमारी मदद करेंगे। इन में पहली है शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा 'अक्करमाशी', इस में लिंबाले जी की मां जारकर्म में लिप्त रही है, तब स्वाभाविक है उस के जार भी होंगे ही। अब मणि जी इन्हें सजा दिलवाने में हमारी मदद करें। इन्हें बताया जा सकता है,  शरण कुमार ही सत्यकाम जाबाल हैं। अंतर इतना है कि जाबाल की मां को अपने बेटे के बाप का नाम तक नहीं पता था, क्योंकि जिस समय जाबाल उस के गर्भ में आया था, उस रात वह कईयों के साथ जारकर्म में लिप्त रही थी। हां, शरण कुमार ने अपने पिता की पहचान की लड़ाई लड़ी है और जार हणमंता लिंबाले इन के बाप के रूप में सामने आया है। अब ये जारकर्म में संलिप्त जार - जारिणी के लिए क्या सजा तय करेंगे? दूसरी आत्मकथा सूरजपाल चौहान जी की 'संतप्त' है, जिस में चौहान जी ने अपनी पत्नी और भतीजे के जारकर्म को दुनिया के सामने खोला है। मणि जी अब किसे और क्या सजा दिलवाएंगे?

तीसरी घरकथा डॉ. धर्मवीर की 'मेरी पत्नी और भेड़िया' है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस में डॉ. साहब ने अपने साथ हुए जारकर्म के अपराध का खुलासा किया है। असल में, बात यह है कि एक जारिणी के कितने जार होते हैं या एक जार कितनी जारिणियों से लगा रहता है, इस बात का खुलासा मणि जी को करना चाहिए। आजीवक चिंतन में तो साफ-साफ बताया जा रहा है कि जारकर्म के लिए केवल और केवल स्त्री जिम्मेवार है। ये पुरुष की जिम्मेवारी तय करते हुए आत्मकथा लिख दें, हम तो उसे भी स्वीकार कर लेंगे। फिर ये यह भी बताएं कि जार और जारिणी को क्या सजा दिलवाएंगे?

बताया जाए, जब से डॉ. धर्मवीर के घरकथा 'मेरी पत्नी और भेड़िया' आई है, तभी से जार और जारकर्म समर्थकों द्वारा यह बात उछाली जा रही है, कि 'उनकी पत्नी का पक्ष सुने बिना धर्मवीर का लेखन, चिंतन नहीं, एक प्रलाप बन कर रह जाता है।' ऐसा नहीं है कि इस बात का जवाब दिया नहीं गया है, लेकिन जार और जारकर्म समर्थकों के कानों पर कहां जूं रेंगती है। तो कहना यही है कि ऐसे बोलने वाले अपनी पत्नी से आत्मकथा लिखवा सकते हैं। हम तो उसे भी स्वीकार कर लेंगे, मणि जी के लिए पूरा मैदान खुला है। यह आजीवक ही हैं जो कह रहे हैं कि कोई तो स्त्री सामने आए, जो अपने पति के जारकर्म का खुलासा करते हुए उस से तलाक की मांग करे। दरअसल, जिसे यह प्रलाप कह रहे हैं वह इन जैसों के लिए फांसी का फंदा है। वैसे, इन से यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह जारिणी रमणिका गुप्ता की आत्मकथा 'आपहुदरी' पढ़ लें,  क्योंकि इस आत्मकथा में तो पति पत्नी दोनों ही जार- जारिणी के रूप में सामने आए हैं। यहां तो हमें ऐसी स्त्री की तलाश है जो अपने पति के जारकर्म पर उस के कूल्हों पर लात मार के उस से तलाक ले ले।

