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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सौ साल का हुआ "आज"

1920 में 5 सितंबर को शुरू हुआ “आज” समाचार पत्र सौ साल बाद भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है, पटना से भी 41 वर्षों से निकल रहा है

डॉ. ध्रुव कुमार/ भारत की पत्रकारिता के इतिहास में 1920 ईस्वी का एक विशेष महत्त्व है। इस वर्ष कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी के आह्वान पर एक नहीं, दो नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के विभिन्न शहरों से 8 दैनिक सहित लगभग एक दर्जन समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इनमें कलकता से " स्वतंत्र " एवं " साम्यवादी" , इलाहाबाद से  " भविष्य" ,  कानपुर से " वर्तमान " और " लोकमत ", दिल्ली से  " स्वराज" और  पंजाब के गुजरांवाला से एक हिंदी दैनिक  " भावनामा " का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके अतिरिक्त इस वर्ष कई सप्ताहिक व मासिक समाचार पत्रों का प्रकाशन भी शुरू हुआ। इनमें मध्यप्रदेश के जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में " कर्मवीर "  पटना से डॉ राजेंद्र प्रसाद के संपादन में " देश " और वर्धा  से सत्यदेव विद्यालंकार के संपादन में " राजस्थान केसरी " का प्रकाशन शुरू हुआ। 

इन समाचार पत्रों के साथ काशी ( बनारस ) से एक ऐसे दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन 1920 में आज ही के दिन यानी 5 सितंबर को शुरू हुआ, जो आज सौ साल बाद भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है। इस समाचार पत्र का नाम है - "आज"। पिछले 100 वर्षों में देश की बहुसंख्य आबादी विशेषकर हिंदी पट्टी के लोगों की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन चुके इस अखबार को सिर्फ एक समाचार पत्र नहीं बल्कि हिंदी पत्रकारिता का एक सम्मानित " स्कूल "  के रूप में जाना जाता है। इन दिनों यह समाचार पत्र उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की राजधानी सहित एक दर्जन शहरों से प्रकाशित हो रहा है। इनमें उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गोरखपुर इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, आगरा, बरेली, बिहार के पटना, झारखंड के रांची, जमशेदपुर और धनबाद एवं पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता संस्करण प्रकाशित हो रहा है। 

दैनिक आज के प्रकाशन के पीछे देशप्रेम और राष्ट्रभाषा की आस्था से जुड़ी एक रोचक घटना है। कहा जाता है कि इसके संस्थापक - प्रकाशक शिव प्रसाद गुप्त का परिवार काशी के समृद्ध परिवारों में एक था। बापू से उनकी पहली भेंट दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटेन की राजधानी लंदन में हुई थी। उन दिनों शिवप्रसाद गुप्त यह जानने के लिए विदेश भ्रमण पर थे कि दुनिया के स्वतंत्र देश अपनी प्रभुसत्ता की रक्षा कैसे करते हैं। उनकी शैक्षिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियां किस प्रकार की हैं और पराधीन भारत उनसे कैसे और क्या-क्या सबक सीख सकता है ? इस क्रम में वे यूरोप के अलावा अमेरिका व जापान जाकर वहां सक्रिय स्वतंत्रता सेनानियों व क्रांतिकारियों से भी मिले। उन्हें अपनी विदेश यात्रा के दौरान तीन महत्वपूर्ण अनुभव हुए। वे जहां - जहां भी गये, उन्होंने देखा कि वहां के लोग अपनी मातृभाषा अथवा अपने देश की भाषा में ही बात करते हैं और गर्व का अनुभव करते हैं। जापान की एक शिक्षण संस्था का निरीक्षण करने के दौरान उन्होंने पाया कि यह संस्था सरकारी सहायता और सरकारी प्रभाव से एकदम मुक्त थी। उन्होंने निश्चय किया कि भारत में भी राष्ट्रीय शिक्षा प्रदान करने के लिए ऐसी ही एक संस्था की स्थापना हो। इसके अतिरिक्त वे ब्रिटेन में ‘लन्दन टाइम्स’ समाचार-पत्र से भी बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में एक सपने ने जन्म लिया कि राष्ट्रभाषा हिन्दी में भी ऐसा ही एक प्रभावशाली समाचार-पत्र प्रकाशित किया जाना चाहिए। यह सपना ‘आज’ के जन्म के रूप में साकार हुआ। उन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए " ज्ञानमंडल " प्रकाशन की शुरुआत की और राष्ट्रभाषा में देसी शिक्षा के लिए " काशी विद्यापीठ " की स्थापना की। 

