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राजनीति का जांबी कारोबार

May 17, 2013

मुर्दों के लिए सारां जहां, जिंदो को दो गज जमीन नहीं! हम लोग भी मुर्दाफरोश हैं

भारतीय राजनीति के इस जांबी कारोबार के मद्देनजर 'गो गोवा गान' फिल्म को देखें, तो कामेडी की हवा निकल जायेगी

पलाश विश्वास / अभी अभी सैफ अली खान की एक फिल्म `गो गोवा गान' की खूब चर्चा हो रही है और इसे भारत में पहली जांबी संस्कृति की फिल्म बतायी जा रही है। जांबी संस्कृति पश्चिमी बतायी जा रही है। ‘गो गोवा गॉन’ एक जांबी विधा की फिल्म है जो ज्यादातर हॉलीवुड में बनती रही है। जांबी दरअसल न भूत न है पिशाच, न वैंपायर न मृतात्माएं।

'गो गोवा गॉन' फिल्म अपने विषय के अलावा अपने गानों की वजह से भी चर्चा में आ रही है। इस फिल्म का एक गाना "खून चूस ले तू मेरा खून चूस ले" युवाओं के ‌बीच लोकप्रिय हो रहा है। खासतौर पर युवा प्रोफेशनल्स इसे अपनी जिंदगी से जोड़कर देख रहे हैं। फिल्‍म का निर्देशन कृष्‍णा डी के और राज निधिमोरू ने किया है। फिल्‍म के ट्रेलर को यू ट्यूब पर काफी पसंद किया जा रहा है। इसे तीन दिन में एक मिलियन लोगों ने देखा है। फिल्‍म में सैफ अली खान ने एक रूस के माफिया का किरदार निभाया है जो कि खुद को जांबी हन्‍टर कहता है। मरे हुओं को मारता है जांबी हन्‍टर। फिल्म में तड़कते-भड़कते गाने और बेहतरीन डायलॉग्स हैं।

लेकिन अभी अभी कई राज्य सरकारों के दो साल के कार्यकाल के पूरे होने पर देश भर में सरकारी खर्च पर मुख्यमंत्रियों के बड़े बड़े पोस्टर समेत जो विज्ञापनों की बहार आयी है, वह क्या है? हम व्यक्ति पूजा में इतने तल्लीन और अभ्यस्त हैं कि अपने नेताओं और पुरखों को जांबी में तब्दील करने में पश्चिम से कहीं बहुत आगे हैं। राजघाट पर मत्था सारे लोग टेकते हैं, पर गांधी की विचारधारा की इस मुक्त बाजार में क्या प्रासंगिकता रहने दी हमने? अंबेडकर की तस्वीर के बिना इस देश की बहुसंख्य जनता को अपना वजूद अधूरा लगता है। पर उनकी विचाऱधारा, समता और सामाजिक न्याय के एजंडा, जाति उन्मूलन के कार्यक्रम, बहुजनों की मुक्ति के आंदोलन का क्या हश्र हुआ है?

गांधी और अंबेडकर के स्मारक तो फिर भी समझ में आते हैं, लेकिन जिनका इस देश के इतिहास भूगोल में कोई योगदान नहीं है, उनके नाम पर भी तमाम स्मारकों का प्रतिनियत कर्मकांड हैं। ऐसे महापुरुष आयातित भी हैं। उनकी विचारधारा और उनके आंदोलनों से किसी को कोई लेना देना नहीं। सारे लोग पक्के अनुयायी होने का दावा करते हुए सड़क किनारे शनिदेवता, शिव काली  शीतला संतोषी माता मंदिर और अनगिनत धर्मस्थलों की तर्ज पर स्मारकों के जांबी कारोबार में करोड़ों अरबों की बेहिसाब अकूत संपत्ति जमा कर रहे हैं। उन मृत महानों, महियषियों को जांबी बनाकर उनकी सड़ती गलती देह विचारधारा, विरासत और अंग  प्रत्यंग आंदोलन के हालत में, उन्हें जीवित रहने को मजबूर कर रहे हैं ताकि वे हमारे निहित स्वार्थ पूरा करने के काम आ सकें। भारतीय राजनीति के इस जांबी कारोबार के मद्देनजर इस फिल्म को देखें, तो कामेडी की हवा निकल जायेगी, भारतीय लोक गणराज्य की त्रासदियां बेनकाब हो जायेंगी। यह हालत हमें दहशत में नहीं डालती क्योंकि हम लोग भी मुर्दाफरोश हैं!

