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रमेश उपाध्याय की कहानियां विचारों का भूमंडलीकरण

लखनऊ। ‘त्रासदी...माई फुट’ हिन्दी के वरिष्ठ व चर्चित कथाकार रमेश उपाध्याय का नया कथा संग्रह है जिसमें उनकी तीन लंबी कहानियां ‘त्रासदी माई फुट’, ‘प्राइवेट पब्लिक’ तथा ‘हम किस देश के वासी हैं’ संग्रहीत हैं। इनकी विषय वस्तु भोपाल गैस कांड से लेकर मारूति उद्योग में अभी हाल में हुए संघर्ष पर केन्द्रित है। इन कहानियों को आधार बनाकर आज 15 सितम्बर को जन संस्कृति मंच ने ‘भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी कहानी’ पर गोमती नगर के जायका फुड रेस्टोरेन्ट में परिसंवाद का आयोजन किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार व ‘निष्कर्ष’ के संपादक डा. गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि भूमंडलीकरण के द्वारा जो व्यवस्था थोपी गई है, उसके द्वारा जहां चन्द लोगों को अरबपति बनाया जा रहा है, वहीं बड़ी आबादी के जीवन को जर्जर व गुलाम बनाया जा रहा है। आज सादगी नहीं, दिखावे की बात हो रही है। सहनशीलता की जगह आक्रामकता, सार्थकता की जगह सफलता और सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा - यही आज की खासियत है। रमेश उपाध्याय की कहानियां इन मूल्यों पर चोट करती है और भूमंडलीय यथार्थ को उभारती हैं। जब पूंजी का भूमंडलीकरण किया जा रहा है, रमेश उपाध्याय की कहानियां विचारों का भूमंडलीकरण करती हैं। भले ही ‘प्राइवेट पब्लिक’ कहानी टेकनिक के स्तर पर कुछ कमजोर हो लेकिन एक लेखक का जो जरूरी कार्य है, रमेश अपनी कहानियों के माध्यम से पूरा करते हैं।

जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव का कहना था कि रमेश उपाध्याय की कहानियां विषय व प्रतिबद्धता के रूप में काफी मजबूत है तथा कहानी के माध्यम से भोपाल गैस कांड की पूरी प्रक्रिया उजागर करते हैं। साम्राज्यवाद समूची दुनिया को अपनी उत्पादन इकाई के रूप् में इस्तेमाल करता है तथा तीसरी दुनिया के लोग उसके लिए अभ्य व कीड़े मकोड़े हैं। रमेश उपाध्याय की कहानी कला में कहानी कहां निबन्ध, बहस व विचार से अलग है, यह गौर करने की बात है। कहानी समाजिक संरचना के साथ साहित्य संरचना भी है। एक बात जो रमेश उपध्याय के संबंध में है कि जहां जनवादी कहानी में ठहराव आ गया था, वहां ये कहानियां उस ठहराव को तोड़ती हैं। इस अर्थ में ये कहानी का नया प्रस्थान बिन्दु प्रस्तुत करती हैं।

कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि रमेश उपाध्याय अपनी कहानियां से अमरीकी साम्राज्यवाद व भूमंडलीकरण के खिलाफ एक तीखी बहस छेड़ते हैं। इनका मानना है कि आज के दौर में साहित्य को भी ग्लोबल होना पड़ेगा। भारत जैसे देश में भोपाल गैस कांड के जरिए हजारों लोग मारे जाते हैं, वहीं कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को अपना देश ही बेगाना लगने लगता है। रमेंश उपाध्याय का मानना है कि आज व्यक्ति, परिवार, समाज, गांव अर्थात देश की ही नहीं, पूरी दुनिया की कहानी लिखनी होगी। आज परसनल पालिटिकल है, प्राइवेट पब्लिक है और लोकल ग्लोबल है। वे कहानी लिखने की नई पद्धति भूमंडलीय यथार्थवाद को भी सामने लाते हैं। इस क्रम में कहानी के शिल्प में भी तोड़ फोड़ करते हैं।
कवि व लेखक भगवान स्वरूप कटियार का कहना था कि रमेश उपाध्याय शेखर जोशी, भीष्म साहनी व अमरकांत की परंपरा के कथाकार हैं। इन्होंने ‘त्रासदी...माई फुट’ की कहानियों में भूमंडलीकरण, उदारीकरण जैसे अहम मुद्दों को अपना विषय बनाया है। ये कहानियां विश्व साम्राज्यवाद के चेहरे को बेनकाब करती हैं। हर राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता व अस्मिता के साथ जीना वा विकास करना चाहता है। साम्राज्यवाद इन्हें नष्ट कर देना चाहता है।

कथाकार शकील सिद्दीकी ने कहा कि ये कहानियां वैचारिक अभियान की कहानियां हैं जो समकालीन सवालों से मुठभेड करती हैं। सहित्य में कलात्मकता व वैचारिकता की बहस बहुत पुरानी है। रमेश उपाध्याय की कहानियों की खूबी है कि ये किसी एक बहस पर अपने को केन्द्रित न करके एक साथ कई बहसों को चलाती हैं। हमारी संवेदना को जगती हैं।

कार्यक्रम के आरंभ में अपने संयोजकीय वक्तव्य में कवि व जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि रमेश उपाध्याय की ये कहानियां, भूमंडलीकरण ने हमारे समय, समाज, जीवन, विचारा व व्यवहार को जिस तरह से प्रभावित किया है, उसकी पड़ताल करती हैं। ये कहानियां साम्राज्यवादी पूंजी के साथ भारत के शासक वर्ग की साठगांठ की गांठ को खोलती है और हिन्दी साहित्य में आज चल रहे विमर्श से अलग एक नया विमर्श रचती है, यह विमर्श है ‘नई गुलामी का विमर्श’। रमेश उपाध्याय की ये कहानियां अपने कथानक के नये यथार्थ को सामने लाती हैं, वहीं ये कहानी की पारम्परिक ढांचे को भी तोड़ती हैं। हमारे लिए जरूरी है कि हम ऐसी कहानियों पर विचार करें।

इस मौके पर कथाकार शिवमूर्ति, हरिचरण प्रकाश, प्रताप दीक्षित, आलोचक नलिनरंजन सिंह, कवयित्री प्रज्ञा पाण्डेय, नाटककार राजेश कुमार व दीपक कबीर आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में लविवि के प्रो रविकांत, शोध छात्रा आकांक्षा व दीपा शर्मा, ‘रेवान्त’ की संपादक अनीता श्रीवास्तव, कथाकार नसीम साकेती, कवयित्री व रंगकर्मी कल्पना दीपा, प्रमोद प्रसाद आदि रचनाकार व साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया।

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कौशल किशोर, संयोजक, जन संस्कृति मंच, लखनऊ मो - 09807519227

 

 

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