उन्होंने अपने विदेश भ्रमण के अनुभवों को आधार बनाकर देशवासियों को एक सूत्र में बांधने, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने और उन दुर्बलताओं व बाधाओं को दूर करने के कई जतन शुरू किए, जिनका लाभ उठाकर अंग्रेज भारत वासियों का शोषण, दोहन व दमन करते आ रहे थे। उनका मानना था कि मजहब या धर्म मनुष्य की निजी संपत्ति है । अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पृथ्वी प्रदक्षिणा’ में उन्होंने लिखा है कि संसार में जिन भी जातियों ने सांसारिक उन्नति की है, मजहब और धर्म को अलग रखकर ही की है। गांधी जी से निकटता के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू समेत अनेक छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता उनसे सहयोग व समर्थन लेने प्रायः बनारस आया करते थे. 1924 से 1931 तक वे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे और इस दौरान 1928 में बनारस में हुई पहली राष्ट्रीय कांग्रेस का उन्होंने अपने निजी खर्च से आयोजन किया।

उनका गांधी जी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत में अगाध विश्वास था और वे अपने स्वामित्व की संपत्ति व पूंजी का उसी के अनुसार उपयोग करते थे। 1910 में उन्होंने प्रसिद्ध आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन द्वारा परिकल्पित व उन्हीं की देखरेख में उनके बनारस के कलेक्टर मित्र के लिए बनवाई गयी भव्य अट्टालिका को खरीद लिया तो गांधी जी ने उसका नाम रखा " सेवा उपवन"। यह अट्टालिका गंगा के पश्चिमी तट पर पचहत्तर हजार वर्ग फुट क्षेत्रफल में निर्मित थी और उससे लगा हुआ 20 एकड़ का मैदान।

देश के पहले गांधी आश्रम की स्थापना की बात आई तो उन्होंने इसके लिए यूनाइटेड प्रोविंस के तत्कालीन फैजाबाद, अब अम्बेडकरनगर जिले की अकबरपुर तहसील मुख्यालय स्थित अपनी डेढ़ सौ एकड़ भूमि इसके लिए दान कर दी। 

कहा जाता है कि उन्होंने ही महामना मदनमोहन मालवीय को इलाहाबाद से वाराणसी लाकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में प्रवृत्त किया था। इस विश्वविद्यालय की कल्पना को साकार करने में वे कदम-कदम पर मालवीय जी के सहायक रहे।

इसके लिए एक लाख एक हजार रुपयों का पहला दान भी उन्होंने ही दिया। हालांकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षा का माध्यम को लेकर मालवीय जी से मतभेद उत्पन्न होने के बाद उन्होंने " काशी विद्यापीठ " की स्थापना की। उन्होंने विद्यापीठ में पठन-पाठन का प्रमुख माध्यम हिन्दी को बनाया। अंग्रेजी भाषा में दी जाने वाली पश्चिमी ढंग की शिक्षा को वे गुलामी की शिक्षा कहते थे। उनकी इच्छा थी कि देश की शिक्षा प्रणाली अध्यात्म की नींव पर खड़ी हो।साथ ही यह शिष्टता के संस्कारों से युक्त हो। 

वे जीवन भर देश की आजादी व चरित्र निर्माण के लिए समर्पित रहे लेकिन दुर्भाग्य से आजादी का सूरज देखना उन्हें नसीब नहीं हुआ और 24 अप्रैल, 1944 को उनकी मृत्यु हो गई।

‘ आज ’ का नाम ‘ आज ’ ही क्यों ?

