मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

मीडिया के अंदर और बाहर छोड़ता सवाल जन मीडिया

संजय कुमार / जन मीडिया का सितंबर 2019 का अंक कई खास शोध आलेखों  से चर्चा में है। टीवी पत्रकारिता की जान ‘एंकर’ पर खास स्टोरी है- 'एंकर नियंत्रित विचार-विमर्श का तंत्र' तो वहीं 'लोकसभा चुनाव 2019 पर सोशल मीडिया का असर' है। ज्वलंत मुद्दा  'जलवायु परिवर्तन पर दक्षिणपंथी मीडिया का नजरिया' एवं 'आर्थिक समृद्धि और जलवायु परिवर्तन की रिपोर्टिंग' भी खास  है।  बीबीसी की पत्रकारिता पर सवाल दागता विश्लेषण 'बीबीसी की हिंदी और उर्दू में भिन्न रिपोर्टिंग', पढ़ने के साथ - साथ विमर्श देता दिखता है।

आइये बात करते हैं विस्तार से क्यों खास है यह अंक। जन मीडिया के 90 वें अंक में संपादक अनिल चमड़िया का शोध आलेख 'एंकर :नियंत्रित विचार-विमर्श का तंत्र' एंकरों की भूमिका और उनके आड़ में मीडिया हाउस की एक पक्षीय पत्रकारिता की पोल खोलता मिलता है। श्री चमड़िया ने गहन अध्ययन के साथ से टीवी एंकर की भूमिका को अपने शोध में रेखांकित किया है। एंकर द्वारा विचार विमर्श को नियंत्रित करने के  तमाम हथकंडों को कैसे समेटने की कोशिश  की जाती  है, का विश्लेष्ण है। वे बताते है कि टेलीविजन चैनलों में एक पद एंकर का होता है। समाचार पत्रों में किसी सामग्री को प्रस्तुत करने वाले की पहचान प्रस्तुतकर्ता के रूप  में की जाती थी।  रेडियो में सूत्रधार और उद्घोषक के बारे में यह माना जाता है कि कार्यक्रम की वह एक ऐसी कड़ी के रूप में अपनी भूमिका अदा करें कि उसका कार्यक्रम एक मुक्कमल आकार ले सकें। टेलीविजन चैनलों में एंकर की भूमिका इसी तरह की मानी जाती है कि यदि किसी निर्धारित विषय पर बातचीत या बहस मुवाहिसे के लिए  विभिन्न तरह की राय रखने वालों के बीच संवाद करने का कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है तो उस कार्यक्रम में कड़ी के रूप में उपस्थित हो ताकि दर्शकों को निश्चित विषय पर भिन्न दृष्टिकोण और राय के बारे में व्यवस्थित तरीके से जानकारी मिल सके। लेखक ने भारत में टेलीविजन चैनलों के विस्तार के साथ एंकरों की भूमिका का कई स्तरों पर विश्लेषण किया गया है। वे बताते हैं कि भारत में 1990 के दशक में नई आर्थिक नीतियों और वैश्वीकरण की नीतियों को लागू करने के काल के रूप  में देखा जाता है। इन्हीं नीतियों के आलोक में भारत में टेलीविजन चैनलों के खुले और उसके तेजी के साथ विस्तार की प्रक्रिया भी शुरू हुई। टेलीविजन चैनलों में एंकर की भूमिका को पहली बार तब नई आर्थिक नीतियों के पक्ष के रूप  में देखा गया था टेलीविजन चैनलों को संचालित करने वाली पूंजीवादी कंपनियों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हितों के नियंत्रण और निर्धारण नीति को लागू करते महसूस किया गया। श्री चमड़िया ने भारत के बाजार के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले न्यूज़ चैनल के 5 कार्यक्रमों का अध्ययन किया और समझने की कोशिश की कि विभिन्न स्तरों पर टेलीविजन चैनलों के हित किस तरह से विस्तारित हुए हैं। काफी विस्तार से आंकड़ों के माध्यम से श्री चमड़िया ने एंकर की पृष्ठभूमि को भी रेखांकित किया है, किस तरह से एंकर कार्यक्रमों को प्रभावित करते हैं, किस तरह से प्रवक्ताओं को जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर चैनलों में पार्टी का पक्ष रखने आते हैं।  कितना  समय उन्हें दिया जाता है। किसको नहीं दिया जाता है। आंकड़े एंकर के नियंत्रण की पोल खोलते हैं। एक एंकर किस तरह से किसी का  पक्ष लेता है और पूरे मसले को एक और झुकाने की कोशिश भी करता है। इन तमाम बातों को एक अध्ययन के माध्यम से  लेख में समझाने की कोशिश  है। कह सकते कि बाजार के दौर में एंकर की भूमिका को भी रेखांकित किया है। बाजार ज्ञानी सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में पूरे कार्यक्रम को एक ओर ले जाने की कोशिश करना और ज्यादा से ज्यादा समय उस पार्टी के प्रवक्ता को देना, वहीं दूसरी पार्टी के प्रवक्ता को नजरअंदाज करते हुए भी आंकड़ों के गणित में देखा जा सकता है।  एंकर के व्यवहार पर अनियंत्रित विचार-विमर्श में सवाल, एंकर की भूमिका का पर्दाफाश कर जाता है । पत्रकारिता का  एक खास एजेंडे के तहत इस्तेमाल किया जाता है इस बात को रखने की कोशिश भी दिखती है। जबकि एक मापदंड के तहत देखना चाहिए होता है। एंकर की भूमिका पर इस शोध आलेख में एंकर सवालों के घेरे में हैं। जाहिर है कि मीडिया हाउस अपने एंकर को दिशा-निर्देश भी देता है। एक शानदार और एक गंभीर शोध आलेख के तौर पर इसे देखा जा सकता है।