वैसे इन का यह कहना सही है कि 'जार -कर्म पर जब भी बहस हो, पुरुषों और स्त्रियों दोनों के व्यभिचार पर हो।' अब चूंकि स्त्री के जारकर्म को ले कर डॉ. साहब ने अपनी घरकथा में इस का खुलासा कर दिया है, ऐसे ही सूरजपाल चौहान जी ने भी अपनी पत्नी के अपराध को उजागर किया है। तब पुरुष के द्वारा किए जारकर्म के अपराध पर ये आत्मकथा लिख सकते हैं। इस से इन की बात को बल ही मिलेगा, तो यथाशीघ्र ये इस काम में जुट जाएं। अगर संभव हो तो इस बारे में यह किसी स्त्री से लिखवा दें, हम तो उसे भी पुरुष के द्वारा किए जारकर्म का सच मान लेंगे। एक छोटी सी बात जो ये समझने को तैयार नहीं, क्या कोई स्त्री अकेले जारकर्म को अंजाम दे सकती है? जिन आत्मकथाओं का ऊपर जिक्र किया गया है, उन में स्त्री के साथ जारकर्म के अपराध में पुरुष भी तो सम्मिलित रहा है। तो, जनाब लिखने से पहले थोड़ा सोच लिया कीजिए।

यहां एक बात और बताने लायक है, इन्होंने जिन जारज संतानों के नाम गिनाए हैं, वे  सभी द्विज जार परंपरा की देन हैं। ऐसी महान जारज संताने द्विजों को ही मुबारक हों। मणि जी को ऐसी संतानों की चाहना पर हमें कुछ नहीं कहना। वैसे इन्होंने कम ही नाम गिनाए हैं, द्विज साहित्य में तो अक्करमाशियों की लाइन लगी हुई है। फिर, ये जो कह रहे हैं, 'इस विषय (जारकर्म) को धर्मवीर ने केवल व्यक्तिगत स्तर पर देखा।... इस स्थिति में उनकी सोच का कोई सामाजिक मूल्य बनता ही नहीं।' ना मालूम इन्होंने सामाजिक मूल्य को क्या समझ रखा है, क्या कोई अलग से समाज के मूल्य होते हैं? इन्हें इतनी समझ नहीं है कि कानून व्यक्ति के लिए बनाए जाते हैं या समाज के लिए! पूछा जाए, जब चोर को सजा का कानून बनाया गया है तो क्या समाज चोर होता है या व्यक्ति? ऐसे ही जब बलात्कारी को फांसी के कानून की बात की जा रही है, तो बलात्कारी समाज होता है या व्यक्ति? तो इन्हें अपनी सोच का विस्तार करना चाहिए। जारकर्म व्यक्ति के साथ किया गया जघन्य अपराध है, जिस के लिए आजीवक 'तलाक' की मांग कर रहे हैं, वह भी दलितों के लिए केवल। पिछड़ों की मर्जी है ये जैसे रहना चाहिए रहें, इन्हें द्विजों की गुलामी स्वीकार है या आजीवकों की जारकर्म पर तलाक की मोरल व्यवस्था? यहां डॉ. अंबेडकर की तरह जिद नहीं की जा रही है कि द्विजों को सुधार देंगे। हम केवल और केवल दलितों के लिए जारकर्म पर तलाक की मांग कर रहे हैं। फिर भी, जो दलित यह कहता है, 'मैं आज भी ऐसे... लोगों को जानता हूं कि उनकी पत्नी को उनसे संतान नहीं है। सच जानते हुए वो उस बच्चे को अपने नाम सहित बिना पत्नी के मनमुटाव के उस बच्चे को प्यार से पालते हैं।' अब ऐसों के बारे में यही कहा जा सकता है-

1. या तो ये खुद ऐसी संतान  को पाल रहे हैं।

2. या इन की ऐसी संतान कहीं पल रही है।

फिर, अगर इस बात का विस्तार किया जाए तो पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। हां, इतना जरूर बताया जा सकता है, इसी में दलित की परिभाषा छुपी हुई है। बाकी जो परिभाषाएं अभी चल रही हैं वह केवल नाम भर की हैं।

वैसे मणि महोदय से पूछा जा सकता है कि किसी की 'व्यक्तिगत' समस्या का समाधान नहीं किया जाएगा? क्या व्यक्ति को मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा? अगर डॉ. धर्मवीर की समस्या व्यक्तिगत थी, तो ये क्यों उस का समाधान मांगे जाने से भयभीत हैं? ये क्यों नहीं जारकर्म पर तलाक की हमारी मांग का समर्थन करते। ऐसे लगता है ये किसी भी समस्या को व्यक्तिगत कह कर उस की ओर से मुंह मोड़ लेंगे।

