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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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नौकरी से निकाले जाने के गम में पत्रकार की मौत

भूख और अत्यधिक शराब बनी प्रदीप के मौत का कारण, चंदा करके पत्रकारो ने किया अंतिम संस्कार

बैतूल। जहां एक ओर भाजपा के तीन बाद अच्छे दिन आने वाले है वहीं दुसरी ओर भाजपा शासित मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिला मुख्यालय पर एक पत्रकार, प्रदीप उर्फ मोनू रैकवार नौकरी से निकाले जाने के दर्द में अत्याधिक शराब पीने एवं भूख की वजह से काल के गाल में समा गया।

बैतूल में एक उद्योगपति के द्वारा शुरू की गई कंपनी द्वारा संचालित फोर कलर में छपने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के प्रिंट लाइन में छपने वाले प्रदीप उर्फ मोनू रैकवार की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई। जिले के पत्रकारो ने उसका अंतिम संस्कार भी चंदा करके किया। जिला केन्द्रीय सहकारी बैक में कार्यरत पिता की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर अनुकम्पा नौकरी के लिए दर - दर भटकने तथा सौतेली मां के द्वारा लगाई गई आपत्ति के बाद पिता की नौकरी से वंचित पत्रकार के परिवार के भरण पोषण का माध्यम बनी थी दैनिक प्रादेशिक जर्नल।  यहाँ  नौकरी से निकाले गए प्रदीप ऊर्फ मोनू रैकवार ने यहां - वहां पर नौकरी के लिए प्रयास किये लेकिन जब नौकरी नहीं मिली और पत्नि भी छोटी सी बेटी को लेकर मायके चली गई। इन सब हादसो के बाद सदमे में आए पत्रकार ने शराब का अत्याधिक सेवन किया और घर में अनाज का एक दाना भी नहीं होने के कारण वह भूखा प्यासा मर गया। उसने सुबह पड़ौस से पीने के लिए पानी मांगा लेकिन पानी का एक घूट भी नहीं पी पाया और काल के गाल में समा गया।