उन दिनों ज्यादातर समाचार पत्र साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक होते थे, ऐसे में इस समाचार पत्र का प्रकाशन हर रोज होना था और इसमें देश-विदेश की खबरों को भी समाहित करना तय किया गया। दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की आवश्यकता थी। तय हुआ कि जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में लिया जा सकता है। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’ तय किया गया।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन 5 सितंबर 1920 को स्वदेश-प्रेम और हिंदी निष्ठा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आज का प्रकाशन शुरू हुआ। शिव प्रसाद गुप्त जी ने पाठकों को संबोधित लेख में लिखा - " हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं । हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ाएं, अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संस्कार करें, उनको ऐसा बनावें कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच ना हो, वह अभिमान स्वतंत्र्त्य देवी की उपासना करने से मिलता है। "

कहा जाता है कि जब दैनिक आज के प्रकाशन का निर्णय हुआ तो शिव प्रसाद गुप्त ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से परामर्श करने के लिए बाबूराव विष्णु पराड़कर को पुणे भेजा । गुप्त जी का लोकमान्य तिलक से परिचय प्रयागराज में उन दिनों हुआ था जब गुप्तजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे। हालांकि आज के प्रकाशन के ठीक पहले बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया और प्रथम अंक में ही तिलक को श्रद्धांजलि अर्पित की गई । 

दैनिक ' आज ' ने बाबूराव विष्णु पराड़कर के रूप में हिंदी पत्रकारिता को यह ऐसा संपादक दिया जो सिर्फ एक संपादक नहीं बल्कि पत्रकारिता के संस्थान के रूप में ख्यात हुए। उनकी विद्वता व सक्रियता ने दैनिक " आज " को एक " स्कूल " के रूप में स्थापित किया। बाबूराव विष्णु पराड़कर हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, तो आजादी के बाद इसे नवभारत के निर्माण के लिए युवाओं को प्रेरित करने का जरिया बनाया। छोटे-छोटे वाक्यों में सहज रूप से जनता तक अपनी बातें पहुंचाने में उनका कोई सानी नहीं था। इस क्रम में उन्होंने न सिर्फ हिंदी को कई यादगार शब्दों की सौगात दी, बल्कि लेखन की नई शैली भी विकसित की।

उनका जन्म 16 नवंबर 1883 को वाराणसी के एक मराठी परिवार में हुआ था। संस्कृत में शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने वर्ष 1900 में भागलपुर से मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1906 में ‘हिंदी बंगवासी’ के सहायक संपादक के रूप में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा। भाषा की सेवा की चाह के चलते कोलकाता के नेशनल कॉलेज में हिंदी और मराठी भी पढ़ाने लगे। यह बात 'हिंदी बंगवासी’ के प्रबंधक को नागवार गुजरी। उनकी आपत्ति के बाद पराड़कर जी ने 'हिंदी बंगवासी’ छोड़ दिया। 1907 में वे बतौर संपादक ‘हितवार्ता’ से जुड़ गए। इसमें राजनीतिक विषयों पर सरल भाषा में लिखे उनके गंभीर समीक्षात्मक लेख काफी सराहे गए। क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े होने के चलते कई वर्षों तक जेल में रहने के बावजूद उन्होंने हिंदी की सेवा जारी रखी।

‘आज’ को बुलंदियों तक पहुंचाने का श्रेय पराड़कर जी को ही है। वे गीता की हिंदी टीका और प्रख्यात बांग्ला पुस्तक ‘देशेर कथा’ के हिंदी में बेहद प्रभावी अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं। 12 जनवरी 1955 को वाराणसी में उनका निधन हो गया। वे कुछ वर्षों (1943 से 1947 तक) को छोडक़र शुरुआत से 1955 तक ‘आज’ के सम्पादक रहे। 