यहां बताया जा सकता है कि दलित चिंतन में 'जारकर्म पर तलाक' मूल मुद्दा है। इसी से दलितों की समस्याओं के समाधान निकालने हैं, तभी द्विजों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। मानसिक पिछड़ों को यह बात समझ में आती तो है, लेकिन अपनी सामंती प्रवृत्ति की वजह से आंय- बांय करने लगते हैं। अब इन्हीं को ही देख लीजिए, कह रहे हैं, 'मैंने डॉ. धर्मवीर का कबीर विषयक विमर्श देखा था। उन्होंने कुछ बेहतर सवाल उठाए थे।... लेकिन अब देखता हूं, उनके तथाकथित अनुयायियों या मित्रों ने जार-कर्म चिंतन को ही उनका मूल चिंतन मान लिया है।'  सर्वप्रथम तो इन से पूछा जाए, हमारे जारकर्म को मूल चिंतन मानने से इन्हें या किसी को तकलीफ क्यों है? फिर, ये जो कबीर को ले कर कह रहे हैं, तो इन्हें पता होना चाहिए कि कबीर क्या कह रहे हैं।

कबीर साहेब अपनी लाठी से जार- जारिणी की खाल उतार लेते हैं। जारिणी को फटकार लगाते हुए कबीर साहेब कहते हैं :

"पिया के रूप चीन्है नहीं, अपने भर्म भुलानी।

 आग लगे वहि योवना, सोवे सेज बिरानी।।"

ऐसे ही जार को डपटते हुए कहते हैं..

"ऐंठी धोती पाग लपेटी, तेल चुआ जुलफन में।

गली गली की सखी रिझाई, दाग लगाया तन में। पाथर की इक नाव बनाई, उतरा चाहे छन में। कहत कबीर सुनो भाई साधो, वे क्या चढिहैं रन में।।"

तो, ये जो कबीर की बात कर रहे हैं, इन्हें मालूम होना चाहिए कि कबीर के ग्रंथ का नाम 'बीजक' है और बीजक का अर्थ होता है औरस संतान। और औरस का अर्थ होता है जारकर्म का विरोध और यही कबीर साहेब के चिंतन का केंद्र बिंदु है। दरअसल कबीर का नाम ले कर ये और ऐसे ही बहुत से तथाकथित साहित्यकार बनने की कोशिश करते हैं। दलितों में भी ऐसे कबीर के नामलेवा पैदा हो गए हैं, जिन्हें कबीर के आंदोलन से कोई मतलब नहीं केवल बातें बनवा लो इनसे। अब प्रो. कालीचरण स्नेही को ही देख लीजिए, यह लिखते हैं, 'हमारे कुछ साथियों ने डॉ. धर्मवीर के जार चिंतन ( इन्हें पता होना चाहिए कि यह जार चिंतन नहीं 'मोरलिटी' का चिंतन है।) को ही मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की है, इससे डॉ. धर्मवीर के अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य से हमारा ध्यान हट जाता है। हिंदी की आत्मा पुस्तक और कबीर - प्रेमचंद विषयक  उनका आलोचनात्मक साहित्य, हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, हमें उनके इस साहित्यिक अवदान को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए।' अब इन से पूछा जाए, इन्हें इन कार्यों को करने से कौन रोक रहा है? इन्होंने इन विषयों पर अभी तक क्या लिखा है, ये जरा उसे सामने लाएं। फिलहाल तो ये इतना ही कर दें, डॉ. धर्मवीर की किताब 'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल' की समीक्षा ही लिख दें। हम उसे ही इन का कबीर पर किया काम मान लेंगे।