‘आर्थिक समृद्धि और जलवायु परिवर्तन की रिपोर्टिंग’ आलेख में महेंद्र पांडे जो एक पर्यावरण विशेषज्ञ है, ने प्रकाश डाला है।  वे बताते हैं कि किस तरह से जलवायु परिवर्तन एक विश्वव्यापी समस्या बनती जा रही है और इस पर मीडिया की रिपोर्टिंग कैसे एक देश से दूसरे देश में बदल जाती है।  लेखक के अनुसार अध्ययन के लिए कुल 45 देशों में वर्ष 2011 से 2015 के बीच समाचार पत्रों में प्रकाशित जलवायु परिवर्तन से संबंधित 37,000 से अधिक समाचारों लेखों का विश्लेषण मशीन लर्निग विधि द्वारा किया। इसमें राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों प्रकार के समाचार पत्रों को शामिल किया गया था। साथ ही इन देशों की आर्थिक समृद्धि जलवायु और ऊर्जा की खपत के आंकड़े एकत्रित किए गए। https://ssl.gstatic.com/ui/v1/icons/mail/images/cleardot.gif

लेखक ने अध्ययन के हवाले से बताया है कि किसी देश की मीडिया जलवायु परिवर्तन को किस तरीके से प्रस्तुत करता है। इसका सबसे बड़ा सूचक देश के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद है । अध्ययन से साफ है कि समृद्ध देश मीडिया जलवायु परिवर्तन को राजनीतिक समस्या के तौर पर प्रस्तुत करते हैं जबकि गरीब देश का मीडिया इसे अंतरराष्ट्रीय समस्या के तौर पर दिखाता है। इस विरोधाभास को समझा जा सकता है क्योंकि अमीर देश अपनी समृद्धि के बल पर जलवायु परिवर्तन से लड़ सकते हैं पर गरीब देशों के पास संसाधन नहीं है।