हालांकि प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित " हिंदी पत्रकारिता का इतिहास " के लेखक जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी का मानना है कि शुरू के दिनों में आज के संपादक के रूप में बाबू श्रीप्रकाश का नाम छपता था, जो प्रसिद्ध विचारक डॉ. भगवानदास के सुपुत्र थे और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में जवाहरलाल नेहरू के सहपाठी थे। उन्हें " लीडर " के सह-संपादक के रूप में पत्रकारिता का अच्छा-खासा अनुभव था।

श्री कमलापति त्रिपाठी ‘आज’  से 1932 में जुड़े और कुछ समय बाद वह ‘आज’ के सम्पादक नियुक्त हुए, तब पराडक़र जी को प्रधान सम्पादक बना दिया गया। 1943 में श्रीविद्या भास्कर और बाद में श्रीकान्त ठाकुर, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर भी ‘आज’ के सम्पादक बने।

सत्येन्द्र कुमार गुप्त सन् 1959 में ‘आज’ के प्रधान सम्पादक बने। इससे पहले 1942 से सोलह वर्षों तक उन्होंने ‘आज’ का संचालन किया था। उन्होंने जब प्रधान सम्पादक का कार्य सम्भाला, उथल-पुथल और संकटों का समय था। हिन्दी समाचार-पत्र भी उससे अछूते नहीं थे। मिशन की भावना लोप हो चुकी थी। व्यावसायिक मानसिकता ने पत्रों का स्वरूप और उद्देश्य ही बदल दिया था। उद्योग, व्यापार और राजनीति का नया अर्थ नवीन शक्ति के रूप में समाज को प्रभावित कर रहा था। अखबारी कागज और अन्य संसाधन भी सहज उपलब्ध नहीं हो रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में भी सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ‘ आज ’ की गौरवपूर्ण परम्परा की रक्षा करते हुए पत्र को उन्नति की ओर अग्रसर किया। 

' आज ’ पहला पत्र है जिसने ' गांवों ' को सबसे अधिक महत्व दिया। " विश्वसनीयता " पत्र की सफलता की कुंजी है। यही समाचार पत्र की सार्थकता को सिद्ध करती है। श्री गुप्त पत्रकारिता के उन गुणों तथा परम्पराओं के प्रबल समर्थक थे, जिसे शिव प्रसाद गुप्त ने स्थापित किया था और जिनके द्वारा यह क्षेत्र सम्मानित और गौरवान्वित होता है। श्री गुप्त मानते थे कि लिखे हुए शब्द सत्यनिष्ठ होने चाहिए। पचीस वर्षों तक ‘आज’ के सफल सम्पादन के बाद सत्येन्द्र कुमार गुप्त का 6 नवम्बर, 1984 को निधन हो गया।

चार राजधानी सहित एक दर्जन शहरों से होता है प्रकाशित 

‘आज’ के विस्तारीकरण की प्रक्रिया 1977 से तब शुरू हुई, जब यह अखबार काशी से निकल कर कानपुर जा पहुंचा और वहां से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश में आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी ‘आज’ प्रकाशित होने लगा। बिहार में पटना, झारखंड में रांची, धनबाद, जमशेदपुर और पश्चिम बंगाल में कोलकाता से ‘आज’ का प्रकाशन होता है।

आज समूह के अंग्रेजी दैनिक " टुडे ", मासिक-  "चित्ररेखा " व पाक्षिक " अवकाश " ने भी धूम मचाई