दिल्ली में महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट, जवाहरलाल नेहरू के समाधि स्थल शान्तिवन , लालबहादुर शास्त्री के समाधि स्थल विजय ,इंदिरा गांधी के समाधिस्थल शक्ति स्थलसे लेकर चरणसिंह के समाधि स्थल किसान घाट और जगजीवनराम के समाधिस्थल समतास्थल जैसे अति महत्वपूर्ण स्मारक स्थल हैं। दिल्ली तो है दिल वालों की। दिल्ली में जिंदा लोगों को दो गज जमीन मयस्सर नहीं, पर स्मारकों और समाधियों के लिए इतना तमाम तामझाम और हजारों एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा! 

अंततः भारत सरकार ने एक सकारात्मक फैसला किया है कि अब किसी भी राष्ट्रीय नेता के निधन पर राजधानी में कोई समाधि नहीं बनेगी। अब राष्ट्रपतियों, उपराष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, पूर्व राष्ट्रपतियों, आदि के अंतिम संस्कार राष्ट्रीय स्मृति समाधिस्थल पर किये जायेंगे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक में यह फैसला किया गया कि अब किसी भी नेता के मरने पर उसकी अलग से समाधि नहीं बनाई जाएगी। सिद्धांत रूप में यह फैसला 2000 में ही कर लिया गया था। सरकार का मानना है कि राजघाट के पास कुछ समाधि स्थल बनाए जाने से काफी जगह घिर गई है। जगह की कमी को देखते हुए यह फैसला करना पड़ा कि समाधि परिसर को राष्ट्रीय स्मृति के रूप में विकसित किया जाएगा। यहां दाह संस्कार के लिए जगह बनाने के साथ ही लोगों के लिए भी पर्याप्त जगह छोड़ी जाएगी। यह जगह एकता स्थल के पास होगी।

गौरतलब है कि इसी स्मृति स्थल में हाल में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे। प्रार्थना सभा और 21 बंदूकों की सलामी के साथ उनके पार्थिव शरीर का यमुना किनारे स्मृति स्थल में दाह संस्कार किया गया जहां उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मौजूद थी। स्मृति स्थल देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समाधि स्थल ‘शांति वन’ और लाल बहादुर शास्त्री के समाधि स्थल ‘विजय घाट’ के बीच स्थित है।

मजे की बात तो यह है कि इसके बावजूद इस क्रांतिकारी फैसले के साथ ही कैबिनेट ने महात्मा गांधी से जुड़े स्थानों को विकसित करने के लिए गांधी धरोहर मिशन शुरू करने का फैसला किया है। इसके लिए 39 मुख्य स्थानों को चुना गया है। इससे पहले पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल व महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल कृष्ण गांधी की अध्यक्षता में बना पैनल स्थानों को चिह्नित कर चुका है। अगर गांधी के नाम पर स्मारकों का कारोबार जारी रहता है, तो अंबेडकर और दूसरों के नाम पर क्यों नहीं?

इस फैसले से केंद्र सरकार की मंशा समझ में आने लगी है। जगजीवनराम और चरण सिंह के निधन के बाद समाधिस्थल को लेकर जो बवाल मचा था, उसके मद्देनजर भविष्य में ऐसी ही घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना ही असल मकसद है। और कुछ नहीं। इसके साथ ही पहले से बने हुए समाधिस्थल और स्मारक समाधियों और स्मारकों की भीड़ में कहीं गायब न हो जाये, इसे रोकने का भी पुख्ता इंतजाम हो गया है।

आखिर यह भी एक तरह का स्थाई आरक्षण ही हुआ। अतिक्रमण रोकने के लिए चहारदीवार बना दी गयी!

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