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अर्थशास्त्र शोध में मीमांसा का प्रयोग किया जा सकता है: प्रो. वाजपेयी

शोध में गरीबी उन्मूलन और कृषि सुधार पर बल देने ज़रूरत: तपन कुमार शान्डिल्य

पटना/ अर्थशास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अरुण दिवाकर नाथ वाजपेयी ने कहा कि अर्थशास्त्र शोध में मीमांसा का प्रयोग किया जाता सकता है। प्रो. वाजपेयी  पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग और आईक्यूएसी कालेज आफ कामर्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित वेवनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने शोध के विभिन्न आयामों का वर्णन करते हुए कहा कि भारतीय दर्शनशास्त्र की पद्धति, अर्थशास्त्र में उपेक्षित रही है जिसे परिष्कृत करने की आवश्यकता है। उन्होंने गांधी जी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को भी शोध में समाहित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र को एक नई परिभाषा की आवश्यकता है क्योंकि रॉबिंस की परिभाषा भारतीय अर्थतंत्र की कसौटी पर खरी नहीं उतरती इस लिए इसे नए प्रारूप में बदलने की जरूरत है।

मुख्य वक्ता प्रो. वाजपेयी का स्वागत करते हुए प्रिंसिपल प्रो तपन कुमार शान्डिल्य ने उन के अर्थशास्त्र के शोधकर्ताओं को उन के कार्यक्षेत्र से परिचित कराया। उन्होंने शोधकर्ताओं को बेरोजगारी, गरीबी उन्मूलन और कृषि सुधार जैसे विषयों पर शोध करने की सलाह दी। वेबिनार की अध्यक्षता स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. ब्रजेश पति त्रिपाठी ने की। उन्होंने कहा कि राज्य या देश की योजनाओं के निर्माण में अर्थशास्त्रियों की विशेष भूमिका होती है इसलिए उन्हें वैसे विषयों का चयन करना चाहिए जो योजनाओं के निर्माण में सहायक हों। प्रश्नकाल के दौरान दौरान शोधकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूछे। वेबिनार में प्रो. प्रवीण कुमार, प्रो. शशिकांत, डॉ. रवि रंजन और डॉ तारिक़ फातमी ने भी अपने विचार रखे। व्याख्यान में एक सौ से अधिक शोधकर्ताओं ने भाग लिया। वेबिनार का संचालन प्रो अनूप झा ने किया।

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सम्पादक

डॉ. लीना