प्रेम कुमार मणि यह भी कह रहे हैं, 'स्त्रियों को भी पुरुषों के शील की मीमांसा का अधिकार मिले।' फिर उन्होंने यह भी लिखा है, 'उनकी पत्नी का पक्ष सुने बिना धर्मवीर का लेखन, चिंतन नहीं, एक प्रलाप बनकर रह जाता है।' कोई इन से पूछे, स्त्रियों को क्या किसी ने लिखने से रोका हुआ है, स्त्रियां लिखती क्यों नहीं? हम तो बार-बार लगातार कह रहे हैं कि कोई तो स्त्री आए जो अपने पति के जारकर्म का खुलासा करे। वैसे इस बात का सब से आसान तरीका यही हो सकता है कि ये अपनी पत्नी से इस बारे में लिखवा सकते हैं। ये बड़े लिखाडी कहे जाते हैं, ये इस में उन की लिखने में भी मदद कर सकते हैं। जहां तक 'प्रलाप' की बात है, तो द्विजों और उन के गुलामों की यही तो सोच रही है कि जारकर्म के अपराध का शिकार बनाए गए व्यक्ति की सुनो ही मत। लेकिन 'मेरी पत्नी और भेड़िया' इतनी ताकत से आई है कि जारों की सांसें अटक गई हैं। तभी कंवल भारती बड़बडा रहे हैं, 'उनकी आत्मकथा भी एक कुंठित व्यक्ति का प्रलाप है।' पूछना यह है कि मणि और ये इस प्रलाप से भयभीत क्यों हैं?

फिर, ये पूछ रहे हैं, 'जार-कर्म से जन्मा बच्चा राजा का उत्तराधिकारी कैसे होगा।' इन का दर्द हमें समझ में आ रहा है। इन को समझाने के लिए मुझे अपनी 18 सितंबर, 2017 की तीन साल पुरानी  फेसबुक पोस्ट पुनः शेयर करनी पड़ी, जिसमें लिखा है - "अक्करमाशी को इस के जार बाप की संपत्ति में समुचित हिस्सा मिलना चाहिए। इस मांग में गलत क्या है?" असल में, जार बेशर्म, बेहया और नंग होता है। वह किसी भी तर्क को समझना नहीं चाहता। उसे चौबीसों घंटे सेक्स की बकवास चाहिए। बताइए, इतने बड़े लिखाडी को इतनी सी बात समझ नहीं आ रही, जिस ने बच्चे को पैदा किया है उसी की संपत्ति में से उसे हिस्सा मिलना चाहिए। एक बात और ये ध्यान से सुन लें बल्कि गांठ बांध लें, डॉ. अंबेडकर हमारे लिए अंतिम वाक्य नहीं हैं। 'आजीवक चिंतन' अंबेडकर से आगे का चिंतन है। बावजूद इस के, ये डॉ. अंबेडकर के  इस्तीफे का ठीक से अध्ययन कर लें, व्यर्थ की रुदाली से कुछ नहीं मिलने वाला। इसी क्रम में एक बात और बताई जानी है, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर हमारे दादा-पड़दादा होते हैं। हम उन की प्रशंसा करें या आलोचना, इस से गैर दलितों को क्या मतलब? रही बात बुद्ध की तो हम यशोधरा- सिद्धार्थ और राहुल समेत इन को दे ही रहे हैं। पिछड़ों को बुद्ध का जो करना है करें। दलितों का बुद्ध से कुछ भी लेना देना नहीं है। हमारे लिए तो 'डॉ. अंबेडकर बुद्ध से बड़े थे' बड़े हैं और बड़े रहेंगे। जहां तक कार्ल मार्क्स के 'हेगेल के सिर के बल खड़े द्वंदात्मक भौतिकवाद को उलट कर पैर के बल कर' ने की बात है, तो बताया जा सकता है, डॉ. धर्मवीर ने सिर के बल खड़े अंबेडकरवाद को पैरों के बल ही तो खड़ा किया है। इस पैरों के बल खड़ा करने से ही तो बुद्ध छिटक कर गिर गए हैं‌। इधर हमारा कहना है कि बुद्ध आजीवक चिंतकों के शिष्य तक होने लायक नहीं। जिसे बुद्ध को अपने घर का देवता बनाना है खुशी से बनाए।

