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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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हक के प्रेमी का यूं अचानक चले जाना

हकदार के संस्थापक व जुझारू पत्रकार पन्नालाल प्रेमी का 22 अक्तूबर को निधन

ताराराम गौतम/ देश भर में दलित पत्रकारिता में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले साप्ताहिक अखबार "हकदार" के संस्थापक, स्वामी, श्रेष्ठा और ओजस्वी वक्ता पन्नालाल प्रेमी अब हमारे बीच में नहीं रहे। दलितों, पिछड़ों के हक की आवाज को बुलंद करने वाले प्रेमी जी अनंत में खो गए, लेकिन उन्होंने हक की जो आवाज उठाई, वह आवाज सुदूर तक अविरल सुनाई देती रहेगी। उनको कोटि कोटि नमन!

बीकानेर की सामंती रियासत में  पले-बड़े हुए प्रेमी जी ने रियासत काल की बंदिशों को न केवल नजदीक से देखा था, बल्कि उसे भोगा भी था। देश की आजादी के बाद बीकानेर को मेघ-सपूत पन्नालाल बारूपाल के रूप में एक मुखर सांसद मिल चुका था। वहीं जनता की आवाज को मुखर रूप देने का कोई अखबार अभी तक कहीं से भी शुरू नहीं हुआ था। ऐसे में पन्नालाल प्रेमी ने यह साहस दिखाया और पत्रकारिता के क्षेत्र में उतर गए। पाठकों और लेखकों की कमी, धन का अभाव, सम्बल की कोई गुंजाइश नहीं, फिर भी संकल्प में शुचिता थी इसलिए उनका पथ-प्रशस्त हो गया। हक की आवाज उठाने वाला 'साप्ताहिक हकदार' राजस्थान का प्रथम दलित अखबार है जो पिछले 51 वर्षों से निरंतर प्रकाशित होता आ रहा है और दलितचेतना को नए आयाम प्रदान कर रहा है।

जब बीकानेर से पन्नालाल प्रेमी ने हकदार अखबार निकालना शुरू किया तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि कोई उस पर ध्यान भी देगा। दलित पत्रकारिता में राजस्थान में संभवतः दलितों का यह पहला अखबार था, जिसका पहला अंक  01 फरवरी 1969 को प्रकाशित हुआ। उसी समय 'प्रबुद्ध अम्बेडकर' के नाम से अजमेर के रामस्वरूप बौद्ध ने 15 फरवरी 1969 को मासिक पत्र निकालना शुरू किया। अप्रैल 1972 में जोधपुर से 'भारत ज्योति प्रेस' से नरसिंह देव गुजराती के संपादकत्व में मासिक पत्र 'सामाजिक आजादी' शुरू हुआ। राजाराम एडवोकेट द्वारा झुंझुनू से 'दलित ज्योति' का प्रकाशन 1974 में शुरू हुआ। यह दलित पत्रकारिता का प्रस्फुटन था। 90 के दशक में जोधपुर से 'धम्मचक्क' का भी प्रकाशन शुरू हुआ। कुछ जातीय अखबार भी इसी अवधि में प्रकाशित होने लगे। बाद में कुछ और पत्र भी शुरू हुए और बन्द हुए। कुछ जातीय अखबारों को छोड़कर 'हकदार' ही एक ऐसा अखबार है जो निरंतर प्रकाशित होता आ रहा है। हालांकि हकदार भी कई बार बन्द हुआ और शुरू हुआ, परंतु उसकी निरंतरता अभी तक बनी हुई है। यह प्रेमीजी की कुशल व्यवस्था, संपर्क और लेखनी का ही प्रभाव है कि इसके पाठक और लेखक सदैव नए अंक की प्रतीक्षा में रहते है। हकदार ने न केवल लेखक दिए बल्कि नए पत्रकार, प्रकाशक और समाजसुधारक भी दिए। उसने एक ज्योति को प्रज्ज्वलित किया जो घर घर अंधकार, आडंबर और अंधविश्वास को मिटाने में सार्थक रही। इस दृष्टि से हकदार एक नेतृत्व की भूमिका में रहा। 