जैसे ही मोनू रैकवार की मौत की खबर पूरे शहर में फैले जिला मुख्यायल के पत्रकारो ने उसके परिवार की खबर ली लेकिन उनके पास अंतिम संस्कर के लिए पचास रूपये भी नही होने की वज़ह से पूरे पत्रकारो ने अंतिम संस्कार के लिए एक दुसरे से आर्थिक सहयोग चंदा के रूप में लिया और पीएम करवाये जाने के बाद देर रात्री उसका अंतिम संस्कार किया। बैतूल जिले के इतिहास में पहली बार किसी पत्रकार के घर में एक दाना भी अनाज का नहीं मिला और उसकी इस तरह की शर्मनाक मौत हुई। पत्रकार की मौत के बाद जहां एक ओर समाचार पत्र और जिला जन सम्पर्क कार्यालय ने पत्रकार मानने से इंकार कर दिया तो उत्तेजित पत्रकारो ने उक्त समाचार पत्र में उसके बाय नाम एवं प्रिंट लाइन में छपे नाम के प्रमाण प्रस्तुत किए लेकिन संस्थान की ओर से जिला जन सम्पर्क कार्यालय एवं जिला प्रशासन को गुमराह करने का प्रयास किया गया कि उसे एक सपताह पूर्व निकाला जा चुका है। जब पत्रकारो ने किसी भी पत्रकार को संस्थान से निकाले जाने पर पूर्व सूचना पत्र या कारण बताओं नोटिस देने तथा तीन माह की नौकरी का वेतन देने की बात कहीं तो पूरा मामला तूल पकडऩे लगा। जिले में कार्यरत पत्रकार संगठन आइसना, एमपी वर्कींग जर्नलिस्ट यूनियन, बैतूल मीडिया सेंटर सोसायटी, राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा, आई एफ डब्लयू जे, मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संगठन से जुड़े पत्रकारो ने पूरे मामले की जानकारी भोपाल से लेकर दिल्ली तक दी तो पूरा मामला गरमाने लगा। जिले के पत्रकारो ने जिला कलैक्टर बैतूल को मृतक पत्रकार की बेवा पत्नि को मुख्यमंत्री आर्थिक सहायता से एक लाख रूपये की सहायता देने की मांग कर ज्ञापन दिया। पत्रकारो ने सीपीआर राकेश श्रीवास्तव से भी चर्चा की तथा पूरे मामले की जानकारी दी। चुनाव आचार संहिता हटने के बाद मृतक पत्रकार की पत्नि को आर्थिक सहायता दिलवाने का आश्वासन मिला। इधर पत्रकारो ने आपस में चंदा एकत्र कर मृतक की पत्नि को अंतिम संस्कार के बाद के क्रियाकर्म के लिए 11 हजार रूपये की राशी एकत्र कर भेट की। बैतूल जिले में पूर्व विधायक के परिजनो के द्वारा संचालित दैनिक समाचार पत्र के स्थानीय संपादक मोनू रैकवार की मौत के कारणो के पीछे संस्थान की भूमिका की पत्रकार संगठनो ने भी जांच की मांग की है। इस संदर्भ में सभी पत्रकार संगठनो ने अपने - अपने स्तर पर मांग पत्र राज्य सरकार को भिजवाने शुरू कर दिये है। बैतूल जिले में पत्रकारो के भी दो रूप देखने को मिले। कुछ टीवी चैनलो एवं बड़े बैनरो के वे पत्रकार जो पूर्व विधायक एवं उद्योगपति से उपकृत होते चले आ रहे थे उनके द्वारा पत्रकार की मौत को शराब पीने से हुई सामान्य मौत बता कर पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया। गांव में किसी गरीब की भूख से होने वाली मौत पर बवाल मचाने वाले टीवी चैनलो के पत्रकारो ने अपने ही पत्रकार साथी की भूख एवं नौकरी से निकाले जाने के बाद सदमें में शराब पीने के चलते हुई मौत के समाचार को कवरेज तक करने से परहेज रखी। इधर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष कांग्रेस ने भी पूर्व विधायक के द्वारा संचालित कपंनी से निकलने वाले दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार एवं स्थानीय संपादक मोनू रैकवार के मामले में चुप्पी साध ली। पूरे दिन एक्जीट पोल में अपनी संभावित जीत पर जिले के पत्रकारो का आभार मानने वाली जिले की आदिवासी महिला सासंद श्रीमति ज्योति बेवा प्रेम धुर्वे ने भी मृतक पत्रकार के घर जाने की कोशिश नही।

बैतुल से रामकिशोर पंवार की रिपोर्ट

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मैं अपने आप को बडा तीसमार खां नहीं समझता पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि बैतूल जिले का मैं पहला एक मात्र पत्रकार हूं जिसने उसकी मौत पर सवाल उठाया और मुझे प्रेरणा मिली बिन्देश तिवारी जी से और फिर आंनद सोनी और मुश्ताक रिजवी के साथ पूरे दो दर्जन पत्रकारो के आवेदन पर उसका पोस्ट मार्टम करवाया। बैतूल के कुछ पत्रकार तो उसके पीएम का भी विरोध कर रहे थे क्योकि वे जिस समूह का समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा रहा था उसके मालिक याने बैतूल के नामचीन उद्योगपति से विधानसभा चुनाव की पूर्व बेला पर उद्योगपति की छबि सुधार कार्यक्रम के तहत उपकृत रहे है। मोनू रैकवार भी उनकी तरह वहां पर कार्यरत था। पीएम होने के बाद हम लोगो ने ही बैतूल के विधायक श्री हेमंतत खण्डेलवाल को मोनू के घर पर लेकर गए और उन्होने इस दुख की घडी में मृतक परिवार को हर संभव मदद का आश्वासन ही नहीं दिया बल्कि पत्रकारो से कहा कि उनके द्वारा दी जाने वाली राशी का डीडी मृतक पत्रकार की बालिका के नाम पर करे।
मित्रो भूख से कोई आम आदमी मर जाता है तो उसकी मौत पर बवाल मचाने वाले न्यूज चैनल के पत्रकार पूरे मामले में आज तक चुप क्यों है।

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