इन्होंने बेहद शिद्दत के साथ संपत्ति के अधिकार को उठाया है, ये लिखते हैं, 'गर्भ और संतान की तथाकथित पवित्रता का ख्याल मर्दों के संपत्ति पर अधिकार और उसके म्यूटेशन से जुड़ा है।' अब पूछा जाए, इस में गलत क्या है? पिता अपनी संतान को ही संपत्ति देगा। वह जारज पैदाइश को अपनी संपत्ति में से हिस्सा क्यों देगा भला? असल में, संतान का अपने पिता की संपत्ति पर ही तो हक बनता है, वह किसी दूसरे की संपत्ति में से कैसे हिस्सा मांग सकता है? अब शरण कुमार लिंबाले से सीख कर ही एन.डी. तिवारी के जारज बेटे ने अपने जार बाप के संपत्ति में से ही तो हिस्सा लिया है। क्या मणि जी को इतनी सी बात समझ नहीं आती?

असल में ये जारिणी के पक्षधर बन कर उभरे हैं, जो विवाहित किसी से होती है और बच्चे किसी और से पैदा करती हैं। अब जारिणी और उस की जारज पैदाइश को दलित अर्थात आजीवक तो किसी भी तरह का भरण-पोषण और संपत्ति में से हिस्सा देने से रहे। यह चाहें तो जारज संतान पर अपनी संपत्ति लुटा दें, इन्हें कौन रोक रहा है? वैसे असली बात इस में यह है कि जार अपनी जारज संतान के लिए निरीह पति की संपत्ति हड़पना चाहता है। इन्होंने लिखा ही है, 'जार-कर्म से जन्मा बच्चा राजा का उत्तराधिकारी कैसे होगा।' बताइए, ये जारज पैदाइश को राजपाट के लिए हाथ- पैर मार रहे हैं! इसी से इन के दिमाग का अंदाजा लगाया जा सकता है।

फिर, जिस तरह से इन्होंने डॉ. साहब पर टिप्पणियां की हैं, अगर इन्हीं की भाषा में बोला जाएगा तो इन से लंगोट संभालते नहीं बनेगा। इन के लिखे का विरोधाभास देखिए, एक तरफ तो लिख रहे हैं, 'जब तक वह (डॉ. धर्मवीर) जीवित थे, तब तक इस पर बहुत जोर नहीं था।' दूसरी तरफ ये कह रहे हैं, 'उनकी सोच का कोई सामाजिक मूल्य बनता ही नहीं।' पूछा जाए, तब इन्होंने क्यों कलम घसीटी है?

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इन्होंने शिक्षा देने के लहजे से लिखा है, 'जार-कर्म पर बहस उछालने वाले मित्रों को डॉ. अंबेडकर का नारी विषयक चिंतन देखना चाहिए। वह उदार और प्रगतिपरक है। आंबेडकर की वैचारिकी जितना दलित - उद्धारक है, उससे कहीं अधिक नारी - उद्धारक है। स्त्रियों की समग्र आजादी के वह हिमायती थे। उन्होंने किसी दलित प्रश्न पर नहीं, हिंदू कोड बिल के लिए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया था।' ना जाने इन्हें कैसे मालूम हुआ  है कि डॉ. अंबेडकर ने दलित- प्रसंग पर अपना इस्तीफा नहीं दिया। क्या इन्हें सही में मालूम कि डॉ. अंबेडकर का इस्तीफा दलित -प्रसंग है या कुछ और? इन्हें बता दिया जाए, विवाह में तलाक की व्यवस्था ही दलित प्रसंग है, जिसे ना माने जाने पर डॉ. अंबेडकर ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। यह अलग बात है कि इस विषय की जड़ तक डॉ. धर्मवीर ही पहुंचे हैं। ये जरा दिमाग पर जोर डालेंगे तो समझ में आ जाएगा।

