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दलित लेखिका रजनी तिलक का निधन

नयी दिल्ली/ जानी मानी दलित लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक का कल देर रात यहां सेंट स्टीफन अस्पताल में निधन हो गया। वह 60 वर्ष की थी। उन्हें रीढ़ में बीमारी के कारण गत दिनों अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां कल रात करीब 11 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया।

श्रीमती तिलक के परिवार में एक पुत्री है। आज राजधानी के निगम बोध घाट पर उनका विद्युत शव दाह गृह में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस मौके पर माकपा की पूर्व सांसद वृंदा करात, सुभाषिनी अली, राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य मनोज झा और प्रसिद्ध दलित कार्यकर्ता अशोक भारती और जाने-माने दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय और श्योरोज सिंह बेचैन भी मौजूद थे।

हिन्दी की दुनिया को सावित्री बाई फुले के महत्व से परिचित कराने में श्रीमती तिलक की उल्लेखनीय भूमिका रही। वे दलित लेखक संघ, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संघ और कई अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़ी थी और सफाई कर्मचारियों के हकों के लिए संघर्षरत थी। श्रीमती तिलक का जन्म पुरानी दिल्ली के एक गरीब परिवार में हुआ था। जनवादी लेखक संघ (जलेस) दलित लेखिका संघ ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

जलेस ने अपने शोक संदेश में कहा कि हिन्दी को ‘अपनी ज़मीं-अपना आसमां’ जैसी आत्मकथा और ‘पदचाप’, ‘हवा सी बेचैन युवतियां’, ‘अनकही कहानियां’ जैसे कविता-संग्रह देने वाली रजनी तिलक भारत के उत्पीड़ित तबकों की अग्रणी बुद्धिजीवी थीं। दलितों, स्त्रियों और दलित स्त्रियों के रोज़मर्रा के संघर्षों में शामिल रहते हुए अपने उन्हीं अनुभवों को दर्ज करने के लिए वे विभिन्न विधाओं में लेखन करती थीं। बामसेफ, दलित पैंथर की दिल्ली इकाई, अखिल भारतीय आंगनवाड़ी वर्कर एंड हेल्पर यूनियन, आह्वान थिएटर, नेशनल फ़ेडरेशन फ़ॉर दलित वीमेन, नैक्डोर वर्ल्ड डिग्निटी फ़ोरम, दलित लेखक संघ और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन आदि के साथ उनका गहरा जुड़ाव रहा। इनमें से अनेक संगठन तो उनके प्रयासों से ही शुरू हुए। उत्पीड़न और अत्याचार से सम्बंधित 50 से अधिक घटनाओं की तथ्यान्वेषी दल में शामिल होकर उन्होंने समकालीन इतिहास के दस्तावेज़ीकरण और उसके माध्यम से आन्दोलन को गति देने का काम किया।

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