मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "व्यंग्य"

बुद्धिश्रमिक : हीन भावना से ग्रस्त एक बेबस प्राणी

January 4, 2016

हे बुद्धि श्रमिकों- अपने को समाचार सम्पादक, उपसम्पादक, सहायक सम्पादक या फिर समूह सम्पादक कहलवाने से तुम्हें क्या मिलता है.......?…

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सुंदर पिचाई पर, कोई क्यों नहीं बनाता फिल्म...!!

December 23, 2015

तारकेश कुमार ओझा/ 80 के दशक में एक फिल्म आई थी, नाम था लव - मैरिज। किशोर उम्र में देखी गई इस फिल्म के अत्यंत साधारण होेने के बावजूद इसका मेरे जीवन में विशेष महत्व था।  इस फिल्म के एक सीन से मैं कई दिनों तक रोमांचित रहा था। क्योंकि फिल्म में चरित्र अभिनेता चंद्रशेखर दुबे ए…

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सेल्फी वाला पत्रकार नहीं हूं

December 1, 2015

अशोक मिश्र / घर पहुंचते ही मैंने अपने कपड़े उतारे और पैंट की जेब से मोबाइल निकालकर चारपाई पर पटक दिया। मोबाइल देखते ही घरैतिन की आंखों में चमक आ गई। दूसरे कमरे से बच्चे भी सिमट आए थे। घरैतिन ने मोबाइल फोन झपटकर उठा लिया और उसमें कुछ देखने लगीं। मोबाइल को इस तरह झपटता देखकर मेरा माथ…

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मुझे भी सम्मान की दरकार, क्या सम्भव है?

November 1, 2015

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ पाठकों मैं वादा करता हूँ कि यदि मुझे कोई सम्मान मिला तो मैं उसे कभी भी किसी भी परिस्थिति में लौटाने की नहीं सोचूँगा। एक बात और बता दूँ वह यह कि मेरी कोई पहुँच नहीं और न ही मैंने राजनीति के शिखर पर बैठे लोगों, माननीयों का नवनी…

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न्यूज करे कन्फयूज...!!

October 26, 2015

तारकेश कुमार ओझा/ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही है... टीम इंडिया मैच हारी...। कुछ देर बाद पर्दे पर सुटेड – बुटेड कुछ जाने – पहचाने चेहरे उभरे। एक ने कहा ... आफ कोर्स ... कैप्टन किंग को समझना होगा.... वे अपनी मनमर्जी टीम पर नहीं थोप सकते... । आखिर उन्होंने ऐसा फैसला कि…

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संघर्ष की शक्ल....!!

October 13, 2015

जवाब मिला... अबे संघर्ष किसी कहते हैं , जानना है न, तो फलां तारीख को अमुक चैनल पर देख लेना!

तारकेश कुमार ओझा / मैं जीवन में एक बार फिर अप…

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सोशल मीडिया में टिप्पणी देकर समीक्षक बनिए

August 27, 2015

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ समीक्षक का काम टिप्पणी करना होता है। उसकी समझ से वह जो भी कर रहा है, ठीक ही है। मैं यह कत्तई नहीं मान सकता, क्योंकि टिप्पणियाँ कई तरह की होती हैं। कुछेक लोग उसे पसन्द करते हैं, बहुतेरे नकार देते हैं। पसन्द और नापसन्द करना…

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सर का शौर्य, साहब का शोक....!!

August 19, 2015

तारकेश कुमार ओझा / आज का अखबार पढ़ा तो दो परस्पर विरोधाभासी खबरें मानों एक दूसरे को मुंह चिढ़ा रही थी। पहली खबर में एक बड़ा राजनेता अपनी बिरादरी का दुख – दर्द बयां कर रहा था। उसे दुख था कि जनता के लिए रात – दिन खटने वाले राजनेताओं को लोग धूर्त और बेईमान समझते हैं। उनक…

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प्रेस क्लब किसी एक की बपौती और भूमिधरी नहीं

August 8, 2015

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/  हम दो हमारे कोई नहीं ‘समीक्षा’ को छोड़कर। आप तनिक भी तरस मत खाइए। यह परिवार नियोजनी नारा अब काफी परिवर्तित हो चुका है। पहले था- बस दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे, तदुपरान्त हम दो हमारे दो- बावजूद इसके जनसंख्या वृद्धि प…

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