आगे बताया जाए, जार की नजरें जारिणी को मिलने वाली भरण-पोषण की राशि पर लगी रहती हैं। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर अगर आज जीवित होते तो इस भरण-पोषण की व्यवस्था को आग लगा देते। वैसे, एक बात पूछने का मन करता है कि द्विज और इस के गुलाम कब से स्त्री समर्थक हो गए? जब स्त्री को तलाक का अधिकार ही नहीं है तो उस के लिए संपत्ति के क्या मायने? बगैर तलाक व्यवस्था के स्त्री जारिणी हो सकती है। फिर, विधवा होने की दशा में पुनर्विवाह के अभाव में जारकर्म को ही प्रश्रय मिलता है, इंकार करने पर सती प्रथा जैसी बुराइयां पनप जाती हैं। अब इन मणि महोदय को कैसे समझाएं कि 'स्त्रियों की समग्र आजादी' तलाक के अधिकार से जुड़ी हुई है। हां, इन्हें इतना जरूर बताया जा सकता है, दलित जारिणी बनी स्त्री को तलाक दे देगा। भरण - पोषण जारिणी को अपने जार या जारों से लेना चाहिए, जिन के साथ वह सोती है। लगे हाथ इन्हें यह भी बता दिया जाए, विवाह को ले कर द्विज जार परंपरा और आजीवक मोरल परंपरा समानांतर हैं। इन दोनों परंपराओं का मिलन संभव ही नहीं। चूंकि, ये द्विज जार परंपरा के रंग में रंगे हुए हैं, इसलिए इन्हें तलाक और उस से जुड़ी बातें कभी समझ नहीं आनी। इसे पिछड़ों का दुर्भाग्य है समझिए की मणि जैसे लेखक इन के प्रवक्ता बने हुए हैं।

यह अच्छी बात है कि इन्होंने स्वीकार किया है कि 'दलित मित्रों के अध्यवसाय का मैं दिल से सम्मान करता हूं...।' बेशक, हम भी इन का सम्मान करेंगे, यदि ये डॉ. धर्मवीर का दिलों- दिमाग खोल कर अध्ययन करेंगे, सुनी सुनाई बातों पर यकीन नहीं करेंगे। तब यह भी सूरजपाल चौहान जी की तरह विकसित होंगे। इन्हें सिद्ध करना होगा कि यह बेशक पिछड़े वर्ग के हैं लेकिन मानसिक रूप से पिछड़े नहीं हैं। इस प्रक्रिया में इन्हें सब से पहले तो पुराण शास्त्रों के कूड़े को अपने जीवन से बाहर निकाल फेंकना होगा। जिस तरह से इन्होंने ब्राह्मणी किताबों से उद्हरण रखे हैं उस पर डॉ. भूरेलाल जी ने सटीक टिप्पणी की है, 'अब समझ में आया है कि पिछड़ों के पास कोई इतिहास क्यों नहीं है। पवित्रता से इतिहास बनता है और भारत के मानसिक पिछड़े अपवित्रता के चलते सदियों पहले अपना इतिहास ही खो बैठे हैं‌। अब यह अपने इतिहास से हीन होकर पूरी तरह आधुनिक हो गए हैं और इतिहास के दायित्व से मुक्त हैं।' इन का यह लिखना 'हमारी परंपरा में कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेदव्यास जारज थे। जाने कितने ऋषि- महर्षि जारज हुए।' डॉ. भूरे लाल जी के कथन को अकाट्य सिद्ध कर रहा है। हो सकता है इन का व्यास की तरह संतति में विश्वास हो, लेकिन दलितों का तो इस से कुछ भी लेना-देना नहीं। पूछना यह है कि क्या पिछड़ों के बाकी लेखक- लेखिकाएं इन की बात से सहमत है?

प्रेम कुमार मणि की अपढ़ता का इस से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि यह जो बातें बना रहे हैं, उन के दलित विमर्श में मुकम्मल जवाब दिए जा चुके हैं। बावजूद इस के यह बेशर्मों की तरह लकीर पीटने में लगे हैं। यह जो लिख रहे हैं, 'जारज और जायज, असली और नकली, पवित्र और अपवित्र संततियों की बात करना ही पिछड़े दिमाग की निशानी है। यह पुरुषवादी, वर्चस्ववादी, या ब्राह्मणवादी सोच है। मनुष्य होना ही काफी है। कोई भी आधुनिक समाज पवित्र पवित्र के आधार पर बच्चों का विभाजन नहीं कर सकता।' इन से पूछा जाए, कौन जारज या जायज संततियों की बात कर रहा है? यहां तो केवल यही कहा जा रहा है जो बच्चे को पैदा करता है वही उसे पाले-पोसे। इस में गलत क्या है? अगर कोई स्त्री अपने जार से संतान पैदा कर रही है तो उसका पति उसे क्यों पाले? उसे जार- जारिणी मिल कर पालें। बावजूद इस के, अगर प्रेम कुमार मणि या इन के समर्थक ऐसी संतान को पालने को तैयार हैं तो इन्हें कौन कुछ कह रहा है? हां, दलित अक्करमाशियों को हरगिज़ नहीं पालने वाले। हो सकता है कंवल भारती इस के लिए तैयार हों, तो बता दिया जाए, दलितों में अभी द्विजों के गुलामों की कमी थोड़े है। इस पर किसी को हैरान- परेशान नहीं होना चाहिए। असल में, जार और जारकर्म समर्थकों को मोरलिटी की बात कहां समझ में आती है। तभी वह बड़बडाता घूमता है :

