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महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुट हुए साहित्यकार

March 24, 2013

पटना साहित्य महोत्सव सम्पन्न

पटना। ‘तहजीब बनायी नहीं जाती बन जाती है। पूरी दुनिया देखने के बाद मुझे ये कहना आसान लगता है कि हिन्दुस्तान जैसा कोई नहीं। आसान नहीं है हिन्दुस्तान की जड़ों को जानना। ये बातें मशहुर लेखक वसीम बरेलवी ने बिहार दिवस के अवसर पर आयोजित पटना साहित्य महोत्सव के दौरान कही।

इस अवसर पर लेखक एवं गीतकार निलेश मिश्रा, ने अपनी ‘याद शहर की कहानी’ को सुनाया। उन्होंने फिल्म ‘बर्फी’ में लिखे अपने गीत ‘क्यों हम ...’ को भी गुनगुनाया। उन्होंने कहा कि लोग गांव के बारे में लिखना पसंद नहीं करते। इसलिए उन्होंने गांव-गांव घुमकर ‘गांव कनेक्शन प्रोजेक्ट की शुरूआत की।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी संकाय के प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि दलित कथाओं में ही जातिवाद होता है, जहां से हिंसा बोध की शुरूआत होती है। उन्होंने दलितों के आन्दोलन का जिक्र करते हुए कहा कि दलित चाहते हैं कि उनके नाम के साथ दलित शब्द का प्रयोग न किया जाये। किसी भी इंसान की पहचान शब्दावली के कारण ही होती है, क्योंकि भाषा का मुद्दा काफी गंभीर मुद्दा होता है। लेखक असगर वजाहत ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि दलित साहित्य वही लिख सकता है जो खुद दलित हो, ठीक उसी तरह जैसे मुथैया जैसी आत्मकथा वही लिख सकता है जो उस समाज से हो। उनका कहना था कि हम किसी भी धारा को या साहित्य को आत्मकथा पर सिद्ध नहीं कर सकते है। संवाद शैली पर एक कहानी भी उन्होंने सुनाई जिसमे हिन्दु-मुस्लिम साथ क्यों नहीं रह सकते इस पर आधारित था। जब यह सवाल राजनेता, वैज्ञानिक आदि लोगों से पूछा गया तो इस मुद्दे का उनके पास कोई हल नहीं था।

साहित्यकार मनोरंजन व्यापारी ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा कि किस तरह वह चाय बेचकर, गाय चराकर और रिक्शा खींच कर लेखन के क्षेत्र मे आये और ‘वर्तिका पत्रिका’ में पहला उनका लेख प्रकाशित हुआ। उन्होंने कहा कि उनकी हर कहानी के पात्र वो खुद हैं और आज वो जिन्दा हैं क्योंकि वो आत्मकथा लिखते आ रहे हैं।

जाने माने फोटोग्राफर बिनोय बहल ने बिहार की संस्कृति की तारीफ करते हुए कहा कि बिहार में विचारों की शुद्धता मौजूद है, उन्होंने बुद्धिज्म के खुबसूरती की तारीफ की, साथ ही ना म्यूजियम की पेंटिग्स की भी जमकर तारीफ की।

पत्रकार एवं कवि शकील शम्सी ने मीडिया को धन्यवाद देते हुए कहा कि उर्दू भाषा का विस्तार उनकी वजह से मुमकिन हो पायी है। और उर्दू एक कौम की जुबां न होकर पूरे हिन्दुस्तान की है।

‘साहित्य का एकांत’ के लेखकर अपूर्वानंद का कहना था कि यदि आप एक साहित्य की किताब पढना चाहते हैं तो अपने आप को मोबाईल से कुछ समय के लिए दूर करना पड़ेगा।

साहित्यकार त्रिपुरारी शरण ने कहा कि बदलाव मूल में असंतोष की भावना छिपी होती है।

आठ सत्र में बंटे इस सम्मेलन का मुख्य विषय था ‘अन्य का लेखन-यथार्थ का स्वरूप’, ‘बोली खड़ी बाजार में’, कथा सरित, ‘उर्दू है नाम जिसका-जुबां का मुस्तकबिल’, ‘याद कनेक्शन-गांव भाया शहर’, ‘क्या हम दकियानुसी हो रहे हैं’ एवं भाषा बसंत।

इस अवसर पर अरूण कमल, आलोक धन्वा, नीलय उपाध्याय, उदय नारायण सिंह, वसीम बरेलवी, कासीम खुर्शीद आदि लेखक, कवि एवं साहित्यकारों ने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर चर्चा की।

अगले वर्ष पुनः इस साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जायेगा इस घोषणा के साथ दो दिवसीय पटना साहित्य सम्मेलन का समापण हुआ।

 

 

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