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दुआ यही कर सकते हैं कि कोई ‘हैदर’ पैदा ही ना हो

फिल्म 'हैदर' पर कवि-आलोचक कैलाश दहिया की टिप्पणी प्राप्त हुई है श्री दहिया ने फिल्म को 'जारकर्म' से जोड़ कर देखा है और उसी दृष्टिकोण से आलोचना की है

कैलाश दहिया / पिछले दिनों हैदर नाम से एक फिल्म रिलीज हुई। इस पर विवाद भी हुआ और  शायद इस ने प्रशंसा भी पाई ।  अभी फिल्म के नायक को सर्वश्रेष्ठ अभिनय का खिताब भी मिला है । यह फिल्म जम्मू और कश्मीर  में आतंकवाद की पृष्ठभूमि में होने का भ्रम देती है, जबकि ऐसा कुछ है नहीं। असल में, यह फिल्म जारकर्म और उसके खतरों को दिखाने के असफल प्रयास के रूप में देखी जा सकती है। बावजूद इस के लेखक- निर्देशक जारकर्म को पकड़ पाने में बुरी तरह असफल रहे हैं। सब से बुरी बात इस फिल्म में जो दिखी, वह है जारिणी द्वारा अपने जवान बेटे के सामने अपने जार से ब्याह रचाना। ऐसे हालातों में अच्छे-अच्छे पागल हो जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं।

फिल्म में एक बुरी बात यह भी दिखी कि जारिणी को बतौर नायिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हैदर की जारिणी माँ को एक तरह से शहीद के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है। इस से उस के जारकर्म पर पर्दा पड़ गया है। इस से मनुष्यता को धोखा हो जाता है। कहना यह है कि अगर अपनी जारिणी माँ के सामने हैदर खुद को मार लेता तो तब क्या होता ? वैसे तो जारिणी खुद अपने बच्चों को खा जाती है, फिर भी फिल्म के स्तर पर तो मानवता जीतनी ही चाहिए ही थी। अब जारिणी को शहीद का दर्जा मिल जाएगा। उधर, जार का घिसट-घिसट कर बचना ठीक ही है। इस बचने में उस का मरना शामिल है।

जारिणी जिस तरह  फिल्म में खुद को बचाने के लिए अपने बेटे के सामने लगभग गिड़गिड़ाने सी लगती है, असल में यही जारिणी का वास्तविक रूप होता है। जारिणी निरीह होने का ढोंग करती है, मानो उस के सामने जारकर्म में गिरने के सिवाय कोई रास्ता बचा ही नहीं था। यही वह जगह है जहां स्त्री-विमर्श को जारिणी को पहचान कर उसे बे-नकाब करना है। अभी तो पुरुषों की संख्या याद न रखने वाली भी खुद को स्त्री ही कहती है। जबकि स्त्री और जारिणी में जमीन और आसमान का अंतर होता है।  

फिल्म मुस्लिम पृष्ठभूमि में बनी है, तब क्या माना जा सकता है की यहाँ भी जारकर्म ने पाँव निकाल रखे हैं ? द्विजों में तो जारकर्म सामान्य नियम की तरह चलता ही है। जारकर्म की धज्जियां तो महान गोसाल, रैदास, कबीर और धर्मवीर की आजीवक परंपरा में उड़ाई गई हैं। यहाँ यह बताना भी उचित ही होगा कि हमारे बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी छड़ी से जार कि खाल उतार लेते हैं।

फिल्म में जारिणी को खाते-पीते घर की दिखाया गया है। इस से यह तो सिद्ध होता ही है कि जारकर्म का गरीबी या अमीरी से संबंध नहीं। गरीबी को जारकर्म का कारण नहीं माना जा सकता। सारी बात मोरल की है।

इधर, जार अपनी पूरी तिकड़म के साथ मौजूद है। अपने भाई को  फंसवा कर या मरवा कर वह जारिणी से विवाह का प्रपंच रचाता है। जारिणी को फिल्म में बचाने की कोशिश की गई है। सवाल यह है कि वह बच कैसे सकती है? वह जारकर्म में रची-बसी है। इसी वजह से उस का पति मारा जाता है। यहाँ व्यवस्था का सवाल भी सामने आ जाता है। जिस व्यवस्था में तलाक का प्रावधान है, तब वह अपने पति से तलाक ले कर अपने जार के साथ क्यों नहीं हो लेती ? कहीं-कहीं कहानी अपने मूल चरित्र जारकर्म को पकड़ने में सफल रही है। जार-जारिणी अपने लिए सम्मान चाहते हैं। इसे फिल्म में अच्छे से देखा  जा सकता है।

फिल्म का नायक विक्षिप्त होने का अभिनय करता है, जो दरअसल अभिनय की बात नहीं। जिस किसी की माँ जारिणी होती है, उस के बच्चों का यही हाल होता है।अगर हैदर जिंदा बचता है तो सही में वह  विक्षिप्त हो कर ही जीवित रह सकता है।  फिर चाहे कोई मिली के नायक से कितनी ही सहानुभूति दिखाए होना तो उस ने पागल ही है। दुआ यही कर सकते हैं कि  देश में कोई हैदर पैदा ही ना हो। और, जार-जारिणी को तो उन के हाल पर ही छोड़ दिया जाए, यही अच्छा है।

आखिरी बात, जो कहने को रह जाती है, वह है अगर नायक का पिता जीवित रहता और वापिस अपने घर लौट आता तो क्या होता ?  तब क्या वह जीवित भी रह पाता ? क्या वह खुद को किसी रेल की पटरी पर कटवा नहीं लेता ? इसी क्रम में यह आशंका भी व्यक्त की जा सकती है कि नायक खलनायक जार की ही पैदाइश होता तो तब क्या होता ? तब पटकथा किस दिशा में आगे बढ़ती?

फिल्म को तीन विधाओं में फिल्म फेयर अवार्ड मिले हैं। जार और जारिणी का अभिनय करने वाले कलाकारों सहित निरीह पुत्र की भूमिका निभाने वाले अभिनेता को। इन में जारिणी का अभिनय सर्वाधिक जीवंत दिखा। जार की भूमिका में के. के. मेनन ने न्याय ही किया है। कुछेक दृश्यों को छोड़ कर पुत्र की भूमिका निभा रहे कलाकार का अभिनय छाप नहीं छोड़ पाया, क्योंकि जारकर्म को झेलने वाली संतान अभिशप्त हो कर पागल या विक्षिप्त हो जाती है। 

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