'आज तक मुझे जार चिंतन का मर्म समझ में नहीं आ सका।'

'यह किसी कुंठा ग्रस्त मर्द का चिंतन है।'

जार-कर्म से जन्मा बच्चा राजा का उत्तराधिकारी कैसे होगा।'

'जारज और जायज, असली और नकली, पवित्र और अपवित्र संततियों की बात करना ही पिछड़े हुए दिमाग की निशानी है।'

'यह पुरुषवादी वर्चस्ववादी या ब्राह्मणवादी सोच है।' वह यह भी कहता है

'यौन शुचिता पुरुषों का पाखंड है।'

बड़बड़ाते-बड़बड़ाते वह एकाएक चीख उठता है,  तुम क्या समझते हो, 'जारज संतानों ने... तख्ता पलट कर रख दिया।' वह चिल्लाते हुए कहता है, 'वह... एक महान व्याख्याकार और दार्शनिक हुआ।' मैं भी वैसा ही और उस से बड़ा बनूंगा। बनिए भई, हमने कहां रोका है? असल में, जिस बेशर्मी से ये जारकर्म के पक्षकार बन कर सामने आए हैं वैसे तो ब्राह्मण भी नहीं आया। अगर इन्हें जार चिंतक शिरोमणि की उपाधि दी जाए तो गलत नहीं होगा।

देखा जाए तो प्रेम कुमार मणि का लेखन अफवाह की श्रेणी में आता है। झूठ, प्रक्षिप्त और अफवाह से भरे ऐसे लिखने में ब्राह्मण माहिर है। फिर इस के गुलाम और पिछलग्गू कहां पीछे रहने वाले हैं! इन अफवाहबाजों ने ऐसा नहीं है कि महान आजीवक धर्मवीर के खिलाफ ही अफवाह उड़ाई हैं। इन जैसों का लेखन कबीर, रैदास और गोसाल को लेकर अफवाहों से भरा पड़ा है। और छोड़िए अफवाहबाजों ने तो बुद्ध के विरुद्ध इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर रखा है पूछो मत। बुद्ध के घर छोड़ने के रहस्य को तो सात तालों में छुपा ही दिया गया, उन के पुरुष होने पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए गए। त्रिपिटक के  'मज्झिम निकाय' में बुद्ध के जो बत्तीस लक्षण बताए गए हैं, उन के बारे में बौद्धाचार्य शांति स्वरूप बौद्ध  'सम्यक इंडिया' नाम के टीवी चैनल पर बताते हैं - "उनके (बुद्ध के) शरीर में बत्तीस प्रकार के अनोखे लक्षण थे, जिन्हें बौद्ध भाषा में महापुरुष लक्षण कहा जाता है और उनकी संख्या बत्तीस है। उन्हीं में एक कान लंबे होते हैं।" आगे ये अगले लक्षण गिनाते हुए बताते हैं- "जो उनका (बुद्ध का) षुरुषेद्रिंय थी,  षुरुषेद्रिंय जो व्यक्ति का, जिसे हम जनेन्द्रिय भी कहते हैं, पुष्पेद्रिंय भी कहते हैं, गुप्तांग भी कहते हैं, वो हमेशा सिकुड़ा रहता था और बदन के अंदर ही रहता था। वो बाहर दिखाई नहीं देता था।... इसका पालि साहित्य में कई जगह वर्णन आया है।"