वहीँ, ‘जलवायु परिवर्तन पर दक्षिणपंथी मीडिया का नजरिया’ शोध आलेख चार्ज होवेन्स का है इस आलेख में लेखक ने बताने की कोशिश की है कि जलवायु परिवर्तन को खारिज करने की दक्षिणपंथी देशों की जो नई राजनीतिक सोच है वह पश्चिम की ओर करीब से देखते हुए हैं। वे बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में कई राष्ट्रवादी ताकतें उभरी और चुनावी राजनीति में जगह बनाने में कामयाब रहीं। पूरे यूरोप में राष्ट्रवादी पार्टियाँ उच्च वर्ग बनाम आम जनता का भेद पैदा कर जनता से समर्थन हासिल कर रही है। यह पार्टियां खुद को आम जनता का रक्षक बता रही है जिन्होंने अब तक देश के लिए कुछ नहीं किया है लेखक लिखते हैं कि हैं जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नया बुनियादी ढांचा खड़ा करना होगा जिसके लिए ढेर सारा पैसा चाहिए। तकनीकी सुधार करना होगा और उतना कार्बन टैक्स लगाना होगा जितना आम आदमी चुका सके। इसके साथ ही देशों को इसके अनुकूल बनना होगा। लेखक अपने इस लेख में पूरजोर शब्दों में बताते हैं कि इसका उद्देश्य अमेरिका में दक्षिणपंथी मीडिया संस्थानों द्वारा बयानबाजी और जलवायु परिवर्तन को इंसान द्वारा बनाई गई समस्या के खंडन की प्रवृत्ति का विश्लेषण करना है और मीडिया संस्थानों द्वारा हालिया प्रकाशित 20 लेखों का इस शोध में चयन किया गया। जलवायु परिवर्तन को नकारात्मक रूप से दर्शाने वाले लेखों के अनुपात को भी दर्ज किया गया हैं । लेखक ने बताने की कोशिश की है कि दक्षिणपंथी मीडिया अपने हिसाब से चीजों को अपने पक्ष में करने को लेकर चीजें प्रकाशित करती है उन्होंने हवाला दिया है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिन चीजों से सहमत नहीं होते उसे वह फेक न्यूज़ करार देते हैं। दक्षिणपंथी मीडिया संस्थान जैसा कि अधिकांश मीडिया संस्थान करते हैं अपने सत्य को उस एजेंडे के साथ एक निश्चित फ्रेम में प्रस्तुत करते हैं जिसे वे बढ़ावा देना चाहते हैं। दक्षिणपंथी मीडिया संस्थान अपने पाठको / श्रोताओं में भय पैदा करने के वास्ते लगातार ऐसी सामग्री चुन रहे हैं जिससे समाज का ताना-बाना खराब हो रहा है दक्षिणपंथी मीडिया के इस सोच की वजह से समाज में बटवारा बढ़ रहा है और आम लोगों को ऐसे  चित्रित कर रहे हैं जैसे वे जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर आगाह करने वालों के जाल में फंस जाएंगे। ऐसी मीडिया संस्थान अरबपति लोगों के एजेंडे को उजागर करने वाले उदारवादी संपादकों के सच्ची इरादों को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे हैं और उदारवादी एजेंडे को पूरी ताकत के साथ रोकने की कोशिश कर रहे हैं। जॉर्ज होवेन्स के अंग्रेजी आलेख का अनुवाद शुभम त्रिपाठी और वरुण शैलेश ने किया है। शब्दों का ताना-बाना काफी सहज है और शोध लेख के तत्वों को बड़े ही रोचक शब्दों में पाठकों के सामने रखा है।