आज के अतिरिक्त समय-समय पर  "ज्ञानमंडल" ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया, हालांकि "आज" को छोड़कर उनमें से किसी का प्रकाशन इन दिनों नहीं हो रहा है। 1921 में ज्ञानमण्डल ने "मर्यादा" मासिक पत्रिका का अधिग्रहण किया और श्री सम्पूर्णानन्द के सम्पादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ। 1947 में  मासिक "समाज" का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके सम्पादक मण्डल में आचार्य नरेन्द्रदेव भी थे। इसे एक अक्टूबर, 1950 को बंद कर दिया गया। दैनिक "आज" समूह ने देश की आजादी के बाद साहित्यिक पत्रिका "चित्ररेखा" का प्रकाशन शुरू किया। माना जाता है कि यह एक उच्च कोटि की कहानी पत्रिका थी। ज्ञानमण्डल से इसका प्रकाशन नवम्बर, 1947 में शुरू हुआ और कुछ ही अंक प्रकाशित करने के बाद इसे बन्द कर देना पड़ा।

इससे पहले 1921 में 30 जुलाई को अंग्रेजी दैनिक " टुडे "  का प्रकाशन भी ज्ञानमंडल ने " आज " की तर्ज पर शुरू किया। श्री सम्पूर्णानन्द इसके सम्पादक बनाए गए। अपनी छोटी-सी जिन्दगी में ही यह पत्र अहिन्दी-भाषियों में काफी लोकप्रिय हुआ।

जिस वर्ष दैनिक आज के पटना संस्करण की शुरुआत हुई उसी वर्ष यानी 1979 में " आज " समूह ने हिंदी पाक्षिक ‘अवकाश’  का प्रकाशन श्रीरामनवमी के अवसर पर अप्रैल से शुरू किया। श्री शार्दूल विक्रम गुप्त के सम्पादकत्व में लगभग दस साल तक यह पत्रिका खूब चली। कहा जाता है कि इसकी प्रसार संख्या सवा लाख तक पहुंच चुकी थी। बाद में इसे कतिपय कारणों से बन्द कर दिया गया।

इन सबके अतिरिक्त ज्ञानमण्डल से ‘स्वार्थ’ पत्र का प्रकाशन भी शुरू हुआ था, जो दो-ढाई वर्ष तक चला और बाद  में आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे भी बन्द कर दिया गया। 

इन पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त 1916 में स्थापित ज्ञानमंडल ने अनेक ग्रंथ, पुस्तकों और उपयोगी कृतियों को प्रकाशित किया है। प्रकाशन विभाग में सबसे पहले हिन्दी के प्रख्यात विद्वान पद्म सिंह शर्मा को नियुक्त किया गया, जिन्होंने ‘बिहारी सतसई पर सतसई संहार ’ नामक समीक्षा ग्रंथ की रचना की। इसके बाद कार्यभार रामदास गौड़ को सौंपा गया। बाद में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने इस विभाग का दायित्व ग्रहण किया। इस कार्य में डा. सम्पूर्णानन्द, मुंशी प्रेमचन्द्र आदि का भी सहयोग लिया गया। जनवरी 1954 में देवनारायण द्विवेदी आमन्त्रित किये गये। इस प्रकार ज्ञानमण्डल ने विद्वानों की मदद से उच्च स्तरीय अनेक हिन्दी ग्रंथों को प्रकाशन किया, जो आज अमूल्य धरोहर है।

वर्तमान में शार्दूल विक्रम गुप्त ‘आज’ के प्रधान सम्पादक हैं। उनके कुशल नेतृत्व और निर्देशन में यह पत्र निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने 1984 में प्रधान सम्पादक का कार्यभार सम्भाला। वैसे 1979 से ही वह पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं जब उनके नेतृत्व में अत्यन्त लोकप्रिय पत्रिका ‘अवकाश’ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इस पत्रिका ने अल्पकालमें ही हिन्दी जगतमें अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। उन्होंने ‘आज’ के सम्पादक का कार्यभार सम्भालते ही पूरे मनोयोग और अपार उत्साह से पत्र के विस्तार की योजना बनायी और उसे मूर्त रूप देने के लिए अथक प्रयास किया। आज यह पत्र देश के विभिन्न राज्यों के एक दर्जन नगरों से एक साथ प्रकाशित हो रहा है।

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