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बिहार में शुरू हुआ पहला साहित्य सम्मेलन

बच्चों को शेक्सपियर की रचनायें तो पढ़ायी जाती है, लेकिन कालीदास की नहीं:गुलजार

अब हर साल मानेगा साहित्य महोत्सव

पटना। आज पटना स्थित तारामंडल सभागार में नवरस स्कूल ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स तथा बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा मंत्रालय ने दैनिक जागरण के सहयोग से राज्य का पहला साहित्य महोत्सव का आयोजित किया। इस महोत्सव मे देश के अनेक प्रबुद्ध साहित्यकार, कला एवं संस्कृति के प्रख्यात विद्वान एवं विदुषियों ने अपना योगदान देकर इस कार्यक्रम को सफल बनाया।

साहित्य महोत्सव का विधिवत उद्घाटन मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने दीपशिखा प्रज्जवलित कर किया। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी, कला एवं सांस्कृतिक मंत्री डा. सुखदा पांडेय सांस्कृतिक सलाहकार श्री पवन कुमार एवं बिहार सरकार के अनेक विशिष्ट अधिकारी उपस्थित थे।

दो दिनों तक चलने वाले इस समारोह के मुख्य आकर्षण देश के जाने माने गीतकार गुलजार थे। कार्यक्रम को गुलजार करते हुए उन्होंने कहा कि कविताओं की सहजता उतनी महत्वपूर्ण नही जितनी कि रचनाओं में संघर्ष की ताकत थी। उन्होने कहा कि साहित्य का जो क्रेज बिहार मे है वो शायद किसी और राज्य में नहीं है। इसलिए यहां लोग किताबों, साहित्यों आदि को पढ़ना बंद नहीं करेंगे। उन्होंने एक सवाल भी उठाया कि बच्चों को शेक्सपीयर की रचनायें तो पढ़ायी जाती है लेकिन कालिदास की नहीं।

दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन विभिन्न सत्रों में किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डा. अजीत प्रधान को धन्यवाद दिया और कहा कि अब से प्रत्येक वर्ष साहित्य महोत्सव मनाया जायेगा। इसके लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहायता भी प्रदान की जायेगी। उन्होनें कहा कि यह कार्यक्रम ऐसा हो कि हम बिहारी इस दिवस का इंतजार करेंगे। नीतीश जी ने हर वर्ष 22 से 24 मार्च के बीच भारतीय भाषाओं का साहित्य उत्सव पटना में कराने की घोषणा की है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की भूमिका सिर्फ सहयोगी की होगी, सम्मलेन की विषय-वस्तु में उसका कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि इस सूचना तकनीकी का बढ़ता प्रभाव साहित्यकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसा न हो कि इसके प्रभाव से साहित्य का वर्चस्व कम हो।

कार्यक्रम में कला व संस्कृति मंत्री डा. सुखदा पांडेय ने कहा कि साहित्यकार जन्म लेता है मानवीय संवेदनाओं से, अनुभूतियों और समाज से।

 

पाकिस्तान से आई फहमीदा रियाज ने महिलाओं पर लिखी अपनी नज्म ‘चादर और चार दिवारी’ की कुछ पंक्तिया सुनाई।

‘खुदा मुझे चादर ना दीजिए,

ये चादर और चार दिवारियां लाशों को मुबारक।’’

मशहुर शायर कलीम अजीत ने अपनी शायरी से लोगों को काफी प्रभावित किया। उन्होने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से अपनी शायरी प्रस्तुत की-

गम की आग बड़ी अलबेली,

कैसे कोई दिखाये,

अन्दर हड्डी-हड्डी सुलगे

बाहर नजर न आये।

साहित्यकार आलोक राय ने अपनी भाषा का जिक्र करते हुए कहा कि यह जरूरी है भाषा मे, लफ्जों में भावना की गर्मी हो। पत्रकार नमिता देवीदयाल ने महिलाओं की स्थिति पर अपने विचार व्यक्त किये कि 70-80 के दशक से ही महिलायें अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही हैं। सिनेमा, मार्केटिंग के संदर्भ में महिलायें उभर कर सामने आने लगी हैं। बिहार सरकार के सांस्कृतिक सलाहकार पवन कुमार वर्मा ने अंग्रेजी और हिन्दी के बीच के भेद को बताते हुए कहा- ‘यूं दिखाता हमे आंखे जैसे गुलशन हमारा नहीं।’

इस अवसर पर पानसिंह तोमर के लेखक संजय चैहान, ‘जॉली एलएलबी’ के निदेशक सुभाष कपुर, बीमन नाथ, अरूणा गिल, अनूजा चैहान, लच्छंदा जलील, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, ज्ञान प्रकाश, अरूणेश नीरन, उदय नारायण सिंह आदि कई लेखक, साहित्यकार आदि उपस्थित थे।

(तस्वीर रमाकांत चन्दन के फेसबुक वाल से साभार )

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बिहार के साहित्यिक सन्नाटे को तोड़ने की इस पहल के लिये आयोजकों को बहुत-बहुत बधाई.यद्यपि बिहार के साहित्यकार अपने-अपने खेमों से साहित्यिक गतिविधियों में गहराई से संलग्न हैं.लेकिन अरसे से ऐसे मंच का अभाव दीखता था जहाँ सामान्य रूप से इकठ्ठा हुआ जा सके.सरकार को ऐसा महसूस हुआ है,अच्छी बात है.लेकिन यह केवल घोषणा बन कर न रह जाय इसका ख्याल रहे.मुख्यमंत्री की यह बात प्रशंसनीय है कि प्रति वर्ष होने वाले इस प्रस्तावित आयोजन में विषय वस्तु के चयन में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होगा.



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