सितंबर 2019 के जन मीडिया में एक अहम आलेख है, जो विश्लेषण के तहत रखा गया है इसे लिखा है शाहीन नजर ने। शाहीन नजर जामिया मिलिया इस्लामिया में एमसीआरसी विभाग में गेस्ट फैकेल्टी है। उन्होंने बीबीसी की हिंदी और उर्दू में भिन्न रिपोर्टिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं।  खासकर कश्मीर मामले में।  बीबीसी की कवरेज को उतनी निष्पक्ष नहीं बताया जितना की दावा बीबीसी करता है। शाहीन बताते हैं कि अनुच्छेद 370 के लागू होने के बाद घाटी में अप्रत्याशित बंद की खबरें देने के मामले में बीबीसी ने दूसरे मीडिया संस्थानों को काफी पीछे छोड़ दिया।  राष्ट्रीय मीडिया ऐसे मौके पर आमजन की आवाज बनने में असफल रहा।  वे लिखते हैं कि इन सबमें बीबीसी का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा।  9 अगस्त 2019 को श्रीनगर में हुए प्रदर्शन का वीडियो बहस का केंद्र बना।  काफी चर्चाएं हुई।  लेकिन केंद्र सरकार के साथ-साथ हिंदूवादी ताकतों की इंटरनेट पर लोगों को निशाना बनाने वाली इस वीडियो को मनगढ़ंत और गलत बताते हुए खारिज कर दिया गया। राष्ट्रवादियों ने फेक न्यूज़ प्रसारित करने को लेकर ब्रिटेन के पब्लिक ब्रॉडकास्टर, बीबीसी की खूब आलोचना की। शाहीन बताते हैं कि  यह वीडियो मुख्यधारा की मीडिया में अर्णव गोस्वामी जैसे लोगों के लिए चारा बन गया, जिन्हें इस रिपोर्टिंग में भारत के खिलाफ उपनिवेशिक साजिश नजर आई।  हालाँकि, बीबीसी अपने दावे पर डटा रहा और बयान जारी कर कहा कि बीबीसी अपनी पत्रकारिता के साथ खड़ा है हम पूरी मजबूती से ऐसे किसी भी दावे को खारिज करते हैं कि हमने कश्मीर की घटनाओं को गलत तरीके से पेश किया है। शाहीन लिखते हैं कि बीबीसी की अगर तारीफ की जा रही है लेकिन सराहनीय कदम के बावजूद सवाल उठते हैं क्या हम बीबीसी पर भरोसा कर सकते हैं? कश्मीर की घटनाओं की साहसिक रिपोर्टिंग और पत्रकारिता के मूल्यों के साथ मजबूती से खड़े रहने के दावे के बावजूद प्रमाण करता है कि उतना निष्पक्ष नहीं है जितना कि वह दावा करता है, सही लिखते हैं। यह हकीकत हिंदी और उर्दू भाषाओं की कश्मीर के मामले में बीबीसी की खबरों की तुलना से सामने आ जाती है।  ऐसा लगता है कि बीबीसी भारत और पाकिस्तान के लिए दो अलग-अलग सम्पादकीय नीतियां अपना रहा हो। संपादकीय नीतियों में अंतर इतना ज्यादा है कि एक दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। अपने विश्लेषण में शाहीन लिखते हैं कि भारत विरोधी प्रदर्शनों को बीबीसी की उर्दू सेवा, तो हिंदी सेवा इमरान खान का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रसारित करती है। इसी तरह आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर दुनिया भर के नेताओं या एजेंसियों की टिप्पणी को हिंदी कार्यक्रम में अच्छी खासी जगह तय होती है। अगर निष्कर्ष के तौर पर कहे तो इस उपमहाद्वीप के मामले में बीबीसी ने औपनिवेशिक समय के बांटो और राज करो की नीति को ही बांटो और रिपोर्ट करो के रूप में नए सिरे से लागू कर रखा है। शाहीन के विश्लेषण साफ बताता है कि बीबीसी की रिपोर्ट घाटी को लेकर साफ रवैया नहीं अपनाता है। हिंदी में कुछ और व  उर्दू में कुछ और, प्रसारित करना पत्रकारिता के मापदंडों के बिल्कुल खिलाफ जाता है।

जन मीडिया में अंतिम आलेख है शोध संदर्भ के तौर पर लोकसभा चुनाव 2019  सोशल मीडिया के असर को पेश किया गया है। इसे अंग्रेजी से अनुवाद किया है संजय कुमार बलौदिया ने। विकासशील समाजों का अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम ने कोनार्ड अड़ेयोर स्टिफन के सहयोग से हाल ही में एक रिपोर्ट सोशल मीडिया एंड पॉलीटिकल बिहेवियर प्रकाशित की है यह रिपोर्ट भारत में ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग साइटों और ऐप के जरिए एप के इजाफे तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में लोगों की राजनीतिक प्राथमिकता व दृष्टिकोण को निर्धारित करने में उनकी भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के एक भाग का संपादित हिस्सा पत्रिका में हैI

शोध के निष्कर्षों में साफ कहा गया है कि सर्वेक्षण से पता चलता है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक नारों, पार्टियों की प्रस्तावित योजनाओं और सुरक्षाबलों द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में संदेश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। क्योंकि इन माध्यमों पर सक्रिय लोगों को गैर उपयोगकर्ताओं की तुलना में उनके बारे में अधिक जानकारी थी। शोध में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया ने प्रभाव डाला है क्योंकि जो लोग इसका उपयोग कर रहे थे वे बड़े पैमाने पर उन लोगों की तुलना में ज्यादा हठधर्मी थे जो इन प्लेटफार्म के संपर्क में नहीं थे I

कुल मिला कर हर अंक की तरह जन मीडिया का यह अंक खास है I शोध के जरिये मीडिया के अंदर और बाहर सवाल छोड़ जाता है विमर्श के लिए और पाठकों को जगाने की भी कोशिश करता है I

 

***

पत्रिका- जन मीडिया

अंक- सितंबर 2019

संपादक- अनिल चमड़िया

मूल्य- ₹20

संपर्क- C-2,पीपलवाला मोहल्ला, बादली एक्सटेंशन, दिल्ली-42

मोबाइल नंबर- 96 543258 99

Go Back

Comment