बताइए, बौद्धाचार्य शांति स्वरूप जी पर यह बोलते- बताते हुए दिमाग पर जोर भी नहीं पड़ा! क्या उपरोक्त कथन की व्याख्या करने की जरूरत है? कोई चाहे तो मेडिकल साइंस में इस का अर्थ ढूंढ सकता है। लेकिन, क्या सही में बुद्ध ऐसे थे? नहीं, यह बुद्ध के बारे में उड़ाई गई सब से बड़ी अफवाह है। इस अफवाह के तार बुद्ध के घर छोड़ने से जुड़े हैं, लेकिन उस में यह अफवाह मात्र है। दरअसल ऐसी अफवाह मणि जैसों ने ही गढ़ी है। जो व्यक्ति जारकर्म के विरोध में किसी तरह का समाधान न होने पर घर छोड़ रहा है, उस के बारे में जनेंद्रिय ही शरीर के भीतर धंसी होने की अफवाह उड़ा दी गई। यह जारों की सोची-समझी रणनीति है। आजीवक चिंतक ऐसे अफवाहबाजों से ही तो लड़ रहे हैं। बताइए, जारिणी रमणिका गुप्ता की जुबान बोलते 'मनुष्य होना ही काफी है' ये हमें सीखाने चले हैं!

असल में हुआ क्या है, हुआ यह है कि जब से दलित चिंतन अपनी पूर्णता में दलितों की समस्याओं के समाधान करता आया है, तभी से पिछड़ों में बेचैनी है। पिछड़ों में दबंगों का एक साहित्यिक गैंग बन गया है, जो दलित चिंतन से चोरी ही नहीं कर रहा है बल्कि इसे प्रक्षिप्त करने में जुट गया है। यह साहित्यिक गैंग कबीर साहेब को जुलाहा और महान मक्खलि गोसाल को कुम्हार कह कर हड़पना चाहता है। बताइए, कबीर को ब्राह्मणों के चंगुल से निकाले चमार और दावा पिछड़ों का! है ना सब से बड़ी साहित्यिक मजाक। पता नहीं महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर की 'कबीर के आलोचक' और उस पर खड़ी बहस से पहले ये मानसिक पिछड़े कहां थे? गोसाल का तो नाम भर सुन कर इन के मुंह से लार टपकने लगी थी। इस में यह भी बताना है कि स्वार्थों के चलते कंवल भारती जैसे दलित भी इस गैंग में शामिल  हो गए हैं। यहां यह भी बताया जा सकता है, जो दलित साहित्य में 'बहुजन -बहुजन' की बात कर रहे हैं, वे हीनता ग्रंथि के शिकार हो कर 'दलित साहित्य चिंतन' को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

बताना यही है, पिछड़े अपना चिंतन ले कर आएं उस के बाद ही आगे बात होगी। हां, इन्हें बताया जा सकता है कि चिंतन का अर्थ धर्म होता है, तो ये अपना धर्म सामने लाएं‌ आजीवकों से उलझ कर कुछ नहीं मिलने वाला। हां, ये 'धर्मवीर' के सम्मुख शीश नवाते आएंगे तो अपनी गुलामी को ही खत्म करेंगे। एक बात और इनकी समझदानी के लिए बताई जा सकती है, दुनिया के दो बड़े और महान धर्म के प्रवर्तकों से डॉ. धर्मवीर किसी भी स्तर पर तुलनीय हैं, तभी वे महान आजीवक चिंतक कहे जा रहे हैं। ऐसे में कबीर साहेब की ताकत का इन्हें अंदाजा हो जाना चाहिए। फिर, महान मक्खलि गोसाल के चिंतन के बारे में ये अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

आखरी बात जो बतानी है, अगर इन का मन इस विषय पर और अधिक 'चर्चा' करने का है तो ये लंगोट कस कर अखाड़े में उतरें अन्यथा जग हंसाई के खतरे ही खतरे हैं। वैसे भी अखाड़ा आजीवकों का है किन्हीं जारों का नहीं। इस में पौराणिक कथाओं की गप्पें नहीं चलने वाली।

(ये लेखक के निजी विचार हैं )

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