हकदार के पाठक और लेखक किसी क्षेत्र विशेष या जाति विशेष के ही नहीं है, बल्कि उसकी पाठ्य सामग्री पूरे दलित कलेवर को समाहित करती है। इसलिए उस पर कभी भी किसी जाति विशेष का ठप्पा नहीं लगा। प्रेमीजी अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों को अखबार के माध्यम से सामूहिक स्वरूप प्रदान करने में कामयाब रहे।जोधपुर से प्रकाशित 'सामाजिक आज़ादी' अखबार की अधिकांशतः लेखनी एच आर जोधा की थी। यह प्रेस और अखबार थोड़े समय बाद ही खुर्द-बुर्द हो गया। नरसिंहदेव गुजराती 'हरिजन सेवक संघ' के वेतनभोगी कार्यकर्ता थे। बीकानेर, अजमेर और जोधपुर संभागों से प्रकाशित होने वाले इन अखबारों की पाठक संख्या हालांकि सीमित थी, परंतु ऐसे अखबारों ने 'हरिजन और दलित चेतना' को प्रस्फुटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में उदयपुर से 'दृष्टिकोण' व अन्य जगहों से मासिक, पाक्षिक या साप्ताहिक अखबार भी निकलने लगे---- ये सब व्यक्तिगत प्रयत्न ज्यादा और सामाजिक कम है। 

पिछली शताब्दी के 8वें दशक में हकदार ने बहुत थपेड़े खाये। वह बंद होने के कगार पर था। पन्नालाल प्रेमी का जन्म एक मेघवाल परिवार में हुआ था। कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी कि इस अखबार को सिर्फ 'मेघ-जाति' तक ही सीमित कर दिया जाए तो शायद कुछ मेघवाल लोग आगे आये और उसके डगमगाते कदमों को बल प्रदान कर दे। एक अवसर पर अपना यह अनुभव साझा करते हुए प्रेमीजी ने मुझे बताया कि हितैषी लोगों की यह सलाह तो बिल्कुल सही है, परंतु वह इस पत्र को पूरी दलित कौम तक ले जाना चाहते है, इसलिए वे उनकी सलाह को नहीं मान सकते।---- इस झंझावत के बीच उन्हें कुछ नौकरशाहों का साथ मिला और अखबार ने फिर अपनी गति पकड़ ली----अखबार अब भी निरंतर चल रहा है।

90 के दशक में उनके घर जाना हुआ। उन्होंने बताया कि इस पत्र के भविष्य के बारे में वह अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। वे कोशिश कर रहे है कि उनके पुत्र इस काम को संभाल ले, परंतु अभी भी उनकी रुचि इसमें कम ही है, लेकिन वे अपने पुत्रों को यह विरासत सौंपना चाहते है------समय बीतता गया और यह खुशी की बात है कि प्रेमी जी की विरासत को उनके जीते जी पुत्रों ने संभाल लिया। आशा करनी चाहिए कि हकदार उसी धार के साथ नियमित प्रकाशित होता रहेगा। 

प्रेमी जी के असामयिक निधन से पत्रकारिता के क्षेत्र में एक विक्षोभ पैदा हो गया। दलित समाज ने अपने एक हितैषी, साहित्यकार, भजनी, ओजस्वी वक्ता, मिलनसार  व्यक्ति को खोया है, लेकिन हक की आवाज के लिए 'हकदार' को उन्होंने हमारे बीच में एक द्वीप की तरह रख छोड़ा है। आशा है उसको उसी ऊर्जा और प्रतिबध्दता से प्रकाशित किया जाता रहेगा।

प्रेमी जी के देहावसान के साथ उनकी देह समाप्त हो गयी, परंतु उनकी आवाज हम सब के बीच में निनाद करती रहेगी। प्रिय का बिछुड़ना महा दुःख है। संस्कार अनित्य है। दारुण दुख की इस घड़ी में हमारी तरफ से शोक-संतप्त परिवार को सजल, सहृदय संवेदना!  प्रेमीजी के आदर्श और उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग परिवार जनों को इस शोक से उभरने का साहस प्रदान करे, इसी मंगलकामना के साथ प्रेमी जी को भाव-विह्वल श्रद्धांजलि।

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